१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 9, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया गया; क्योंकि समुद्र कस्टम्स ऐक्ट के अंतर्गत लिये गए किसी भी निर्णय को इंग्लैंड व यूरोप में भी प्रचारित करना पड़ता, जिससे वहां के भारतीय क्रांतिकारी सतर्क हो जाते हैं। 20 जुलाई, 1909 को घबराई हुई बंबई सरकार ने भारत सरकार को तार भेजा कि इस पुस्तक के वितरण को रोकना अत्याधिक महत्त्वपूर्ण है और वह पुस्तक किसी भी क्षण भारी मात्रा में भारत पहुंच सकती है। अतः हम भारत सरकार से विनम्रतापूर्वक भीख मांगते हैं कि बिना एक क्षण की देरी लगाए समुद्र कस्टम्स ऐक्ट की धारा 19 के अंतर्गत पुस्तक के भारत प्रवेश पर प्रतिबंध का आदेश जारी करें। जहां तक पुस्तक के परिचय का संबंध है, अभी तक प्राप्त जानकारी के अनुसार उसे भारतीय विद्रोह पर विनायक दामोदर सावरकर ने लिखा है। पुस्तक को पूरी तरह घेरने की दृष्टि से उसका परिचय यथासंभव व्यापक कर दिया जाए। आदेश जारी होते ही उसे इंग्लैंड प्रेषित कर दिया जाए। 21 जुलाई, 1990 को भारत सरकार के अधिकारी एच.ए.स्टुआर्ट ने टिप्पणी लिखी कि पुस्तक मराठी में होने के कारण बंबई सरकार बहुत घबराई हुई है। अतः प्रचार की परवाह न करके भी समुद्र कस्टम्स ऐक्ट के अंतर्गत प्रतिबंध का आदेश जारी करना उचित रहेगा। किंतु मेरी जानकारी है कि उस पुस्तक के अंग्रेजी और मराठी दोनों भाषाओं में संस्करण छप चुके हैं। अंग्रेजी संस्करण को लंदन में ए. बोन्नेर ने छापा है। पोस्ट ऑफिस ऐक्ट के अंतर्गत 11 जनवरी का आदेश केवल मराठी संस्करण पर लागू होता है, अतः आदेश की भाषा में संशोधन करना होगा। संशोधित आदेश में भाषा रखी जाए, 'भारतीय विद्रोह पर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा मारठी में लिखित पुस्तक या पैंफलेट और उसका अंग्रेजी अनुवाद या रूपांतर।' साथ ही स्टुआर्ट ने यह भी लिखा कि “बंबई सरकार का यह कथन कि घोषण-पत्र को तुरंत इंग्लैंड सूचित किया जाए, पुनर्विचार चाहता है। मेरे विचार से इंग्लैंड सूचना न भेजी जाए, क्योंकि पुस्तक की अधिक-से-अधिक प्रतियों को जब्त करने के लिए आवश्यक है कि इंग्लैंड में ही उसका जहाज से लदान रोका जाए। वहां नोटिस भेजने का परिणाम होगा कि सावरकर के मित्रगण को इसकी जानकारी हो जाएगी और वे प्रतिबंध के आदेश के उल्लंघन के नए-नए रास्ते खोज लेंगे।“ उसी दिन 21 जुलाई को क्रिमिनल इंटेलिजेंस के उप-निदेशक ए.बी. बर्नार्ड ने लिखित सूचना दी कि हमारी जानकारी के अनुसार सावरकर की पुस्तक का अभी तक केवल अंग्रेजी संस्करण ही छप पाया है और उसका शीर्षक' 1857 की क्रांति का इतिहास' या '1857 का इतिहास' रखा गया है। पुस्तक का प्रकाशन कार्य 24 जून तक पूर्ण हो जाना था। अतः अगली डाक से उसके भारत पहुंचने की पूरी संभावना है। इसका अर्थ है कि उसकी प्रतियां पहले ही रवाना की जा चुकी हैं और इस समय रास्ते 12