अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० | अभिज्ञानशाकुन्तलम्
नटी—तहं । [ तथा ] ( ^१ गायति )
ईसीसिचुम्बिआईं भमरेहिं सुउमारकेसरसिहाई ।
ओदंसयन्ति दअमाणा पमदाओ सिरिषकुसुमाई ॥ ४ ॥
[ ^२ ईषद्वीषच्चुम्बितानि भ्रमरैः सुकुमारकेसरशिखानि ।
अवतंसयन्ति दयमानाः प्रमदाः शिरीषकुसुमानि ॥ ४ ॥ ]
सूत्रधारः—आर्ये ! साधुगीतम् । अहो ^३ रागबद्धचित्तवृत्तिरालिखित इव सर्वतो रङ्गः । तदिदानीं ^४ कतमत् प्रकरणमाश्रित्यैनमाराधयामः ।
कमनीयाः परिणामरमणीयाः = सायंकालशोभनाः भवन्ति । अत्र शृङ्गार-परिकर-स्वभावोक्त्यलङ्काराः आर्यावृत्तञ्च ॥ ३ ॥
नटी—तथा गायति = आज्ञापयत्यार्यस्तथैवानुतिष्ठामि इत्यभिधाय गायति = गानं गानं करोति, ईषदिति ।
अन्वयः—दयमानाः प्रमदाः भ्रमरैः ईषद्वीषत् चुम्बितानि सुकुमारकेसरशिखानि शिरीषकुसुमानि, अवतंसयन्ति ।
ईषद्विति—दयमाना दयन्ते इति दयमानाः = ग्लानिशङ्कया दयां कुर्वन्त्यः प्रमदाः-प्रकृष्टो मदो रूपसौभाग्यजनितो गर्वो यासां ताः प्रमदाः = वराङ्गनाः कामिन्यो युवतयः, भ्रमरैः = रोलम्बैः—ईषद्वीषद् = अल्पालपं, शनैः शनैः सरभसोपक्रममन्तरा चुम्बितानि = स्पृष्टानि, आस्वादितानि सुकुमारकेशरशिखानि-सुकुमाराः = मृदवः केशराणां = किंजल्कानां शिखा = अग्रभागः येषां तानि सुकुमारकेशरशिखानि शिरीषकुसुमानि-शिरीषस्य कुसुमानि शिरीषकुसुमानि शिरीषसुमनानि अवतंसयन्ति = कर्णभूषणे कुर्वन्ति । अत्र परिकरकाव्यालङ्कारौ, आर्याच्छन्दश्च ॥ ४ ॥
सूत्रधारः—आर्ये ! साधु = मधुरं लयतालादिललितं यथा स्यात् तथा गीतं = गानं
नटी—ठीक है : ( गाती है )
जिनपर गुनगुन करते हुए भौंरे रसपान कर रहे हैं और जिनकी पतली पंखुड़ियों के अग्रभाग बड़े ही सुकुमार हैं ऐसे इन कोमल शिरीष पुष्पों को दयालु स्त्रियां अपनी छोटी-छोटी अंगुलियों से पकड़कर शनैः शनैः अलंकार रूप से अपने शरीरों पर धारण कर रही है ॥ ४ ॥
विशेष—कविवर कालिदास ने अपने काव्यों में शिरीष पुष्प को अत्यन्त कोमल कहा है कुमारसंभव में वे कहते हैं कि शिरीषपुष्प भौरों के पैर सह सकता है ! किन्तु पक्षियों के नहीं 'पदं सहेत भ्रमरस्य पेलवं शिरीषपुष्पं न पुनः पतत्त्रिण' । शिरीष पुष्प अत्यन्त कोमल पंखुड़ियों वाला कर्णभूषण जैसा होता है । अतः उसका वर्णन कर्णभूषण के लिये उपयुक्त ही है ।
शिरीष पुष्पों पर दया करने का अभिप्राय यह है कि भौरों ने पहले ही इसे थोड़ा-थोड़ा चूस लिया है सहसा स्पर्श करने पर शायद यह बिखर न जाय । इससे शकुन्तला का दुष्यन्त से प्रेम संकेत भी कवि ने माना है—शकुन्तला, भ्रमर और अप्सरा की पूर्व सूचना के निमित्त क्रमशः यहाँ शिरीष, भ्रमर और प्रमदा शब्द प्रयुक्त हैं । ईषद ईषद् दो बार प्रयुक्त होने से शिरीषपुष्पों की अत्यन्त कोमलता व्यक्त होती है । युवतियां शिरीष पुष्पों को तोड़कर अपने कानों का आभूषण बनाती है, किन्तु उन्हें तोड़ना नहीं चाहती, उन्हें तोड़ने में दया आती है ।
सूत्रधार--वाह वाह आर्ये ! तुमने बड़ा ही सुन्दर गीत गाया । तुम्हारे राग-रागिणी युक्त इस
पाठा०-१. इति गायति । २. क्षणं चुम्बितानि । ३. रागापहृत, रागनिविष्ट । ४. कतमं प्रयोगम् ।