योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
दीपिकोद्धृतवचनानुक्रमणी ४३३ सा शिवत्वसम ८६ चि. स्त. ३८ स्थितो योऽसौ महापीठो १९३ सं. प. सितशोणबिन्दु २० का. वि. ६ स्थूलं पञ्चाशदाकारं ३०९, ३२१ सिसृक्षोः प्रथमस्पन्दः ३१६ प. प. १८ स्व. सं. सुगन्धिकुसुमैर्द्रव्यैः २८९ स्व. सं. स्थैर्यमेति चमत्कारो २९९, ३१७ क्रमो. सुगुप्ताः सिद्धयः सर्वा २१० स्व. सं. स्पर्शतन्मात्रतो १५६. म. स्व. सं. सुतीव्रशक्तिपातेन १६४ स्व. सं. स्फुटशिवशक्ति २० का. वि. ३ सुनिर्वाणं परं शुद्धं ४९, २०८ स्व. सं. स्फुरितादरुणाद् १४० का. वि. ९ सुपक्वमलकर्माण १६५ स्व. सं. स्यादम्बिकास्वरूपः १२० सौ. सु. २.६ सुपक्वमलविज्ञान १६४ स्व. सं. स्वप्रकाशवपुषा १९७, २१६, २२६ सुरा शक्तिः शिवो मांसं ३८३ अ. व. चि. स्त. ३१ सुश्रीः सुरूपा कपिला २८७ शा. ति. स्वप्रकाशशिव एव २८१ वि. स्त. ५ २.१५ स्वप्रकाशशिवमूर्ति २१०, २२५, ३८१ सुषुम्ना योनिमध्यस्था ३५ स्व. सं. चि. स्त. १ सुषुम्नात्मना नित्य २९६ प. स्वबीजाद्याश्चतुर्थ्यन्त २८७ स्व. सं. सुषुम्ना वृष्टिवाहा च २८९ स्व. सं. स्वभावेन समाराध्या २३०, ३०७ सूक्ष्मं पुर्यष्टकं देव्या ७१ सु. वा. १७ मु. र. सूक्ष्मा चैव सुसूक्ष्मा ४७, ४८ स्व. सं. स्वयमेव समालोक्य ६५ प्र. व. सूर्यकोटिप्रतीकाश ४३ स्व. सं. स्वयम्भुमध्यगा ३७ स्व. सं. सूर्यकोट्यर्बुदप्रख्यः ३०४ स्व. सं. स्वसंवित् त्रिपुरा देवी २८१ प्रा. व., सूर्यबिम्बमधश्चोर्ध्वं २४८ स्व. सं. ३५३ अ. व. सृष्टि स्थितिं च ४९ स्व. सं. स्वस्थे नरे समासीने ३७३ तन्त्रा. सृष्टिः पूर्वाम्नायो १२१ सौ. सु. २.८ स्वाङ्गरूपेषु भावेषु ३४१ प. प. २१ सृष्टिस्थितिसंहारे १२१ सौ. सु. २.८ स्वात्मनि संहृति १२२ सौ. सु. २.१८ सृष्टिस्थितौ तु विष्णुः १२१ सौ. सु. २.१० स्वाधिकारे परे धाम्नि ३७४ शै. त. सृष्टौ शक्तेर्नियत १२२ सौ. सु. २.१८ स्वीकुर्यात् सततं वस्तु २९८ मु. क्र. सृष्ट्यादिभेदभिन्न १२३ सौ. सु. २.२० स्वेच्छाशक्त्युद्गीर्णं १४३ सौ. सु. सेवितो लोकनाथैस्तैः ३०५ स्व. सं. १.३० सैव महाविद्यात्मा १२ ० सौ. सु. २.१ स्वेच्छया स्वभित्तौ ६५ प्र. हृ. २ सैव मायाथ भोगार्थं १८६ स्व. सं. स्वेच्छयैव जगत्सर्वं १६, ११२, २९५, सोऽयं तैजसवैकारि १८८ स्व. सं. ३५२ आज्ञा. सोऽयं दृश्यार्थः स्यात् १२१ सौ. सु. २.९ स्वे महत्युदये धाम्नि २२० सं. प. स्थितिसृष्ट्यादिविभेदे १२२ सौ. सु. हंसवती क्षमापार्श्वं ४० स्व. सं. हकारोऽन्त्यः कला २४, १३३, १९२
