भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

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३१८ संन्यासोपनिषद् एकान्नं मदमात्सर्यं गन्धपुष्पविभूषणम्। ताम्बूलाभ्यञ्जने क्रीडा भोगाकाङ्क्षा रसायनम्॥ १०४ ॥ कत्थनं कुत्सनं स्वस्ति ज्योतिश्च क्रयविक्रयम्। क्रिया कर्मविवादश्च गुरुवाक्य- विलङ्घनम्॥ १०५॥ संधिश्च विग्रहो यानं मञ्चकं शुक्लवस्त्रकम्। शुक्रोत्सर्गो दिवास्वापो भिक्षाधारस्तु तैजसम् ॥१०६॥ विषं चैवायुधं बीजं हिंसां तैक्ष्ण्यं च मैथुनम्। त्यक्तं संन्यासयोगेन गृहधर्मादिकं व्रतम् ॥ १०७॥ गोत्रादिचरणं सर्वं पितृमातृकुलं धनम्। प्रतिषिद्धानि चैतानि सेवमानो व्रजेदधः ॥ १०८॥ एकान्न, घमण्ड और मत्सरता, गन्ध, पुष्प, आभूषण, पान खाना, तेल लगाना, क्रीड़ा, भोग की आकांक्षा, रसायन, खुशामद करना, निन्दा, कुशल, प्रश्न, खरीदने-बेचने की बातें, क्रियाकर्म, वाद-विवाद, गुरु के वाक्य का उल्लंघन, सन्धि विग्रह की बातें, पलङ्ग, सफेद वस्त्र, वीर्य त्याग, दिन में शयन करना, भिक्षा पात्र, स्वर्ण, विष, शस्त्र, जीव, हिंसा, क्रोध तथा मैथुन-इन सभी का संन्यासी पूर्णरूप से परित्याग कर दे। जो गृहस्थियों के धर्म, व्रत, गोत्रादि के आचरण, पिता तथा माता के कुल की सम्पत्ति आदि निषिद्ध कहे गये हैं, इन सभी का सेवन करने से नीच गति की प्राप्ति होती है ॥ १०४-१०८॥ सुजीर्णोऽपि सुजीर्णासु विद्वांस्त्रीषु न विश्वसेत्। सुजीर्णास्वपि कन्थासु सज्जते जीर्णमम्बरम् ॥१०९ स्थावरं जङ्गमं बीजं तैजसं विषमायुधम्। षडेतानि न गृह्णीयाद्यतिर्मूत्रपुरीषवत् ॥ ११०॥ वृद्धावस्था को प्राप्त विद्वान् संन्यासी को वृद्धा स्त्री पर भी विश्वास नहीं करना चाहिए; क्योंकि पुरानी गुदड़ी (कथरी) में पुराना वस्त्र ही लगाया जाता है। स्थावर (जड़), जंगम, बीज, सुवर्ण, विष, आयुध आदि इन छः वस्तुओं को संन्यासी मूत्र एवं विष्ठा के समतुल्य त्याज्य समझ करके कभी ग्रहण न करे ॥ १०९-११० नैवाददीत पाथेयं यतिः किंचिदनापदि। पक्वमापत्सु गृह्णीयाद्यावदन्नं न लभ्यते॥ १११॥ आपत्ति कालीन समय के अतिरिक्त रास्ते के लिए संन्यासी को अपने पास कुछ भी नहीं रखना चाहिए। कुयोग वश यदि अन्न न प्राप्त हो, तो पक्वान्न (पका हुआ अन्न) प्राप्त कर लेना चाहिए ॥ १११॥ नीरुजश्च युवा चैव भिक्षुर्नावसथे वसेत्। परार्थं न प्रतिग्राह्यं न दद्याच्च कथंचन॥ ११२॥ स्वस्थ तथा युवावस्था को प्राप्त हुए संन्यासी को कभी भी किसी के घर में नहीं रुकना चाहिए। दूसरे किसी की कोई भी वस्तु न लेनी चाहिए और न ही किसी को अपनी वस्तु देनी चाहिए ॥ ११२ ॥ दैन्यभावात्तु भूतानां सौभागाय यतिश्चरेत्। पक्वं वा यदि वाऽपक्वं याचमानो व्रजेदधः ॥ ११३ ॥ संन्यासी को दूसरे अन्य भूत-प्राणियों के कल्याण हेतु दीनता (दया) का आचरण करना चाहिए। पका हुआ या फिर बिना पका हुआ अन्न माँगने से संन्यासी निम्न गति को प्राप्त करता है ॥ ११३ ॥ अन्नपानपरो भिक्षुर्वस्त्रादीनां प्रतिग्रही। आविकं वानाविकं वा तथा पट्टपटानपि ॥ ११४ ॥ प्रतिगृह्य यतिश्चैतान्यतत्येव न संशयः। अद्वैतं नावमाश्रित्य जीवन्मुक्तत्वमाप्नुयात् ॥ ११५ ॥ खाने-पीने वाले पदार्थों की सतत इच्छा रखने वाला एवं वस्त्रों में ऊनी वस्त्रों अथवा बिना ऊन से निर्मित वस्त्र, रेशमी वस्त्रादि वस्तुओं को स्वीकार करने से संन्यासी का निश्चित रूप से अधःपतन हो जाता है। उसे तो अद्वैतरूपी नौका में आसीन होकर जीवन-मुक्ति की अवस्था प्राप्त कर लेनी चाहिए ॥ ११४-११५॥ वाग्दण्डे मौनमातिष्ठेत्कायदण्डे त्वभोजनम्। मानसे तु कृते दण्डे प्राणायामो विधीयते ॥११६ यदि वाणी को दण्ड देना हो, तो (संन्यासी को) मौन रहना चाहिए, काया (शरीर) को दण्ड देना हो, तो भोजन नहीं करना चाहिए अर्थात् व्रत-उपवास रखे और यदि मन को दण्ड देने की इच्छा हो, तो फिर प्राणायाम करना चाहिए ॥ ११६ ॥

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