अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
सर्ग हिन्दीटीकासहित (३१)
सर्ग हिन्दीटीकासहित (३१)
मानमानादिभिर्नित्यमभ्यर्च्य सततंतं हि माम् । गानं शृणोति नियतो मत्कीर्तिचरितान्वितम् ॥ ५५ ॥ तेनासौ प्राप्तवाँल्लोकं मम ब्रह्मन् सनातनम् । पद्माक्षोऽसौ महाभागः कौशिकस्य महात्मनः । ५६
नित्य दानमानादिसे मेरा पूजन कर मेरी कीर्ति चरित्रयुक्त गान श्रवण करके स्थित रहे ॥ ५५ ॥ इसी कारण इसको हमारे सनातन ब्रह्मलोक प्राप्त हुए हैं, यह महात्मा कौशिकका पद्माक्ष नाम शिष्य ॥ ५६ ॥
धनेशत्वमवाप्तोऽसौ मम सान्निध्यमेवच । एवमुक्त्वा हरिस्तत्र समास्ते लोकपूजितः ॥५७॥ ततो हरिर्भक्तजनैः समावृतः सुखेन तस्थौ कनकासने शुभे ॥ भक्तैकगम्यो निजभक्तलोकान्स लालयन्पाणिसरोरुहेण ॥ ५८ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे कौशिकादिवैकुंठगमनं नाम पंचमः सर्गः ॥५॥
धनेशत्वको प्राप्त हो हमारे निकट निवास करता रहे, यह कहकर समस्तलोकपूजित हरि ॥ ५७ ॥ भक्तजनोंके सहित सुन्दर आसनपर स्थित होकर भक्तोंकेही दर्शनयोग्य अपने हस्तकमलसे इनको लालन करते हुए ॥ ५८ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीयेआदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे भाषाटीकायां कौशिकादिवैकुण्ठगमनं नाम पंचमः सर्गः ॥ ५ ॥
षष्ठ सर्ग
हरिमित्रोपाख्यान तथा कौशिकादिका वैकुंठगमन वर्णन
तस्मिन्क्षणे समारब्धो मधुराक्षरपेशलैः ॥ महामहोत्सवस्तत्र कौशिकप्रीतयेऽद्भुतः ॥ १ ॥ विपंचीगुणतत्त्वज्ञैर्वाद्यविद्याविशारदैः ॥ ततस्तच्छ्रवणायलं चेटीकोटिसमावृत्ता ॥ २ ॥
उस समय कौशिककी प्रीतिके निमित्त मधुराक्षरोंसे युक्त महामहोत्सव आरंभ हुआ ॥ १ ॥ विपंचीके गुण और तत्त्वके जाननेवाले वाद्यविद्यामें चतुरोंके गान श्रवण करनेको करोडों दासी आकर प्राप्त हुईं ॥ २ ॥
गायमाना समायाता लक्ष्मीर्विष्णुपरिग्रहः ॥ वृता सहस्त्रकोटीभिर्वेत्रपाणिभिराशुगैः ॥ ३ ॥ ब्रह्मादिसुरसंघानां धनं दृष्ट्वा समागमम् ॥ चेटीगणाधिपा रुष्टा भुशुंडीपरिघान्विताः ॥ ४ ॥
(३२) अद्भुतरामायण षष्ठ-
उस समय विष्णुपरिग्रहा लक्ष्मी गान करती हुई अनन्त वेत्रपाणी संयुक्त दासियोंके साथ आई ॥ ३ ॥ उस समय ब्रह्मादि देवताओंका घना समागम देख भुशुण्डी हाथमें लिये चेटीगणोंके अधिपति रुष्ट हुए ॥ ४ ॥
ब्रह्मादींस्तर्जयंत्यस्तान्मुनींश्चापि समन्ततः ॥ उत्सार्य दूरं संहृष्टा विष्ठिताः पर्वतोपमाः ॥ ५ ॥ सर्वे बहिर्विनिर्याताः सार्द्धं वै ब्रह्मणा सुराः ॥ युक्तमित्येव भाषन्तः प्रभोरग्रे वयं तु के ॥ ६ ॥
वे ब्रह्मा मुनि आदिसे वहां बैठनेका निषेध करने लगे और उनको वहांसे ले जाकर दूर बैठा दिया ॥ ५ ॥ अर्थात् ब्रह्मादि देवता वहाँसे दूसरे स्थानमें प्राप्त कर दिये उन्होंने कह यह युक्त ही है प्रभुके आगे हमारा क्या सामर्थ्य है ॥ ६ ॥
