भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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(१०) अद्भुतरामायण [तृतीय-

नारायणपरो नित्यं विष्णुभक्तानकल्मषान् । पालयामास हृष्टात्मा विशेषेण जनाधिपः ॥ ४५ ॥ अश्वमेधशतैरिष्ट्वा वाजपेयशतैानि च । पालयामास पृथिवीं सागरावरणामिमाम् ॥ ४६ ॥

नित्य नारायणमें तत्पर विष्णुभक्तोंको विशेष कर पालन करता हुआ ॥४५॥ सौ अश्वमेध और सौ वाजपेय यज्ञ करके सागरपर्यन्त पृथ्वीका पालन करता हुआ ॥ ४६ ॥

गृहे गृहे हरिस्तस्थौ वेदघोषो गृहे गृहे । नामघोषो हरेश्चैव यज्ञघोषस्तथैव च ॥ ४७ ॥ अभवन्नृपशार्दूले तस्मिन्त्राज्यं प्रशासति ॥ नासस्या नातृणा भूमिर्न दुर्भिक्षादिभिर्युता ॥ ४८ ॥

उस समय घर घर नारायण और वेदका उच्चारण होता था, नारायणका नाम और यज्ञका शब्द घर घर होता था ॥ ४७ ॥ उसके राज्यमें इस प्रकारसे कार्य होते थे, उसके राज्यमें भूमि तृण अन्नसे युक्त थी, दुर्भिक्षादि नहीं था ॥ ४८ ॥

रोगहीना प्रजा नित्यं सर्वोपद्रववर्जिता । अम्बरीषो महातेजाः पालयामास मेदिनीम् ॥ ४९ ॥ स वै महात्मा सततं च रक्षितः सुदर्शनेनातिसुदर्शनेन । शुभां समुद्रावधि संततां महीं सुपालयामास महीमहेन्द्रः ॥ ५० ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीयेऽद्भुतोत्तरकांडे अम्बरीषवरप्रदानं
नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥

नित्य प्रजा रोगहीन और सब उपद्रवोंसे रहित थी, इस प्रकार महाराज अम्बरीष पृथिवीका पालन करते थे ॥ ४९ ॥ इस प्रकार वह महात्मा सुदर्शनचक्रसे रक्षित हो कर सागरपर्यन्त इस पृथिवीको पालन करता हुआ ॥५०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये अद्भुतोत्तरकाण्डे भाषाटीकायां अम्बरीषवरप्रदानं नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥

तृतीय सर्ग

नारदपर्वतका राजसभामें आना

तस्यैवं वर्तमानस्य कन्या कमललोचना । श्रीमतीनामविख्याता सर्वलक्षणशोभिता ॥ १ ॥ तस्मिन्काले मुनिःश्रीमान्नारदोऽभ्यागतो गृहम् । अम्बरीषस्य राज्ञो वै पर्वतश्च महाद्युतिः ॥ २ ॥