अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २२ | अभिज्ञानशाकुन्तलम् |
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इतरौ—( १बाहू उद्यम्य ) सर्वथा चक्रवर्तिनं पुत्रम् आप्नुहि ।
राजा—( सप्रणामम् ) प्रतिगृहीतम् ।
वैखानसः—राजन् ! समिदाहरणाय २प्रस्थिता वयम् । ३एषः खलु कण्वस्य कुलपतेरनुमालिनीतीरमाश्रमो दृश्यते । न चेदन्यकार्यातिपातः प्रविश्य प्रतिगृह्यतामातिथेयः सत्कारः । अपि च—
नुरोधपालनारूपं कार्यं युक्तरूपं = उचितमेव, एवं गुणोपेतं = एवंविधैः गुणैः उपेतमेवं गुणोपेतम् = ईदृशगुणयुक्तं स्वानुरूपं सकलगुणगणोपेतं चक्रवर्तिनं चक्रे = राजसमूहे वर्तयितुं चालयितुं प्रशासितुं वा शीलमस्येति चक्रवर्ती, यद्वा चक्रं = सैन्यं वर्तयितुं सर्वभूमौ चालयितुं शीलमस्येति चक्रवर्ती, अथवा चक्रे = भूमण्डले वर्तते = विद्योतते इति चक्रवर्ती तं चक्रवर्तिनं = सार्वभौमं पुत्रं = पुन्नाम्नो नरकात् त्रायते इति पुत्रस्तं पुत्रं = तनयम् आप्नुहि = अस्मद्वचनमहिम्ना लभस्वेत्याशीः । अत्र काव्यलिङ्गालङ्कारोऽनुष्टुप्छन्दश्च ।। १२ ।।
इतराविति—इतरौ = अन्यौ वैखानसेन सहागतौ शिष्यौ बाहू = हस्तौ उद्यम्य = सर्वथा = नूनं चक्रवर्तिनं = सार्वभौमं पुत्रं = तनयम् आप्नुहि = लभस्व ।
राजा—प्रणामेन = नत्या सह सप्रणामं = प्रणामपूर्वकम् कथयति—प्रतिगृहीतम् = अङ्गीकृतम्, भवतामाशीर्वचनं शिरोधार्यमस्ति ।
वैखानसः—वैखानसः = तपोधनः कथयति—राजन् ! = हे भूपते ! वयं = तापसाः
किया जा सकता था । इसका आशय यह है कि तत्पुरुष समास में उत्तरपद की प्रधानता होती है, किन्तु यहाँ कवि का तात्पर्य उत्तर पद वंश की प्रधानता में नहीं है, यह तो यहाँ पूर्वपद पुरु की विशेषता बताना चाहता है, क्योंकि समास न करने से पूर्व पद स्वतन्त्र होकर अपने गौरव को व्यक्त कर रहा है । पुरु की धार्मिकता और पितृभक्ति का प्रदर्शन कवि को यहाँ अभिप्रेत है । पुरु की पितृ भक्ति की कथा पुराणों से जाननी चाहिए । इन्होंने पिता राजा ययाति की आज्ञा में श्रद्धा रखकर उन्हें अपना यौवन दे दिया और उनको बुढ़ाई ले ली थी ।
यहाँ तपस्वियों के अनुरोध की रक्षा कर गुरुभक्ति का परिचय देने से पुरुवंश की परम्परा स्मरण हो आया है । चक्रवर्ती पुत्र की प्राप्ति के आशीर्वाद से प्रतीति होता है कि अभी तक उन्हें कोई सन्तान न थी । तपस्वियों ने उन्हें पुत्र लाभ का आशीर्वाद देकर आगे की परम्परा चलाने में पूर्ण सहयोग किया । पिता के लिए पुत्र की प्राप्ति का आशीर्वाद सर्वोत्तम माना जाता है । इन तपस्वियों के आशीर्वाद स्वरूप दुष्यन्त को सर्वदमन भरत जैसा सर्वगुणसम्पन्न पुत्र प्राप्त हुआ ।
विशिष्ट राजाओं के लिए चक्रवर्ती शब्द पारिभाषिक है, जिसका अर्थ होता है भूमण्डल का सञ्चालक राजा या राज्यमण्डल का शासक शास्त्रों में चक्रवर्ती सम्राट् राजाओं का लक्षण इस प्रकार किया गया है—
सर्वेभ्यः क्षितिपालेभ्यो नित्यं गृह्णाति वै करम् ।
स सम्राडिति विज्ञेयश्चक्रवर्ती स एव हि ।। १२ ।।
दोनों—राजन् ! आप अवश्य पुत्र प्राप्त करें ।
राजा—( प्रणाम करते हुए ) आपलोगों का आशीर्वाद शिरोधार्य है ।
तपस्वी—हे राजन् ! हमलोग तो हवन के उपकरण लकड़ी कुश आदि लाने के निमित्त
पाठा०--१. हस्तमुद्यम्य । २. प्रस्थितावावाम् । ३. एष चास्मद्गुरोः साधिदैवतं इव ( एष ) शकुन्तलया ।