१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६४ योगतत्त्वोपनिषद् वर्जयित्वा स्त्रियाः सङ्गं कुर्यादभ्यासमादरात् । योगिनोऽङ्गे सुगन्धश्च जायते बिन्दुधारणात् ॥ अतः स्त्रियों का चिन्तन न करके दृढ़ निश्चयी होकर, निरन्तर अभ्यास करते रहना चाहिए। वीर्य को धारण करने से योगी के शरीर से सुगन्ध आने लगती है ॥ ६२ ॥ ततो रहस्युपाविष्टः प्रणवं प्लुतमात्रया । जपेत्पूर्वार्जितानां तु पापानां नाशहेतवे ॥ ६३ ॥ तदनन्तर एकान्त स्थल पर बैठकर प्लुत मात्रा (तीन मात्रा) से युक्त प्रणव (ॐकार) का जप करते रहना चाहिए, जिससे पूर्व जन्मों के पापों का विनाश हो जाए ॥ ६३ ॥ सर्वविघ्नहरो मन्त्रः प्रणवः सर्वदोषहा । एवमभ्यासयोगेन सिद्धिराम्भसंभवा ॥ ६४॥ यह ओंकार मंत्र सभी तरह के विघ्न-बाधाओं एवं दोषों का हरण करने वाला है। इसका निरन्तर अभ्यास करते रहने से सिद्धियाँ हस्तगत होने लगती हैं ॥ ६४ ॥ ततो भवेद्धटावस्था पवनाभ्यासतत्परा । प्राणोऽपानो मनो बुद्धिर्जीवात्मपरमात्मनोः ॥६५॥ अन्योन्यस्याविरोधेन एकता घटते यदा । घटावस्थेति सा प्रोक्ता तच्चिह्नानि ब्रवीम्यहम् ॥ ६६ इसके पश्चात् वायु-धारण का अभ्यास करना चाहिए। इस क्रिया से घटावस्था की प्राप्ति सहज रूप से होने लगती है। जिस अभ्यास में प्राण, अपान, मन, बुद्धि, जीव तथा परमात्मा में जो पारस्परिक निर्विरोध एकता स्थापित होती है, उसे घटावस्था कहा गया है। उसके चिह्नों का वर्णन आगे के श्लोकों में करते हैं ॥ ६५-६६ ॥ पूर्वं यः कथितोऽभ्यासश्चतुर्थांशं परिग्रहेत् । दिवा वा यदि वा सायं याममात्रं समभ्यसेत् ॥६७ एकवारं प्रतिदिनं कुर्यात्केवलकुम्भकम् । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यो यत्प्रत्याहरणं स्फुटम् ॥६८ योगी कुम्भकमास्थाय प्रत्याहारः स उच्यते । यद्यत्पश्यति चक्षुर्भ्यां तत्तदात्मेति भावयेत् ॥ ६९ पूर्व में जितना अभ्यास योगी करता था, उसका चतुर्थ भाग ही अब करे। दिन अथवा रात्रि में मात्र एक प्रहर ही अभ्यास करना चाहिए। दिन में एक बार ही 'केवल-कुम्भक' करे एवं कुम्भक में स्थिर होकर इन्द्रियों को उनके विषयों से खींचकर लाये, यही प्रत्याहार होता है। उस समय आँखों से जो कुछ भी देखे, उसे आत्मवत् समझे ॥ ६७-६९ ॥ यद्यच्छृणोति कर्णाभ्यां तत्तदात्मेति भावयेत् । लभते नासया यद्यत्तत्तदात्मेति भावयेत् ॥ ७० जो भी कुछ कर्णेन्द्रिय से श्रवण करे तथा जो कुछ भी नासिका के द्वारा सूँघे, उस सभी को आत्म- भावना से ही स्वीकार करे ॥ ७० ॥ जिह्वया यद्रसं ह्यत्ति तत्तदात्मेति भावयेत् । त्वचा यद्यत्स्पृशेदद्योगी तत्तदात्मेति भावयेत् ॥ ७१ जिह्वा के माध्यम से जो भी कुछ रस ग्रहण करे, उसको भी आत्मरूप जाने। त्वचा से जो कुछ भी स्पर्श हो, उसमें भी अपनी आत्मा की ही भावना करे ॥ ७१ ॥ एवं ज्ञानेन्द्रियाणां तु तत्तदात्मनि धारयेत् । याममात्रं प्रतिदिनं योगी यत्नादतन्द्रितः ॥ ७२ ॥ इसी तरह से ज्ञानेन्द्रियों के जितने भी विषय हैं, उन सबको योगी अपनी अन्तरात्मा में धारण करे तथा प्रतिदिन एक प्रहर तक इस (क्रिया) का आलस्य त्यागकर प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करे ॥ ७२ ॥ यथा वा चित्तसामर्थ्यं जायते योगिनो ध्रुवम् । दूरश्रुतिर्दूरदृष्टिः क्षणादूरागमस्तथा ॥ ७३ ॥ वाक्सिद्धिः कामरूपत्वमदृश्यकरणी तथा। मलमूत्रप्रलेपेन लोहादेः स्वर्णता भवेत् ॥ ७४ ॥ खे गतिस्तस्य जायेत संतताभ्यासयोगतः । सदा बुद्धिमता भाव्यं योगिना योगसिद्धये ॥ ७५ ॥