१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 212, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें२०४ ] [ त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषत् द्वात्रिंशन्मात्रया सम्यग्रे चयेत्पिङ्गलाऽनिलम् ॥६६ पहले आसन लगाकर, शरीर को सीधा रखकर, नासाग्र पर दृष्टि रखते, दाँतों को दांतों से स्पर्श न करते हुये, जिह्वा को तालु में रखकर, स्वस्थ चित्त और निरागम भावसे, शिर को आंकुचित करके, योगमुद्रा में हाथों को बाँधकर विधिपूर्वक प्राणायाम करे। रेचक, पूरक, वायु का शोधन तथा रेचक करे ॥ ६१--६३ ॥ इन चार विधियों से वायु को चलाने को प्राणायाम कहते हैं। दाहिने हाथ से नासापुटों को दबाकर पिङ्गला ( दाँयी नासिका ) से वायु को बाहर निकाले । फिर सोलह मात्रा से वायु को भीतर खींचे और चौंसठ मात्रा में कुम्भक करे और बत्तीस मात्रा से उस वायु को पिंगला द्वारा बाहर निकाल दे ॥ ६६ ॥ एवं पुनः पुनः कार्यं व्युत्क्रमानुक्रमेण तु । संपूर्णकुम्भवद्देहं कुम्भयेन्मातरिश्वना ॥६७ पूरणान्नाडयः सर्वाः पूर्यन्ते मातरिश्वना । एवं कृते सति ब्रह्मंश्चरन्ति दश वायवः ॥६८ हृदयाम्भोरुहं चापि व्याकोचं भवति स्फुटम् । तत्र पश्येत्परात्मानं वासुदेवमकल्मषम् ॥६६ प्रातर्मध्यन्दिने सायमर्धरात्रे च कुम्भकान् । शनैरशीतिपर्यन्तं चतुर्वारं समभ्यसेत् ॥१०० इस प्रकार बारम्बार क्रम और विपरीत क्रम से अभ्यास करे और देह के भीतर भरे वायु को कुम्भ के समान रोके ॥ ६७ ॥ इससे सब नाड़ियाँ वायु से भर जाती हैं और उनमें दसों वायु भली प्रकार चलने लगते हैं ॥ ६८ ॥ तब हृदयरूपी कमल विकसित होकर स्पष्ट हो जाता है और वहाँ भगवान् वासुदेव के दर्शन होने लगते हैं