१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 529, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ेंसीतोपनिषत् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ५२१ वास्तुवेदो धनुर्वेदो गान्धवो दैत्रिकस्तथा । आयुर्वेदश्च पञ्चैते उपवेदाः प्रकीर्तिताः ॥३० दण्डो नीतिश्च वार्ता च विद्या वायुजयः परः । एकविंशतिभेदोऽयं स्वप्रकाशः प्रकीर्तितः ॥३१ उस पर्वत पर सर्वार्थ व्यक्त करने वाला वेदत्रयी स्वरूप आदि शास्त्र है । वही ऋक्, यजु और सामात्मक शास्त्र कार्य सिद्धि के लिए चार नामात्मक हो जाता है । यज्ञकर्म में देवस्वरूपादि तीन का उपभोग होने के कारण उन वेदों की तीन ही गणना करते हैं । चौथा अथर्वाङ्गि- रस वेद उन तीनों वेदों का ही स्वरूप है ॥ २१-२३ ॥ 'ऋग्वेद की इक्कीस, यजुर्वेद की एक सो नौ, सामवेद की एक सहस्र तथा अथर्व की पाँच शाखायें कही जाती हैं। इनमें प्रथम वैखा- नस मत ही प्रत्यक्ष दर्शन माना है । इसलिए ऋषिगण वैखानस का स्मरण किया करते हैं। ज्ञानी पुरुष वेदों के साथ कल्प, व्याकरण, शिक्षा, निरुक्त ज्योतिष और छन्द इन छः वेदाङ्गों तथा अयन, मीमांसा और न्यायशास्त्र का विस्तार इन तीनों उपाङ्गों आदि का भी अध्ययन करते हैं। इतिहास-पुराण वास्तुवेद, धनुर्वेद, गांधर्ववेद तथा आयुर्वेद यह पांच उपवेद हैं। इन सब के साथ ही व्यापार, दण्ड, नीति एवं पर- तत्व में स्थिति आदि विषयों से समन्वित स्वयं प्रकट हुए विभिन्न शास्त्र हैं ॥ २४-३१ ॥ वैखानसऋषेः पूर्वं विष्णोर्वाणी समुद्भवत् । त्रयीरूपेण संकल्प्य एत्थं देही विजृम्भते ॥३२ संख्यारूपेण संकल्प्य वैखानसऋषेः पुरा । उदितो यादृशः पूर्वं तादृशं शृणु मेऽखिलम् ॥ शश्वद्ब्रह्ममयं रूपं क्रियाशक्तिरुदाहृता ॥३३ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi