१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 219, कुल 505 में से
संदर्भ में पढ़ेंमन्त्र ४१ २१९ इस नाद की ध्वनि प्रारम्भिक काल में समुद्र, मेघ, भेरी तथा झरनों से उत्पन्न ध्वनि के समान सुनायी देती है। इसके बाद बीच की अवस्था (मध्यमावस्था) में मृदङ्ग, घंटे और नगाड़े की भाँति यह ध्वनि सुनाई पड़ती है। अन्त में अर्थात् उत्तरावस्था में किङ्किणी, वंशी, वीणा एवं भ्रमर की ध्वनि के समान मधुर नाद- ध्वनि सुनायी पड़ती है। इस प्रकार सूक्ष्मातिसूक्ष्म होते हुए नाना प्रकार के नाद सुनायी पड़ते हैं ॥३४-३५॥ महति श्रूयमाणे तु महाभेर्यादिकध्वनौ। तत्र सूक्ष्मं सूक्ष्मतरं नादमेव परामृशेत् ॥ ३६ ॥ निरन्तर नाद का अभ्यास करते हुए जब भेरी आदि की ध्वनि (आवाज) तेजी से सुनायी पड़ने लगे, तब उसमें भी सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर नाद के सुनने का विचार करना चाहिए ॥ ३६ ॥ घनमत्सृज्य वा सूक्ष्मे सूक्ष्ममुत्सृज्य वा घने। रममाणमपि क्षिप्तं मनो नान्यत्र चालयेत् ॥ ३७ ॥ (नाद में रुचि रखने वाले साधक को चाहिए कि) वह घन नाद को छोड़कर सूक्ष्मनाद (मन्द ध्वनि) या फिर सूक्ष्म नाद का परित्याग करके घन नाद में मन को केन्द्रित करे। अन्यत्र और कहीं भी इधर-उधर मन को भ्रमित न होने दे ॥ ३७ ॥ यत्र कुत्रापि वा नादे लगति प्रथमं मनः। तत्र तत्र स्थिरीभूत्वा तेन सार्धं विलीयते ॥ ३८ ॥ साधक का मन सर्वप्रथम जहाँ-कहीं किसी भी सूक्ष्म (अतिमन्द) अथवा घननाद (अभेद्यध्वनि) में लगता है। उसको (मन को) वहीं केन्द्रित करना चाहिए। ऐसा करने से वह (चित्त) स्वयमेव तन्मय (विलीन) होने लगता है ॥ ३८ ॥ विस्मृत्य सकलं बाह्यं नादे दुग्धाम्बुवन्मनः। एकीभूयाथ सहसा चिदाकाशे विलीयते ॥ ३९ ॥ साधक का मन सभी सांसारिक बाह्य-प्रपंचों से विस्मृत होकर दूध में मिश्रित जल की भाँति नाद (ध्वनि) में एकीभूत हो जाता है। इस प्रकार वह (मन) नाद के साथ अकस्मात् ही चिदाकाश में स्वयं को विलय कर लेता है ॥ ३९ ॥ उदासीनस्ततो भूत्वा सदाभ्यासेन संयमी । उन्मनीकारकं सद्यो नादमेवावधारयेत् ॥ ४० ॥ संयमी पुरुष को चाहिए कि नाद-श्रवण से भिन्न विषयों-वासनाओं को उपेक्षित करके सतत अभ्यास द्वारा मन को तत्क्षण ही उस नाद में नियोजित करे और सदैव चिन्तन के द्वारा उसी में रमण करता रहे ॥ ४० ॥ सर्वचिन्तां समुत्सृज्य सर्वचेष्टाविवर्जितः । नादमेवानुसंदध्यान्नादे चित्तं विलीयते ॥ ४१ ॥ योगी साधक को चाहिए कि सतत चिन्तन करते हुए समस्त चिन्ताओं का परित्याग कर सभी तरह की चेष्टाओं से मन को हटाकर (उस) नाद का ही अनुसन्धान (श्रवण-मनन-चिन्तन) करे; क्योंकि (चिन्तन द्वारा सहज ही) चित्त का नाद में लय हो जाता है ॥ ४१ ॥