१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 524, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ेंCC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri सीतोपनिषत् ५१६ ] ईकाररूपिणी सोमाऽमृतावयव दिव्यलङ्कारसङ् मौक्तिका- द्याभरणालंकृता महामायाऽव्यक्तरूपिणी व्यक्ता भवति ॥५॥ प्रथमा शब्दब्रह्मयी स्वाध्यायकाले प्रसन्ना । उद्भूवा नरकात्मिका द्वितीया भूतले हलाग्रे समुत्पन्ना । तृतीया ईकार- रूपिणी अव्यक्तस्वरूपा भवतीति सीता इत्युदाहरन्ति शौनकीये ॥ ६ ॥ एक समय की बात है प्रजापति ब्रह्माजी से देवताओं ने प्रश्न किया—'भगवन् ! सीताजी का रूप कैसा है, वे कौन हैं यह हमारे प्रति कहिये ।' । १ । तब वे प्रजापति ब्रह्माजी कहने लगे—'सीताजी शक्ति रूपिणी हैं। मूल प्रकृति होने से वे ही प्रकृति कही जाती हैं। प्रणव की प्रकृति रूपा होने से भी उन्हें प्रकृति कहते हैं।' । २ । वे साक्षात् योगमाया ही हैं। उनका सीता नाम तीन वर्णों का है। सम्पूर्ण विश्व प्रपंच के बीज भगवान् विष्णु हैं। उनकी योगमाया का रूप ईराक हैं। ॥ ३ ॥ 'स' कार को सत्य, अमृत, सिद्धि, चन्द्र तथा प्राप्ति का वाचक कहते हैं। दीर्घ अकारयुक्त 'त' कार विस्तार करने वाला एवं महालक्ष्मी रूप वाला कहा है। ईराक वाली अव्यक्त महामाया अपने अमृतमय अवयवों और दिव्याभूषणों से विभूषित रूप से व्यक्त होती हैं । ५ । वे त्रयरूपा अपने प्रथम रूप में शब्दब्रह्म से युक्त हैं । वे प्रसन्न होकर बुद्धि रूप से बोध देने वाली हैं। वे अपने द्वितीय रूप में जब इस भूतल पर व्यक्त हुईं तब जनक की यज्ञ भूमि में हल के अग्र भाग से प्रकट हुईं । उनका तृतीय रूप ईकारमय एवं अव्यक्त है। यही तीन रूप पर्याप्त रूप से सीता कहे गए हैं। शौनकीय तन्त्र में कहा है । ६ । श्रीरामसान्निध्यवशाज्जगदाधारकारिणी । उत्पत्तिस्थितिसंहारकारिणी सर्वदेहिनाम् ॥७ सीता भवति ज्ञेया मूलप्रकृतिसंज्ञिता