भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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स्थिति का लाभ उठाने के लिए जनवरी 1941 में ब्रिटिश सरकार की आंखों में धूल झोंककर भारत के विदेश पलायन के छह महीने पूर्व 22 जून, 1940 को उन्होंने बंबई में सावरकर के निवास-स्थान पर उनसे गुप्त मंत्रणा की थी। अतः यह कहा जा सकता है कि आजाद हिंद फौज के गठन और ब्रिटिश विरोधी रणनीति की प्रेरणा रासबिहारी बोस व सुभाषचंद्र बोस को सावरकर द्वारा लिखित ‘1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर’ पुस्तक से ही प्राप्त हुए थे। उसी को आदर्श रूप में सामने रखकर नेताजी ने रानी झांसी रेजीमेंट का गठन किया था। आजाद हिंद फौज के सेनाधिकारियों ने स्वीकार किया कि इस पुस्तक का एक संस्करण विशेष रूप से छपवाकर सैनिकों को पढ़ने के लिए दिया जाता था। अंग्रेजी के अतिरिक्त एक तमिल संस्करण का प्रकाशन भी हुआ था। इस ग्रंथ का पाठन बार-बार किया जाता था। तमिल संस्करण का संपादन आजाद हिंद फौज के एक प्रचार अधिकारी जयमणि सुब्रह्मण्यम ने किया था। उन्होंने स्वयं ही बताया कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस के आशीर्वाद से ही वह संस्करण तैयार हुआ था। सावरकर द्वारा लिखित इतिहास की इस महान रचना ने सन् 1914 के गदर आंदोलन से 1943-44 की आजाद हिंद फौज तक कम-से-कम दो पीढ़ियों को स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी। बंबई की ‘फ्री हिंदुस्तान’ साप्ताहिक पत्रिका ने मई 1946 में ‘सावरकर विशेषांक’ प्रकाशित किया, जिसमें के.एफ.नरीमन ने अपने लेख में स्वीकार किया कि ‘आजाद हिंद फौज की कल्पना और विशेषकर रानी रेजीमेंट के नामरण की मूल प्रेणा सन् 1857 की महान क्रांति पर वीर सावरकर की जब्तशुदा रचना में ही दिखाई देती है।’ ‘यदि सावरकर ने 1857 और 1943 के बीच हस्तक्षेप न किया होता तो मुझे विश्वास है कि आजाद हिंद फौज के ताजा प्रयासों को भी एक मामूली विद्रोह कह दिया गया होता। किंतु धन्यवाद है सावरकर की पुस्तक को कि ‘गदर’ शब्द का अर्थ ही बदल गया। यहां तक कि अब लॉर्ड वावेल भी नेताजी सुभाषचंद्र बोस के प्रयास को मामूली गदर कहने का साहस नहीं कर सकता। इस परिवर्तन का पूरा श्रेय सावरकर और केवल सावरकर को ही जाता है।’ द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद स्वतंत्रता की दस्तक सुनाई देने लगी थी। जनमानस में बहुत परिवर्तन आ गया था। महाराष्ट्र में सावरकर की सभी रचनाओं, विशेषकर ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ पर से प्रतिबंध हटाने की मांग ने एक जन-आंदोलन का रूप धारण कर लिया। एक सावरकर-भक्त एम.एस.गोखले ने गुप्त रूप से इस पुस्तक को छापकर घोषणा कर दी कि यदि पुस्तक पर से प्रतिबंध न हटाया गया तो वे सार्वजनिक रूप से पुस्त की ब्रिकी करके प्रतिबंध के कानून का 18