भारतकोश
१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 312, कुल 414 में से

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॥ सुबालोपनिषद् ॥ यह उपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद से सम्बद्ध है। इसमें कुल सोलह खण्ड हैं, जिसमें प्रश्नोत्तर शैली में अध्यात्मदर्शन के गूढ़ विषयों का विवेचन प्रस्तुत किया गया है। पहले-दूसरे खण्ड में रैक्व ऋषि के द्वारा प्रश्न पूछे जाने पर घोरांगिरस ने सृष्टि प्रक्रिया के शुभारम्भ तथा विराट् ब्रह्म द्वारा सभी वर्णों, प्राणों, वेदों, वृक्षों, पशुओं-प्राणियों आदि के सृजन का उल्लेख है। तीसरे खण्ड में आत्मतत्त्व का स्वरूप तथा उसको जानने का उपाय बताया गया है। चौथे खण्ड में हृदय के मध्यभाग में आत्मा की संस्थिति, जो बहत्तर हजार नाड़ी समूहों में विद्यमान बताई गई है, पंचम खण्ड में अजर-अमर आत्मा की उपासना का उल्लेख चक्षु, श्रोत्र, नासिका, जिह्वा, त्वचा, मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त, वाक्, हाथ, पैर, पायु (गुदा), उपस्थ (जननेन्द्रिय) आदि के उपलक्षण के साथ किया गया है। छठवें खण्ड में चक्षु, श्रोत्र, घ्राण, जिह्वा आदि तथा आदित्य, रुद्र, वायु आदि ऋग्वेद, सामवेदादि सभी नारायण रूप हैं-ऐसा कहा गया है। सातवें खण्ड में पृथिवी, जल, वायु, तेज आदि में विद्यमान उस चेतना का उल्लेख जिसे पृथिवी, जल, तेज, वायु, मन, बुद्धि आदि जान नहीं पाते, वह भी नारायण का प्रतिरूप है। आठवें खण्ड में हृदय गुहा में विद्यमान आनन्दरूप आत्मतत्त्व का उल्लेख है। नौवें खण्ड में समस्त पदार्थ किसमें अस्त होते हैं-यह पूछे जाने पर चक्षु, श्रोत्र, नासिका आदि से होते हुए अन्ततः, तुरीय में विलीन होते हैं-यह कहा गया। दसवें खण्ड में सभी किसमें प्रतिष्ठित हैं ? इस प्रश्न का उत्तर विभिन्न लोकों के रूप में बताते हुए अन्त में आत्मस्वरूप परब्रह्म में प्रतिष्ठित बताया गया है। ग्यारहवें खण्ड में शरीर से आत्मा के उत्क्रमण का क्रम उल्लिखित है। बारहवें और तेरहवें खण्ड में संन्यासी-मोक्षार्थी के आहार-विहार और चिन्तन-मनन का ढंग वर्णित है। चौदहवें में एक-दूसरे के अन्न (भक्ष्य) का उल्लेख करते हुए मृत्यु को परमदेव के साथ एकाकार बताया गया है। पन्द्रहवें खण्ड में विज्ञान सब आत्मतत्त्व के शरीर के उत्क्रमण के बाद किसे. दग्ध करता है, इस परम्परा का उल्लेख है-प्राण, अपान, व्यान, उदान आदि के क्रम में अन्ततः मृत्यु को भी दग्ध कर देता है- यह बताते हुए कहा गया है कि उस समय न सत् रहता है, न असत् और न सदसत्। इसी को निर्वाण (मुक्ति) विद्या कहा गया है। सोलहवें खण्ड में इस उपनिषद् की महत्ता और फलश्रुति का वर्णन करते हुए बात समाप्त की गई है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ पूर्णमदः .................. इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य-अध्यात्मोपनिषद् ) ॥ प्रथमः खण्डः ॥ तदाहुः किं तदासीत्तस्मै स होवाच न सन्नासन्न सदसदिति ॥ १ ॥ ऋषियों की सभा में ऋषि प्रमुख रैक्व ऋषि के द्वारा सृष्टि के सन्दर्भ में प्रश्न किये जाने पर कि सृष्टि के पूर्व क्या था? घोराङ्गिरस ने कहा-सृष्टि के पूर्व न सत् था, न असत् और न सदसत् था ॥ १ ॥ तस्मात्तमः संजायते तमसो भूतादिर्भूतादेराकाशमाकाशाद्वायुर्वायोरग्निरग्नेरापोऽद्भ्यः पृथिवी ॥२॥ (इसके बाद क्या-क्या उत्पन्न हुआ ? इस प्रश्न के उत्तर में ऋषि ने कहा-सर्वप्रथम आदितत्त्व से) तम की उत्पत्ति हुई, तम से भूत आदि (अक्षर, अव्यक्त, अहंकार आदि) का आविर्भाव हुआ। भूतादि से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी उत्पन्न हुई ॥ २ ॥

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