४३४ योगिनीहृदयपरिशिष्टे हरवर्णयुगल १२१ सौ. सु. २. १२ हृत्सरोजान्तरे ध्यायन् २७६ प. क्र. हलाकारस्तु नादान्तो ४६ स्व. सं. हृदयात् सूर्यबिम्बं च २८८ स्व. सं. ह्रस्यार्थः स्यादत्र १२१ सौ. सु. २. १० हृदयादिबिलान्तं च ३७० शै. त. हूयते मनसा सार्धं २९६ वि. भै. १४६ हृल्लेखाकर्णिकामध्ये ३८ स्व. सं. हृत्पुण्डरीकं पुर ३४४ म. ना. ८. १६
विज्ञानभैरव (अनु० व्रजवल्लभ द्विवेदी) से मुक्त होने के लिए भारतीय दर्शनशास्त्र में जो उपाय कहे गये हैं उपायों का विशेष महत्त्व है। यौगिक उपाय कई प्रकार के हैं, जैसे योग, भक्तियोग, क्रियायोग आदि। प्रस्तुत शास्त्र विज्ञानभैरव सहज म कृति है। इसमें ११२ धारणाओं का वर्णन किया गया है। इनमें र्ववर्ती यौगिक पद्धतियों का उल्लेख समाविष्ट है। अपनी विश्वाहन्ता र आत्मा-परमात्मा की अद्वैतता का प्रतिष्ठापन करनेवाली यह कृति ए अतीव उपयोगी सिद्ध होगी। क और उनके हिन्दी अनुवाद के साथ पचास पृष्ठों की भूमिका, की और शब्दानुक्रमणी भी जोड़ दी गई हैं। मूल्य : (अजिल्द) रु० ४०; (सजिल्द) रु० ५५
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (अनु० जयदेवसिंह) सार का प्राचीन धर्म है। इस धर्म की तीन विधाएं हैं : (१) कर्णाटक २) तमिलनाडु का शैवसिद्धान्त, (३) कश्मीर का अद्वैत शैवधर्म। शैवधर्म को तीन शीर्षकों में विभक्त किया जा सकता है : (१) (२) स्पन्दशास्त्र, (३) प्रत्यभिज्ञाशास्त्र। प्रस्तुत कृति का विषय है इसमें शैव सिद्धान्तों की विशद व्याख्या की गई है। भिज्ञासूत्रों का तथा उनपर संस्कृत भाष्य का हिन्दी में अनुवाद किया गया है। साथ ही विस्तृत उपोद्घात, सार, टिप्पणियां, कोश णियां समाविष्ट हैं। शिवयोग की साधना के लिए यह ग्रन्थ अतीव मूल्य: रु० २०
श्री श्री परात्रिशिका (अनु० नीलकण्ठ गुरुटू) का कश्मीर शैवदर्शन से सम्बन्धित त्रिकाचार का एक प्रामाणिक न ग्रन्थ है। इसका मूल उद्गम 'रुद्रयामल' तन्त्र है। इस महान् अवतारणा किसी प्राचीन युग में अनुत्तरीय विमर्श में ही हुई थी। का दूसरा नाम 'अनुत्तरीय-सूत्र' भी है। इन सूत्रों में भगवान् अनुत्तरीय हृदय का अति अद्भुत विश्लेषण प्रस्तुत किया है। न तत्त्व की सौन्दर्यच्छटा का जितना और जैसा साक्षात्कार विश्वोत्तीर्ण- ना-लोक में विचरण करने से मिल सकता है उतना ही उसके श्वमय रूप-विस्तार में भी। अतः सर्वथा धरती के ही आधार पर अपने ज्ञानचक्षु के द्वारा, विश्वमयी हलचल में ही उस शाश्वत एवं त्मचेतना का स्पष्ट साक्षात्कार पा लेना ही वीरपुङ्गव का काम इस दुर्घट काम को पूरा करने के लिए पहले अपने ही अन्तस् में छिपी उजागर कर लेना आवश्यक है। यह कैसे हो सकता है? यही प्रस्तुत सन्देश है। मूल्य: (अजिल्द) रु० ७०; (सजिल्द) रु० १००
मोतीलाल बनारसीदास दिल्ली वाराणसी पटना
[ग्रन्थ-पृष्ठवंश / Book Spine] योगिनीहृदयम् व्रजवल्लभद्विवेदः मोतीलाल