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योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

४३४ योगिनीहृदयपरिशिष्टे हरवर्णयुगल १२१ सौ. सु. २. १२ हृत्सरोजान्तरे ध्यायन् २७६ प. क्र. हलाकारस्तु नादान्तो ४६ स्व. सं. हृदयात् सूर्यबिम्बं च २८८ स्व. सं. ह्रस्यार्थः स्यादत्र १२१ सौ. सु. २. १० हृदयादिबिलान्तं च ३७० शै. त. हूयते मनसा सार्धं २९६ वि. भै. १४६ हृल्लेखाकर्णिकामध्ये ३८ स्व. सं. हृत्पुण्डरीकं पुर ३४४ म. ना. ८. १६

विज्ञानभैरव (अनु० व्रजवल्लभ द्विवेदी) से मुक्त होने के लिए भारतीय दर्शनशास्त्र में जो उपाय कहे गये हैं उपायों का विशेष महत्त्व है। यौगिक उपाय कई प्रकार के हैं, जैसे योग, भक्तियोग, क्रियायोग आदि। प्रस्तुत शास्त्र विज्ञानभैरव सहज म कृति है। इसमें ११२ धारणाओं का वर्णन किया गया है। इनमें र्ववर्ती यौगिक पद्धतियों का उल्लेख समाविष्ट है। अपनी विश्वाहन्ता र आत्मा-परमात्मा की अद्वैतता का प्रतिष्ठापन करनेवाली यह कृति ए अतीव उपयोगी सिद्ध होगी। क और उनके हिन्दी अनुवाद के साथ पचास पृष्ठों की भूमिका, की और शब्दानुक्रमणी भी जोड़ दी गई हैं। मूल्य : (अजिल्द) रु० ४०; (सजिल्द) रु० ५५

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (अनु० जयदेवसिंह) सार का प्राचीन धर्म है। इस धर्म की तीन विधाएं हैं : (१) कर्णाटक २) तमिलनाडु का शैवसिद्धान्त, (३) कश्मीर का अद्वैत शैवधर्म। शैवधर्म को तीन शीर्षकों में विभक्त किया जा सकता है : (१) (२) स्पन्दशास्त्र, (३) प्रत्यभिज्ञाशास्त्र। प्रस्तुत कृति का विषय है इसमें शैव सिद्धान्तों की विशद व्याख्या की गई है। भिज्ञासूत्रों का तथा उनपर संस्कृत भाष्य का हिन्दी में अनुवाद किया गया है। साथ ही विस्तृत उपोद्घात, सार, टिप्पणियां, कोश णियां समाविष्ट हैं। शिवयोग की साधना के लिए यह ग्रन्थ अतीव मूल्य: रु० २०

श्री श्री परात्रिशिका (अनु० नीलकण्ठ गुरुटू) का कश्मीर शैवदर्शन से सम्बन्धित त्रिकाचार का एक प्रामाणिक न ग्रन्थ है। इसका मूल उद्गम 'रुद्रयामल' तन्त्र है। इस महान् अवतारणा किसी प्राचीन युग में अनुत्तरीय विमर्श में ही हुई थी। का दूसरा नाम 'अनुत्तरीय-सूत्र' भी है। इन सूत्रों में भगवान् अनुत्तरीय हृदय का अति अद्भुत विश्लेषण प्रस्तुत किया है। न तत्त्व की सौन्दर्यच्छटा का जितना और जैसा साक्षात्कार विश्वोत्तीर्ण- ना-लोक में विचरण करने से मिल सकता है उतना ही उसके श्वमय रूप-विस्तार में भी। अतः सर्वथा धरती के ही आधार पर अपने ज्ञानचक्षु के द्वारा, विश्वमयी हलचल में ही उस शाश्वत एवं त्मचेतना का स्पष्ट साक्षात्कार पा लेना ही वीरपुङ्गव का काम इस दुर्घट काम को पूरा करने के लिए पहले अपने ही अन्तस् में छिपी उजागर कर लेना आवश्यक है। यह कैसे हो सकता है? यही प्रस्तुत सन्देश है। मूल्य: (अजिल्द) रु० ७०; (सजिल्द) रु० १००

मोतीलाल बनारसीदास दिल्ली वाराणसी पटना


[ग्रन्थ-पृष्ठवंश / Book Spine] योगिनीहृदयम् व्रजवल्लभद्विवेदः मोतीलाल