भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 418 में से

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गुलामीगिरी की अत्यंत तीव्र उष्णता में पिघलना पड़ा, इसीलिए आज उनका एक संगठित सुंदर और सबल व्यक्तित्व बना है, यह भी कोई अस्वीकार नहीं कर सकता। वैसी ही ऐतिहासिक उत्क्रांति से भारतभूमि की घटना गुजर रही थी। गुलामी की आंच हिंदुस्थानी लोगों को अच्छी तरह लग जाने से वे संगठित होने लगे थे। परंतु पंजाब को यह गुलामगिरी की आंच पूरी तरह लगने में दस वर्ष की अवधिंक कम थी और इसीलिए विशेषतः सिख सन् 1857 के उबलते राष्ट्र-तेज में विलीन न हो सके थे। 59 पंजाब के अंग्रेज अधिकारियों के ध्यान में यह सत्य आ गया था और इसीलिए उन्होंने सिखों और जाटों में मुसलमानों के प्रति द्वेष अधिक-से-अधिक भड़का देने का कार्य शुरू किया। सिख लोगों में मान्य एक पुराने भविष्य कथन का उन्हें स्मरण कराया गया। पहले मुगल बादशाह ने जहां अपने गुरु को मार डाला था उसी दिल्ली पर 'खालसा साहब' एक बार हमला कर उसे धूल में मिला देनेवाले हैं, ऐसा भविष्य संदेश हर सिख को दिया गया था। उस भविष्य कथन की पूर्णता का 'कंपनी साहब' को क्या लाभ? बहादुरशाह के स्थान पर कोई रणजीत सिंह दिल्ली पर राज्य करने लगेगा? हिंदुस्थान में रणजीत सिंह और बहादुरशाह दोनों ही न हों, इस हेतु जो प्रयास कर रहे थे उनको एकांगी भविष्य में कुछ संशोधन करना आवश्यक और सहज था। संशोधन करके जारी किए गए भविष्य के नए संस्करण में ऐसा लिखा हुआ था कि दिलली मिट्टी में तब ही मिलेगी जब खालसा साहब और कंपनी साहब एक होंगे। भविष्य तो भविष्य ही है। एक बात बुरी है, वह यह कि आज के भविष्य कल भूत हो जाते हैं। पर कम-से-कम आज जितना हो सके उतना लाभ ले लेना बुद्धिमानी है। इस भविष्य के अतिरिक्त सिख लोगों में दिल्ली के प्रति अधिक गुस्सा दिलाने के लिए एक झूठी घोषणा की गइ कि दिल्ली में बादशाह ने यह आदेश जारी किया है कि 'सारे सिखों को एक साथ कत्ल किया जाए!' अरे रे! बेचारा गरीब बादशाह!! इसी समय वह दिल्ली की सड़कों पर स्वयं घूम-घूमकर यह कह रहा था कि यह युद्ध केवल फिरंगियों के विरूद्ध है, अतः स्वदेशी लोगों को खरोंच तक न लगने दी जाए। परंतु क्रांतिकारियों के बहुत जोर लगाने पर भी सिख अंग्रेजों की ओर ही रहे। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 128 59 1. सर जॉन लॉरेंस ने अपने 21 अक्तूबर, 1857 को लिखे गए एक पत्र में लिखा था-“यदि सिख हमारे विरूद्ध क्रांतिकारियों के साथ मिल जाते तो हमारी रक्षा करना मानवी शक्ति से परे था। किसी को यह आशा नहीं थी, न ही कोई यह कल्पना ही कर पाया था कि अपनी राष्ट्रीय स्वतंत्रता को हड़पनेवालों से प्रतिशोध लेने का अवसर ये लोग गंवा देंगे और इस लोभ का संवरण कर लेंगे।।” 2. मेटकॉफ कृत-‘टू नेटिव नैरेटिव्स ऑफ द म्युटिनी’।

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