१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६२ योगतत्त्वोपनिषद् जो न तो बहुत अधिक ऊँचा तथा न ही अतिनीचा हो, ऐसे वस्त्र, मृगचर्म या कुश के आसन पर बैठकर पद्मासन लगाना चाहिए ॥ ३५ ॥ ऋजुकायः प्राञ्जलिश्च प्रणमेदिष्टदेवताम् । ततो दक्षिणहस्तस्य अङ्गुष्ठेनैव पिङ्गलाम् ॥ ३६ ॥ निरुध्य पूरयेद्वायुमिडया तु शनैः शनैः। यथाशक्त्यविरोधेन ततः कुर्याच्च कुम्भकम् ॥३७ ॥ शरीर को सीधा रखकर, हाथ जोड़ते हुए इष्ट देवता को प्रणाम करे, तत्पश्चात् दाँयें हाथ के अँगूठे से पिंगला को दबाकर शनैः-शनैः वायु को भीतर की ओर खींचे तथा उसे यथा शक्ति रोककर कुम्भक करे ॥ पुनस्त्यजेत्पिङ्गलया शनैरेव न वेगतः। पुनः पिङ्गलयापूर्य पूरयेदुदरं शनैः ॥ ३८ ॥ धारयित्वा यथाशक्ति रेचयेदिडया शनैः। यया त्यजेत्तयापूर्य धारयेदविरोधतः ॥ ३९ ॥ तत्पश्चात् पिंगला द्वारा उस वायु को सामान्य गति से बाहर निकाल देना चाहिए। इसके बाद पिंगला से वायु को पेट में पुनः भर कर, शक्ति के अनुसार ग्रहण करके रेचक करे। इस प्रकार जिस तरफ के नथुने से वायु बाहर निकाले, उसी तरफ से पुनः भरकर दूसरे नथुने से बाहर निकालता रहे ॥ ३८-३९ ॥ जानु प्रदक्षिणीकृत्य न द्रुतं न विलम्बितम् । अङ्गुलिस्फोटनं कुर्यात्सा मात्रा परिगीयते ॥४० ॥ न तो अत्यन्त द्रुतगति से और न ही अत्यन्त धीमी गति से, वरन् सहज-सामान्य गति से जानु की प्रदक्षिणा करके एक चुटकी बजाए, इतने समय को एक मात्रा कहा जाता है ॥ ४० ॥ इडया वायुमारोप्य शनैः षोडशमात्रया । कुम्भयेत्पूरितं पश्चाच्चतुःषष्ट्या तु मात्रया ॥ ४१ ॥ रेचयेत्पिङ्गलानाड्या द्वात्रिंशन्मात्रया पुनः। पुनः पिङ्गलयापूर्य पूर्ववत्सुसमाहितः ॥ ४२ ॥ सर्वप्रथम 'इड़ा' में सोलह मात्रा तक वायु को खींचे, तत्पश्चात् चौंसठ मात्रा तक कुम्भक करे और तब इसके बाद बत्तीस मात्रा तक 'पिंगला' नाड़ी से रेचक करे। इसके बाद दूसरी बार 'पिंगला' से वायु खींचकर पहले की भाँति ही सारी क्रिया सम्पन्न करे ॥ ४१-४२ ॥ प्रातर्मध्यांदिने सायमर्धरात्रे च कुम्भकान् । शनैरशीतिपर्यन्तं चतुर्वारं समभ्यसेत् ॥ ४३ ॥ प्रातः, मध्याह्न, सायंकाल एवं अर्द्धरात्रि के समय चार बार धीरे-धीरे क्रमशः अस्सी कुम्भक तक का अभ्यास बढ़ाना चाहिए ॥ ४३ ॥ एवं मासत्रयाभ्यासान्नाडीशुद्धिस्ततो भवेत्। यदा तु नाडीशुद्धिः स्यात्तदा चिह्नानि बाह्यतः ॥ इस तरह से तीन मास तक अभ्यास करने से नाड़ी-शोधन हो जाता है। ऐसी शुद्धि होने से उस (श्रेष्ठ साधक) के चिह्न भी योगी की देह में दृष्टिगोचर होने लगते हैं ॥ ४४ ॥ जायन्ते योगिनो देहे तानि वक्ष्याम्यशेषतः । शरीरलघुता दीप्तिर्जठराग्निविवर्धनम् ॥ ४५ ॥ कृशत्वं च शरीरस्य तदा जायेत निश्चितम् । योगविघ्नकराहारं वर्जयेद्योगवित्तमः ॥ ४६ ॥ वे चिह्न ऐसे हैं कि शरीर में हल्कापन मालूम पड़ता है, जठराग्नि तीव्र हो जाती है, शरीर भी निश्चित रूप से कृश हो जाता है। ऐसे समय में योग में बाधा पहुँचाने वाले आहार का परित्याग कर देना चाहिए ॥४५- ४६ ॥ लवणं सर्षपं चाम्लमुष्णं रूक्षं च तीक्ष्णकम् । शाकजातं रामठादि वह्निस्त्रीपथसेवनम् ॥४७ प्रातः स्नानोपवासादिकायक्लेशांश्च वर्जयेत्। अभ्यासकाले प्रथमं शस्तं क्षीराज्यभोजनम्॥ नमक, तेल, खटाई, गर्म, रूखा, तीक्ष्ण भोजन, हरे साग, हींग आदि मसाले, आग से तापना, स्त्री प्रसंग, अधिक चलना, प्रातः काल का स्नान, उपवास तथा अपने शरीर को पीड़ा पहुँचाने वाले अन्य कार्यों को प्रायः त्याग ही देना चाहिए। अभ्यास की प्रारम्भिक अवस्था में दुग्ध, घृत का भोजन ही सर्वश्रेष्ठ है ॥ ४७-४८ ॥