भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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रेजिमेंट विद्रोही हो गई है, इस संबंध में सरकार को विश्वास हो गया था। परंतु उन सिपाहियों के मुख्य सैनिक अधिकारी कर्नल स्पॉटिस वुड को सरकार के इस संदेह पर बहुत खेद हुआ। हमारे सिपाही सरकार से कभी भी बेईमानी नहीं करेंगे, यह वह जी तोड़कर कहता रहा, फिर भी जब सरकार पर सवार खून नहीं उतरा तो उसका हृदय टूट गया। 24 मई को सिपाहियों के नेताओं ने कर्नल के पास आकर पूछा, "अंग्रेजी सेना पेशावर से हमपर हमला करने आ रही है, क्या यह समाचार सच है?" इस प्रश्न का कर्नल ने गोलमोल उत्तर दिया। सिपाहियों को उससे संतोष न होते हुए भी वे लौट गए। उस 55वीं नेटिव रेजिमेंट का पेशावर की सेना की तरह खात्मा करने के लिए अंग्रेजों सेना वास्तव में चढ़ी चली आ रही थी। वह दुष्टतापूर्ण कार्य देखते बैठने की अपेक्षा कर्नल स्पॉटिस वुड ने अपने कमरे में जाकर आत्महत्या कर ली। यह समाचार 55वीं रेजिमेंट को ज्ञात होते ही उसने खजाने पर हमला किया और अपने-अपने शस्त्र, निशान और वह खजाना लेकर वे सारे सिपाही फिरंगियों की गुलामी को लात-मारकर आगे चले। परंतु होती-मर्दान से दिल्ली कोई पास नहीं थी। सारा पंजाब यूरोपियनों की सुसज्ज सेना से अटा पड़ा था और यूरोपियन सेना पिछाड़ी पर टूटी पड़ रही थी। ऐसी स्थिति में सफलता इतनी कठिन थी कि पेशावर के सिपाहियों की तरह ही चुपचाप शस्त्र नीचे रखकर फिरंगियों की शरण जाने की बात भी उनके मन में आने लगी। परंतु अब फिरंगी दासता की बेड़ियां पैरों में डाल लेने की अपेक्षा यमपाश गले में डलवा लेना उन वीरों को पसंद आया और अपने पीछे लगी अंग्रेजी सेना को उसने यह बात कह दी कि - अब लड़ते-लड़ते प्राण दिए। इस 55वीं रेजिमेंट की कहानी भी इतनी हृदयद्रावक है कि उसे सुनने पर-'अपि ग्रावा रोदत्यपि दलति वज्रस्य हृदयम!' उनका पीछा करने के लिए निकल्सन इतना कठोर हो गया था कि वह चौबीस घंटे तक घोड़े से नीचे नहीं उतरा। सैंकड़ों लोग उस लड़ाई में मारे गए और शेष लड़ते-लड़ते सरहद के बाहर निकल गए। परंतु वहां भी उन्हें आश्रय कौन दें? वहां की मुसलमान जमातों ने उनका स्वागत बहुत ही भयंकर तरीके से किया। उनमें से हिंदुओं को अकेले-अकेले पकड़कर बलपूर्वक मुसलमान बनाया जाने लगा। उनमें से हिंदुओं को अकेले-अकेले पकड़कर बलपूर्वक मुसलमान बनाया जाने लगा। तब वे अभागे सिपाही यह सोचकर कि अपने हिंदुत्व की रक्षा करने में कश्मीर का हिंदू राजा समर्थ होगा, आश्रय पाने, धर्म-रक्षण करने एवं देश-सेवा करने गुलाब सिंह के प्रदेश की ओर चल पड़े। रास्ता पथरीला, वहां अन्न नहीं, वस्त्र नहीं, विश्राम नहीं-ऐसे संकटों और कठिनाइयों से जूझते वे सैकड़ों हिंदू सिपाही-अपने धर्म का आज तीनों लोकों में कोई त्राता नहीं, इस दुःख के अश्रु बहाते कश्मीर की ओर बढ़ रहे थे, तब उन्हें चींटियों, कीड़ों की तरह मसल डालने को अंग्रेजों ने हर कदम 1857 का स्वातंत्र्य समर -131