अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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यह भी उसकी इच्छा करते हैं और राजाने कहा है कि, यह कन्या तुम दोनोंमें जिसको ।। १९ ।। अधिक रूपवान् जानकर वरण करेगी उसीको मैं देदूंगा यह राजाने कहा तब मैं बहुत अच्छा ऐसा कहकर ।। २० ।।
आगमिष्यामि ते राजञ्छ्वः प्रभाते गृहं प्रति । आगतोऽहं जगन्नाथ कर्तुमर्हसि मे प्रियम् ।। २१ ।। वानराननवद्भाति पर्वतस्य मुखं यथा । तथा कुरु जगन्नाथ मम चेदिच्छसि प्रियम् ।। २२ ।।
कि, प्रातःकाल तुम्हारे घर आऊँगा तो महाराज ! अब मैं आपके पास आया हूँ आप मेरा प्रिय कीजिये ।। २१ ।। पर्वतका मुख तो वानरके समान होजाय ऐसा आप कीजिये जो हमारे प्रियकी इच्छा है तो ।। २२ ।।
श्रीमती तु तदा पश्येन्नान्यः पश्येत्तथाविधम् । तथेत्युक्त्वा स गोविंदः प्रहस्य मधुसूदनः ।। २३ ।। त्वयोक्तं तत्करिष्यामि गच्छ सौम्य यथासुखम् । एवमुक्तो मुनिर्हृष्टः प्रणिपत्य जनार्दनम् ।। २४ ।।
और उस रूपको वह श्रीमती कन्याही देख सके और कोई नहीं, यह सुन मधुसूदन गोविंद हँसकर बोले ।। २३ ।। जो आपने कहा वह मैं सब करूंगा आप सुखपूर्वक पधारिये यह सुन मुनि प्रसन्न हो जनार्दनको प्रणाम कर ।। २४ ।।
मन्यमानः कृतात्मानमयोध्यां वै जगाम सः । गते मुनिवरे तस्मिन्पर्वतोऽपि महामुनिः ।। २५ ।। प्रणम्य माधवं हृष्टो रहस्येनमुवाच ह । वृत्तांतं च निवेद्याग्रे नारदस्य जगत्पतेः ।। २६ ।।
अपनेको कृतार्थ मान अयोध्यामें गये उनके जानेपर महामुनि पर्वत ।। २५ ।। प्रणाम कर एकान्तमें माधवसे कहने लगे और नारदका वृत्तान्त जगत्पतिके आगे कहा ।। २६ ।।
गोलांगुलमुख यद्वन्मुखं भाति तथा कुरु । श्रीमती तु तथा पश्येन्नान्यः पश्येत्तथा विधम् ।। २७ ।। तच्छ्रुत्वा भगवान्विष्णुस्त्वयोक्तं च करोमि वै । गच्छ शीघ्रमयोध्यां त्वं मा वादीर्नारदस्य वै ।। २८ ।।
कि, नारदका मुख गोलांगुलके समान जिस प्रकार हो जाय वह करो, परन्तु वह राजकन्याही देखे दूसरा नहीं ऐसा करो ।। २७ ।। यह सुन भगवान् विष्णु बोले-मैं तुम्हारे कहे वचन करूंगा, शीघ्र अयोध्याको जाओ और नारदसे न कहो ।। २८ ।।