अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसर्ग हिन्दीटीकासहित (३१)
मानमानादिभिर्नित्यमभ्यर्च्य सततंतं हि माम् । गानं शृणोति नियतो मत्कीर्तिचरितान्वितम् ॥ ५५ ॥ तेनासौ प्राप्तवाँल्लोकं मम ब्रह्मन् सनातनम् । पद्माक्षोऽसौ महाभागः कौशिकस्य महात्मनः । ५६
नित्य दानमानादिसे मेरा पूजन कर मेरी कीर्ति चरित्रयुक्त गान श्रवण करके स्थित रहे ॥ ५५ ॥ इसी कारण इसको हमारे सनातन ब्रह्मलोक प्राप्त हुए हैं, यह महात्मा कौशिकका पद्माक्ष नाम शिष्य ॥ ५६ ॥
धनेशत्वमवाप्तोऽसौ मम सान्निध्यमेवच । एवमुक्त्वा हरिस्तत्र समास्ते लोकपूजितः ॥५७॥ ततो हरिर्भक्तजनैः समावृतः सुखेन तस्थौ कनकासने शुभे ॥ भक्तैकगम्यो निजभक्तलोकान्स लालयन्पाणिसरोरुहेण ॥ ५८ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे कौशिकादिवैकुंठगमनं नाम पंचमः सर्गः ॥५॥
धनेशत्वको प्राप्त हो हमारे निकट निवास करता रहे, यह कहकर समस्तलोकपूजित हरि ॥ ५७ ॥ भक्तजनोंके सहित सुन्दर आसनपर स्थित होकर भक्तोंकेही दर्शनयोग्य अपने हस्तकमलसे इनको लालन करते हुए ॥ ५८ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीयेआदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे भाषाटीकायां कौशिकादिवैकुण्ठगमनं नाम पंचमः सर्गः ॥ ५ ॥
षष्ठ सर्ग
हरिमित्रोपाख्यान तथा कौशिकादिका वैकुंठगमन वर्णन
तस्मिन्क्षणे समारब्धो मधुराक्षरपेशलैः ॥ महामहोत्सवस्तत्र कौशिकप्रीतयेऽद्भुतः ॥ १ ॥ विपंचीगुणतत्त्वज्ञैर्वाद्यविद्याविशारदैः ॥ ततस्तच्छ्रवणायलं चेटीकोटिसमावृत्ता ॥ २ ॥
उस समय कौशिककी प्रीतिके निमित्त मधुराक्षरोंसे युक्त महामहोत्सव आरंभ हुआ ॥ १ ॥ विपंचीके गुण और तत्त्वके जाननेवाले वाद्यविद्यामें चतुरोंके गान श्रवण करनेको करोडों दासी आकर प्राप्त हुईं ॥ २ ॥
गायमाना समायाता लक्ष्मीर्विष्णुपरिग्रहः ॥ वृता सहस्त्रकोटीभिर्वेत्रपाणिभिराशुगैः ॥ ३ ॥ ब्रह्मादिसुरसंघानां धनं दृष्ट्वा समागमम् ॥ चेटीगणाधिपा रुष्टा भुशुंडीपरिघान्विताः ॥ ४ ॥