१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजनवरी 1947 के अंग्रेजी संस्करण में पुस्तक की यात्रा कथा को जी.एम.जोशी ने बालाराव के साथ मिलकर लिखा है। उस संस्करण के प्रकाशन की अनुमति स्वयं वीर सावरकर ने फोनिक्स प्रकाशन गृह को दी थी। तब वश्य ही जी. एम. जोशी एवं बाल सावरकर द्वारा संयुक्त रूप से लिखी गई पुस्तक-गाथा को वीर सावरकर ने देख लिया होगा। यहां कुछ प्रश्न खड़े होते है कि यदि मूल पांडुलिपि मैडम कामा के बैंक लॉकर में सुरक्षित थी तो वह कोरिन्हो के पास कब, कैसे पहुंची? यदि कीर के अनुसार, मई 1917 के पूर्व अड़तीस वर्ष वह कोरिन्हो के पास रही तो इसका अर्थ है कि सन् 1911 के लगभग ही वह उन्हें मिल गई होगी। मैडम कामा सन् 1935 में भारत आईं और 1916 में अपनी मृत्यु तक एक वर्ष तक यहां रहीं। उन दिनों वीर सावरकर जेल के बाहर रत्नागिरी जिले में स्थानबद्ध जीवन व्यतीत कर रहे थे। क्या उन दिनों मैडम कामा और उनका कभी कोई संपर्क नहीं हुआ? क्या मैडम कामा ने उन्हें पांडुलिपि कोरिन्हो को देने की बात नहीं बताई? जी.एम. जोशी के वर्णन से लगता है कि जानवरी 1947 तक बहुत खोजबीन के बाद भी उन पांडुलिपि का पता नहीं लग पाया था और उसे खोया हुआ मान लिया गया था। इसका अर्थ होता है कि एस समय तक वीर सावरकर को भी उस पांडुलिपि को कोई अता-पता नहीं था। क्या यह संभव है? दूसरा महत्त्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है कि यदि मई 1949 में वापस मिली पांडुलिपि में दो अध्याय नहीं थे, क्योंकि वे ब्रिटिश गुप्तचरों द्वारा चोरी कर लिये गए थे, तो यह चोरी कब हुई होगी? प्रतिबंध का आदेश 23 जुलाई, 1909 को जारी हुआ। अंग्रेजी अनुवाद उसके पूर्व प्रकाशित हो चुका था। अंग्रेजी अनुवाद मराठी मूल के आधार पर ही हुआ होगा। क्या हम यह मान लें कि मराठी पांडुलिपि के दो अध्यायों की चोरी अंग्रेजी अनुवाद पूरा हो जाने के बाद हुई? अंतिम प्रश्न यह उठता है कि बालाराव सावरकर ने मराठी पुस्तक को प्रकाशित करने के लिए उन दो अध्यायों को कैसे पूरा किया? क्या उन्होंने प्रकाशित अंग्रेजी अनुवाद का मराठी रूपांतर करके पुस्तक को पूरा किया? क्या उन्होंने प्रकाशित अंग्रेजी अनुवाद का मराठी रूपांतर करके पुस्तक को पूरा किया? वीर सावरकर 25 फरवरी, 1966 तक जीवित थे। 1947 में 1857 के स्वातंत्र्य समर का शताब्दी वर्ष भी उनके सामने मनाया गया। क्या उन्होंने मराठी ग्रंथ की पांडुलिपि के इतिहास पर कहीं कोई प्रकाश डाला? ये सभी प्रश्न पुस्तक के इतिहास को रहस्यपूर्ण बना देते हैं। 1957 में 1857 की क्रांति की शताब्दी के अवसर पर पुनः यह असमंजस खड़ा हुआ कि उस घटना को क्या कहें-गदर, क्रांति या स्वातंत्र्य समर? वरिष्ठ इतिहासकार आर.सी.मजूमदार ने उसे 'सिपाही विद्रोह' कहा तो उन्हीं के शिष्य डॉ, एस.बी.चौधरी ने उसे 'जन विद्रोह' का शीर्षक दिया। भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी ने उसे '1587 का विद्रोह' कहा। भारत सरकार ने विवाद से बचने के लिए इतिहासकार एस.एन. सेन द्वारा 20