भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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१८६ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri त्रिशिखीब्राह्मण ने आदित्य लोक में जाकर भगवान् आदित्य से पूछा--"भगवन् ! देह क्या है ? प्राण क्या है ? कारण क्या है ? आत्मा क्या है ?" आदित्य भगवान् ने उत्तर दिया--"इस समस्त को शिव रूप जानो। वही नित्य, शुद्ध, निरंजन, विभु, अद्वय शिव अपने एक ही प्रकाश से सब को देख कर तप्त लोहे के पिण्ड के समान एक को अनेक रूपों में प्रकाशित करता है। यदि यह प्रश्न किया जाय कि वह प्रकाश करने वाला कौन हैं तो कहा जायगा कि अविद्या- युक्त ब्रह्म 'सत्' शब्द का वाच्य है। ब्रह्म से अव्यक्त, अव्यक्त से महत्, महत् से अहंकार, अहंकार से पाँच तन्मात्रा, पंच तन्मात्राओं से पञ्चमहाभूत और पञ्चमहाभूत से यह समस्त जगत उत्पन्न होता है। वह सम्पूर्ण क्या है ? यह भूतों के विकार से उत्पन्न विभाग रूप है। भूतों के विकार से एक ही पिण्ड के विभाग किस प्रकार होते हैं ? उन विभिन्न भूतों के कार्य कारण भेद से अंश तत्व, वाचक- वाच्य, स्थान-भेद, विषय, देवता कोश भेद--ये विभाग होते हैं। अन्त-करण, मन, बुद्धि, चित्त अहंकार पाँच आकाश हैं। समान, उदान, व्यान, अपान, प्राण--ये पाँच वायु हैं। श्रोत्र, त्वचा, जिह्वा, घ्राण---ये अग्नि से हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध--ये पाँच जल से हैं। वाणी, हाथ, पैर, गुदा और उपस्थ पृथ्वी से हैं ॥ १-५ ॥ ज्ञानसंकल्पनिश्चयानुसंधानाभिमाना आकाशकार्यान्तः- करणविषयाः। समीकरणोन्नयनग्रहणश्रवणोच्छ वासा वायुकार्य प्राणादिविषयाः । शब्दस्पर्शरूपरसगन्धा अग्निकार्यज्ञानेन्द्रिय- विषया अबाश्रिताः। वचनादानगमनविसर्गानन्दाः पृथिवीकार्य कर्मेन्द्रियविषयाः। कर्मज्ञानेन्द्रियविषयेषु प्राणतन्मात्रविषया अन्तर्भूताः। मनोबुद्धयोश्चत्ताहं कारौ चान्तर्भूतो॥६॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi