१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)
108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २ मन्त्र १२३ ३१९ कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया च विमुच्यते । तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति यतयः पारदर्शिनः ॥ ११७ ॥ समस्त प्राणी कर्मों के द्वारा बन्धन में बँधते हैं और विद्या (आत्मज्ञान) के द्वारा मुक्ति को प्राप्त करते हैं। इसी कारण ज्ञानवान् संन्यासी कर्म से सर्वदा दूर रहते हैं ॥ ११७ ॥ रथ्यायां बहुवस्त्राणि भिक्षा सर्वत्र लभ्यते । भूमिः शय्यास्ति विस्तीर्णा यतयः केन दुःखिताः ॥ (छोटी-छोटी) गलियों (वीथियों) में बहुत सारे प्राचीन वस्त्र प्राप्त हो जाते हैं तथा भिक्षा भी सर्वत्र प्राप्त होती रहती है। पृथिवी में चाहे जिस स्थान पर शयन करने हेतु स्थान मिल सकता है, तो फिर संन्यासी को और किस बात का दुःख है? ॥ ११८ ॥ प्रपञ्चमखिलं यस्तु ज्ञानाग्नौ जुहुयाद्यतिः । आत्मन्यग्नीन्समारोप्य सोऽग्निहोत्री महायतिः ॥ ११९ ॥ संन्यासी को सभी तरह के प्रपञ्च अर्थात् माया को ज्ञानाग्नि में भस्म कर देना चाहिए। जो संन्यासी अपनी अन्तरात्मा में ज्ञानरूपी अग्नि को समारोपित कर लेता है, वही महान् ज्ञानी-अग्निहोत्री कहलाता है ॥ प्रवृत्तिर्द्विविधा प्रोक्ता मार्जारी चैव वानरी । ज्ञानाभ्यासवतामोतुर्वानरीभाक्तमेव च ॥ १२० ॥ संन्यासियों की दो प्रकार की प्रवृत्ति होती है- १. मार्जारी और २. वानरी। जो संन्यासी ज्ञान का अभ्यास करते हैं, उनमें मुख्य रूप से मार्जारी प्रवृत्ति होती है और गौण रूप से वानरी प्रवृत्ति होती है ॥ १२० ॥ नापृष्टः कस्यचिद्ब्रूयान्न चान्यायेन पृच्छतः । जानन्नपि हि मेधावी जडवल्लोक आचरेत् ॥१२१ (किसी व्यक्ति के) बिना पूछे ही संन्यासी को नहीं बोलना चाहिए तथा अनीति एवं अन्यायपूर्वक प्रश्न करे, तब भी उसे नहीं बोलना चाहिए। ज्ञानवान् होकर भी संन्यासी को (जन सामान्य के समक्ष) मूढ़ के सदृश आचरण करना चाहिए ॥ १२१ ॥ सर्वेषामेव पापानां सङ्घाते समुपस्थिते । तारं द्वादशसाहस्रमभ्यसेच्छेद हि तत् ॥ १२२ ॥ यद्यपि किसी कारणवश पाप-प्रसङ्ग उपस्थित हो जाए, तो बारह हजार की संख्या में तारक मंत्र का जाप करके, उस पाप को विनष्ट कर देना चाहिए ॥ १२२ ॥ यस्तु द्वादशसाहस्रं प्रणवं जपतेऽन्वहम् । तस्य द्वादशभिर्मासैः परं ब्रह्म प्रकाशते इत्युपनिषद् ॥ १२३ ॥ जो संन्यासी नित्य-प्रतिदिन बारह हजार बार ॐकार रूपी प्रणव मंत्र का जप करता है, उसे बारह मास के अन्दर ही अविनाशी परब्रह्म का (अपने इष्ट का) साक्षात्कार हो जाता है। ऐसी यह (रहस्यमयी संन्यास) उपनिषद् है ॥ १२३ ॥ ॐ आप्यायन्तु ............. इति शान्तिः ॥ ॥ इति संन्यासोपनिषत्समाप्ता ॥