१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहुई । वे कैसे भी पुस्तक की प्रति प्राप्त करके अपने मित्रों को एक अलभ्य उपहार के नाते भेंट करते। ऐसे ही अंग्रेज मित्र सर चार्ल्स क्लीवलैंड से खिलाफत आंदोलन के प्रसिद्ध नेता मुहम्मद अली को यह पुस्तक पढ़ने को मिली थी। सन् 1910 में भारतीय क्रांतिकारियों पर ब्रिटिश दमन-चक्र घूमा। वीर सावरकर लंदन में गिरफ्तार करके भारत लाए गए और उन्हें दो जन्मों का कारावास दंड देकर काला पानी (अंडमान) भेज दिया गया। भारत में भी बड़ी संख्या में क्रांतिकारियों की धर-पकड़ हुई। बड़ी संख्या में उन्हें अंडमान टापू भेज दिया गया। इस आघात से थोड़ा संभलते ही मैडम कामा, लाला हरदयाल एवं वीरेन्द्र नाथ चट्टोपाध्याय आदि क्रांतिकारियों ने '1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर' का अंग्रेजी में दूसरा संस्करण प्रकाशित किया। पहला संस्करण तो निःशुल्क वितरित किया गया था। किंतु इस संस्करण का मूल्य रखा गया, ताकि क्रांतिकारी दल को थोड़ा-बहुत आर्थिक सहारा मिल सके। इस बीच लाला हरदयाल फरवरी 1911 में अमेरिका के पश्चिमी तट पर सान फ्रांसिस्को पहुंच गए। वहां बड़ी संख्या में पंजाबी सिक्ख व गैर-केशधारी बसे हुए थे। लाला हरदयाल ने सन् 1913 में गदर पार्टी की स्थापना की। नवंबर 1913 में उन्होंने उर्दू में 'गदर' नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया और जनवरी 1914 से गुरूमुखी लिपि में पंजाबी संस्करण शुरू किया। हरदयाल के मन पर सावरकर की रचना की गहरी छाप बैठी हुई थी। वे उसे दूसरे स्वातंत्र्य समर का पथ-प्रदर्शक मानते थे। इसलिए उन्होंने 'गदर' पत्रिका के उर्दू एवं पंजाबी संस्करणों में उस पुस्तक के अंशों को धारावाहिक छापना आरंभ कर दिया। सार्वजनिक सभाओं में भी उनका वाचन किया जाता। इस प्रकार इस पुस्तक के उर्दू व पंजाबी अनुवाद भी तैयार हो गए। सावरकर ने जो आशा की थी सन् 1857 का इतिहास लिखने के पीछे उनका मुख्य उद्देश्य देशभक्तों को द्वितीय स्वातंत्र्य समर की प्रेरणा व संगठन योजना प्रदान करना है, उसे उन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध के समय भारतीय सेनाओं में विद्रोह का मंत्र फूंका। 'कोमागाटामारू' नामक जहाज से क्रांतिकारियों के जत्थे शस्त्रास्त्रों के साथ भारत की ओर रवाना हुए। हांगकांग, सिंगापुर और बर्मा में स्थित ब्रिटिश सेनाओं में बगावत हुई। यह सब सावरकर द्वारा रचित '1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर' पुस्तक का ही चमत्कार था। इसके बाद इस ग्रंथ का एक संस्करण भारत में भगत सिंह के क्रांतिकारी दल ने प्रकाशित किया। सन् 1912 में शहीद भगत सिंह द्वारा इस पुस्तक के प्रकाशन की कहानी उनके एक अनन्य सहयोगी एवं प्रसिद्ध समाजवादी नेता राजाराम शास्त्री के शब्दों में ही कहना ठीक रहेगा। 'अमर शहीदों के संस्मरण' नामक अपनी रचना में राजाराम शास्त्री लिखते हैं 16