भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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उल्लंघन करेंगे। इस विषय पर प्रबल जन-भावनाओं को पहचानकर बंबई प्रांत की कांग्रेस सरकार ने मई 1946 में इस पुस्तक सहित सावरकर की सभी रचनाओं पर ब्रिटिश सरकार द्वारा लगाए गए प्रतिबंध के अड़तीस वर्ष पुराने आदेश को रद्द कर दिया। तब कहीं जाकर जनवरी 1947 में महान् ऐतिहासिक ग्रंथ का प्रथम कानूनी संस्करण प्रकाशित हो पाया। 10 जनवरी, 1947 का जी.एम.जोशी ने जब इस पुस्तक के प्रथम अधिकृत कानूनी संस्करण की भूमिका में इस पुस्तक का रोमांचकारी इतिहास लिखा तब तक पुस्तक की मूल मराठी पांडुलिपि उपलब्ध नहीं हुई थी और यह मान लिया गया था कि सावरकर द्वारा 1901 में लिखित सिक्ख इतिहास की पांडुलिपि के समान यह भी सदा के लिए खो गई है। जी.एम.जोशी लिखते हैं कि "सावरकर की गिरफ्तारी के बाद मूल मराठी पुस्तक की पांडुलिपि को मैडम कामा के पास पेरिस भेज दिया गया थां उन्होंने ब्रिटिश गुप्तचर विभाग के एजेंटों के हाथ में पड़ने से बचाने के लिए उस पांडुलिपि को बैंक ऑफ फ्रांस में अपने लॉकर में सुरक्षित छिपा दिया। फ्रांस पर जर्मनी के आक्रमण के कारण फ्रांस का शासन-तंत्र बुरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया। मैडम कामा की भी मृत्यु हो गई। फलतः बहुत खोजबीन के बाद भी उस पांडुलिपि कोई पता नहीं लग पाया। इस प्रकार मराठी साहित्य का एक महान् पुष्प खो गया और उसकी प्राप्ति की सभी आशाएं समाप्त हो गई।" किंतु वीर सावरकर के जीवनीकार धनंजय कीर के अनुसार, "भारत की स्वाधीनता-प्राप्ति के बाद वह पांडुलिपि सावरकर के पास बड़े नाटकीय ढंग से वापस लौट आई।" उनके अनुसार, "अभिनव भारत' के एक सदस्य गोआ निवासी जे.डी.एस. कोरिन्हो फ्रांस स्थित पुर्तगाली दूतावास की सहायता से उन उथल-पुथल के दिनों में उस पांडुलिपि को लेकर पहले पुर्तगाल और वहां से अमेरिका पहुंच गए। वे वाशिंगटन के एक कॉलेज में शिक्षक हो गए। तमाम कठिनाइयों और संकटों से जूझकर भी उन्होंने अड़तीस साल तक इस बहुमूल्य पांडुलिपि को सुरक्षित संजोकर रखा और भारत के स्वाधीन होने पर डॉ. डी.वाई. गोहकर नामक एक सज्जन के माध्यम से उसे सावरकर के पास वापस भेज दिया।" हरींद्र श्रीवास्तव अपनी पुस्तक 'फाइव स्टोर्मी ईयर्स : सावरकर इन लंदन' में इस कहानी में इतनी जानकारी और जोड़ते हैं कि "डॉ. गोहकर उस समय अमेरिका में पढ़ रहे थे और अब महाराष्ट्र राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष हैं।" हरींद्र के अनुसार, " पांडुलिपि सावरकर को मई 1949में प्राप्त हुई; पर उसमें वे दो अध्याय नहीं थे, जिन्हें ब्रिटिश गुप्तचर तंत्र ने पुस्तक पर प्रतिबंध लगने से पूर्व चोरी कर लिया था" उनका कहना है कि वीर सावरकर के भतीजे बालाराव सावरकर ने आवश्यक संशोधन करके मराठी ग्रंथ को भी प्रकाशित कर दिया है। 19