भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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सीतोपनिषत् ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ॥ स्थिरैरङ्गैस्तुष्टु वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥ स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः ॥ स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । शान्तिपाठ—हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आंखों से कल्याण को देखें । सुदृढ़ अङ्गों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते रहें और देवताओं ने हमारे लिए जो आयुष्य नियत कर दिया है, उसे भोगें । महान कीर्ति वाला इन्द्र हमारा कल्याण करे, सब को जानने वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें, जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे गरुड़देव हमारा कल्याण करें और वृहस्पति हमारा कल्याण करें ! ॐ शान्ति, शान्ति, शान्ति ॥ देवा ह वै प्रजापतिमब्रुवन् का सीता किं रूपमिति ॥१ स होवाच प्रजापतिः सा सीतेति— मूलप्रकृतिरूपत्वात् सा सीता प्रकृतिः स्मृता । प्रणवप्रकृतिरूपत्वात् सा सीता प्रकृतिरुच्यते ॥२ सीता इति त्रिवर्णात्मा साक्षान्मायामया भवेत् । विष्णुः प्रपञ्चबीजं च माया ईकार उच्यते ॥३ सकारः सत्यममृतं प्राप्तिः सोमश्च कीर्त्यते । तकारस्तारलक्ष्म्या च वै राजामृतकरः स्मृतः ॥४