भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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सीतोपनिषत् [CO. In Public Domain. Digitization by eGangotri[ ५१७ प्रणवत्वात् प्रकृतिरिति वदन्ति ब्रह्मवादिनः ॥ इति ॥८ अथातो ब्रह्मजिज्ञासेति च ॥ ९ ॥ सेयं सर्ववेदमयी सर्व- देवमयी सर्वलोकमयो सर्वकीर्तिमयी सर्वधर्ममयी सर्वाधारकार्य- कारणमयी महालक्ष्मीर्देवेशस्य भिन्नाभिन्नरूपा चेतनाचेतना- त्मिका ब्रह्मस्थावरात्मा तद्गुणकर्मविभागभेदाच्छरीररूपा देवर्षि- मनुष्यगन्धर्वरूपा असुरराक्षसभूतप्रेतपिशाचभूतादिभूतशरीर- रूपा भूतेन्द्रियमनःप्राणरूपेति विज्ञायते ॥ १० ॥ श्रीराम के नित्य सान्निध्य के कारण सीताजी विश्व का कल्याण करने वाली हैं। वे ही सब प्राणियों की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश करती हैं। ७। वही मूल प्रकृति के रूप में प्रसिद्ध षडैश्वर्य से युक्त भगवती हैं। प्रणवस्वरूपा होने से ब्रह्मवेत्ता उन्हें प्रकृति कहते हैं। ८। वे सीताजी सर्वदेवता स्वरूपा, सर्ववेद-रूपिणी, सर्वलोकमयी, सबकी आश्रयभूता, सर्व कीर्तियों से सम्पन्न, सर्वधर्म-सम्पन्न, सभी पदार्थों और जीवों की आत्मा, सब देव-गन्धर्व, मनुष्य आदि प्राणियों की स्वरूपभूता हैं। वे सभी प्राणियों की देहरूपा और समस्त विश्वरूपा महालक्ष्मी हैं। वे भगवान् से भिन्न और अभिन्न भी कही जाती हैं ॥६-१०॥ सा देवी त्रिविधा भवति शक्त्यात्मना इच्छाशक्तिः क्रिया- शक्तिः साक्षाच्छक्तिरिति ॥ ११ ॥ इच्छाशक्तिस्त्रिविधा भवति श्रीभूमिनीलाऽऽत्मिका भद्र- रूपिणी प्रभावरूपिणी सोमसूर्याग्निरूपा भवति ॥ १२ ॥ सोमात्मिका ओषधीनां प्रवति कल्पवृक्षपुष्पफललता- गुल्मात्मिका औषधभेषजात्मिका अमृतरूपा देवानां महस्तोम- फलप्रदा अमृतेन तृप्तिं जनयन्ती देवानामन्नेन पशूनां तृणेन तत्तज्जीवानाम् ॥ १३ ॥ सूर्यादिसकलभुवनप्रकाशिनी दिवा रात्रिः कालकलानि- Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi