अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(३२) अद्भुतरामायण षष्ठ-
उस समय विष्णुपरिग्रहा लक्ष्मी गान करती हुई अनन्त वेत्रपाणी संयुक्त दासियोंके साथ आई ॥ ३ ॥ उस समय ब्रह्मादि देवताओंका घना समागम देख भुशुण्डी हाथमें लिये चेटीगणोंके अधिपति रुष्ट हुए ॥ ४ ॥
ब्रह्मादींस्तर्जयंत्यस्तान्मुनींश्चापि समन्ततः ॥ उत्सार्य दूरं संहृष्टा विष्ठिताः पर्वतोपमाः ॥ ५ ॥ सर्वे बहिर्विनिर्याताः सार्द्धं वै ब्रह्मणा सुराः ॥ युक्तमित्येव भाषन्तः प्रभोरग्रे वयं तु के ॥ ६ ॥
वे ब्रह्मा मुनि आदिसे वहां बैठनेका निषेध करने लगे और उनको वहांसे ले जाकर दूर बैठा दिया ॥ ५ ॥ अर्थात् ब्रह्मादि देवता वहाँसे दूसरे स्थानमें प्राप्त कर दिये उन्होंने कह यह युक्त ही है प्रभुके आगे हमारा क्या सामर्थ्य है ॥ ६ ॥
तस्थुः प्रांजलयः सर्वे त्रिदशागत मन्यवः ॥ तस्मिन्क्षणे समाहूतस्तुम्बुरुर्मानपूर्वकम् ॥ ७ ॥ प्रविवेश समीपं वै देव्या देवस्य चैव हि ॥ तत्रासीनो यथायोगं नानामूर्च्छाक्षरान्वितम् ॥ ८ ॥
इस कारण क्रोधरहित सब देवता हाथ जोड़ स्थित हुए, उस समय मानपूर्वक तुम्बरु गन्धर्वको बुलाया ॥ ७ ॥ यह देवी और देवके समीपमें प्राप्त हुआ वहां उसके यथायोग्य बैठनसे अनेक मूर्छनादिसे युक्त ॥ ८ ॥
जगौ कलपदं हृष्टो विपंचीं चाप्यवादयत् ॥ विष्णुना कौशिकप्रीत्यै प्रत्युक्तो गायकोत्तमः ॥ ९ ॥ नानारत्नसमायुक्तैर्दिव्यैराभरणोत्तमैः ॥ दिव्यमाल्यैश्च वसनैः पूजितो विष्णुमंदिरात् ॥ १० ॥
मनोहर वीणाको बजाने लगा, विष्णुने कौशिककी प्रीतिके निमित्त यह उत्तम गायक निर्धारक किया ॥ ९ ॥ नाना रत्नोंसे समायुक्त दिव्य आभरणोंसे व्याप्त दिव्य माला और वस्त्रोंसे पूजित विष्णुके मंदिरसे ॥ १० ॥
निर्गतस्तुम्बुरुर्हृष्टो जगाम स यथागतम् ॥ ब्रह्माद्यास्त्रिदशाः सर्वे मुनयश्च यथागतम् ॥ ११ ॥ जग्मुर्विष्णुं प्रणम्योच्चैर्जय्येति भाषिणस्ततः ॥ नारदोऽथ मुनिर्दृष्ट्वा तुंबरोः सत्क्रियां हरेः ॥ १२ ॥
प्रसन्न हो तुम्बुरु निकला, और ब्रह्मादि सम्पूर्ण देवता तथा मुनिजन यथा गतिको ॥ ११ ॥ विष्णुको प्रणाम करके गये और जयजय भाषण करने लगे । नारदजी नारायण मंदिरमें तुम्बरुका यह सत्कार देखकर ॥ १२ ॥