भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 126, कुल 418 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 126

कुल्हाड़ी चलते ही मुसलमानी सत्ता का नाम भी फिर से सुनाई न देगा। इसका समय पर ही कुछ उपचार करना होगा। यदि लखनऊ के इस प्रश्न का उस राजनितिपटु अमीर ने अस्पष्ट उत्तर दिया-‘‘जो होगा, देख लेंगे।‘’ परंतु काबुल के अमीर से अंग्रेजों का हाल ही में समझौता हो जाने के कारण उन्हें अमीर से अधिक पेशावर के नजदीक की स्वतंत्र मुसलमान जमातों से अधिक डर था और मुसलमानी जमातों में कोई अंग्रेजों से मिल न जाए, यह उपदेश करते सैकड़ों मुल्ला यात्रा पर निकले थे। पेशावर में इस समय जो अंग्रेज अधिकारी थे वे सारे ही साहसी, राजनीतिपटु और युद्ध-विशारद थे, इसमें कोई शंका नहीं। निकल्सन, एडवर्ड्स, चेंबरलेन आदि अधिकारियों के उत्साह के कारण और उन्हें जॉन लॉरेंस जैसे वरिष्ठ अधिकारी से प्राप्त अचूक सहायता के कारण पेशावर की ओर का यह संकट बड़े धैर्य से टाला गया। उन्होंने तत्काल ही जान लिया कि विद्रोह करना चाहनेवाली मुसलमान जमातों को किस तरह अपनी ओर करना चाहिए और धन का लालच मिलते ही वे सारे पहाड़ी लोग अंग्रेजी सेना में नौकरी पाने की जल्दी करने लगे। पहाड़ी लोगों को धनबल पर खरीदते ही जॉन लॉरेंस ने पंजाब में इधर-उधर सुलगते असंतोष को वहीं-का-वही दबा देने के लिए एक घुमंतू सेना का निर्माण किया। इस सेना में अनुभवी, कसे हुए, जिनकी ईमानदारी पर अंग्रेजों को पूरा विश्वास था, ऐसे नेटिव सिपाही एवं अंग्रेज सोल्जर लिये जाते। इस`सेना का गठन होते-होते ही उसके लिए एक काम तैयार हो गया, क्योंकि पेशावर की ओर के भारतीय सिपाहियों में मियां मीर की निःशस्त्रता की घटना का समाचार पहुंचते ही बडी खलबली मच गई थी, इसलिए इस भारतीय सेना पर स्वयं पहली चोट करने की योजना पेशावर के साहसी अंग्रेज अधिकारियों ने बनाई और वे इस सारी सेना को निःशस्त्र करने को तैयार हो गए। परंतु उस भारतीय सेना के अंग्रेज कमांडर आदि अधिकारियों को अपने सिपाहियों का यह अमपान बहुत बुरा लगा। सन् 1857 में जो एक विलक्षण गुप्तता चारों ओर रखी गई थी उसी के जाल में फंसे ये अंग्रेज अधिकारी यह मानने को बिल्कुल तैयार नहीं थे कि उनके अधीनस्थ सिपाही विद्रोह पर उतारू हैं। फिर भी कॉटन और निकल्सन ने इस नेटिव सिपाहियों को 21 मई को सुबह के समय यूरोपियन सेना से घेरकर निःशस्त्र करने का आदेश दिया। इस अकस्मात् हुए हमले से बच पाना असंभव है, यह देखकर सारे सिपाहियों ने अपने हथियार नीचे रखे और यह अपमान भरा कृत्य देखकर क्रोधित उनके अंग्रेज अधिकारी भी अपने सिपाहियों के साथ कंपनी को धिक्कारने लगे। पेशावर की नेटिव सेना को निःशस्त्र करने के बाद पंजाब सरकार को होती-मर्दानी में रखी 55वीं नेटिव रेजिमेंट की ओर देखने की फुरसत मिली। यह 55वीं नेटिव 1857 का स्वातंत्र्य समर - 130

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर) · पृष्ठ 126, कुल 418 में से · BharatKosha