तस्थुः प्रांजलयः सर्वे त्रिदशागत मन्यवः ॥ तस्मिन्क्षणे समाहूतस्तुम्बुरुर्मानपूर्वकम् ॥ ७ ॥ प्रविवेश समीपं वै देव्या देवस्य चैव हि ॥ तत्रासीनो यथायोगं नानामूर्च्छाक्षरान्वितम् ॥ ८ ॥
इस कारण क्रोधरहित सब देवता हाथ जोड़ स्थित हुए, उस समय मानपूर्वक तुम्बरु गन्धर्वको बुलाया ॥ ७ ॥ यह देवी और देवके समीपमें प्राप्त हुआ वहां उसके यथायोग्य बैठनसे अनेक मूर्छनादिसे युक्त ॥ ८ ॥
जगौ कलपदं हृष्टो विपंचीं चाप्यवादयत् ॥ विष्णुना कौशिकप्रीत्यै प्रत्युक्तो गायकोत्तमः ॥ ९ ॥ नानारत्नसमायुक्तैर्दिव्यैराभरणोत्तमैः ॥ दिव्यमाल्यैश्च वसनैः पूजितो विष्णुमंदिरात् ॥ १० ॥
मनोहर वीणाको बजाने लगा, विष्णुने कौशिककी प्रीतिके निमित्त यह उत्तम गायक निर्धारक किया ॥ ९ ॥ नाना रत्नोंसे समायुक्त दिव्य आभरणोंसे व्याप्त दिव्य माला और वस्त्रोंसे पूजित विष्णुके मंदिरसे ॥ १० ॥
निर्गतस्तुम्बुरुर्हृष्टो जगाम स यथागतम् ॥ ब्रह्माद्यास्त्रिदशाः सर्वे मुनयश्च यथागतम् ॥ ११ ॥ जग्मुर्विष्णुं प्रणम्योच्चैर्जय्येति भाषिणस्ततः ॥ नारदोऽथ मुनिर्दृष्ट्वा तुंबरोः सत्क्रियां हरेः ॥ १२ ॥
प्रसन्न हो तुम्बुरु निकला, और ब्रह्मादि सम्पूर्ण देवता तथा मुनिजन यथा गतिको ॥ ११ ॥ विष्णुको प्रणाम करके गये और जयजय भाषण करने लगे । नारदजी नारायण मंदिरमें तुम्बरुका यह सत्कार देखकर ॥ १२ ॥
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित ( ३३ )
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित ( ३३ )
शोकाविष्टेन मनसा संतप्तहृदयेक्षणः ॥ चिन्तामापेदिवांस्तत्र शोकमूर्च्छाकुलांतरः ॥ १३ ॥ ततः क्रोधेन महता ज्जवाल मुनिपुंगवः । लक्ष्मीं शशाप सहसा तद्दासीभिस्तिरस्कृतः ॥ १४ ॥
महाशोकित और हृदयमें सन्तप्त हो शोकसे मूर्च्छित हो विचार करने लगे ॥ १३ ॥ और फिर महाक्रोधसे मुनि प्रज्वलित हो उठे, और उनकी दासियोंसे तिरस्कार होनेके कारण सहसा लक्ष्मीको शाप दिया ॥ १४ ॥
यदहं राक्षसं भावं गृहीत्वा विष्णु कांतया ॥ चेटीभिर्वारितो दूरं वेत्राघातेन ताडितः ॥ १५ ॥ तस्मात्संजायतां लक्ष्मी रक्षसां गर्भसंभवा ॥ यतोऽहं बहिराक्षिप्तश्चेटीभिः सावहेलनम् ॥ १६ ॥
जो कि लक्ष्मीने मुझे राक्षसभावसे ग्रहण किया है और चेटियोंसे निवारित कर वेत्राघात कराया है ॥ १५ ॥ इस कारण यह लक्ष्मी राक्षस गर्भसे उत्पन्न होगी, जो कि, दासियोंने तिरस्कार कर मुझे बाहर निकाल दिया ॥ १६ ॥
हेलया राक्षसी च त्वां बहिः क्षेप्स्यति भूतले ॥ इत्युक्ते नारदेनाथ चकंपे भुवनत्रयम् ॥ १७ ॥ हाहाकारं ततश्चक्रुर्देवगंधर्वदानवाः ॥ नारदो विललापाथ धिग्धिङ् मामिति च ब्रुवन् ॥ १८ ॥
इसी प्रकार तिरस्कार कर राक्षसी तुमको बाहर पृथ्वीपर डालेगी नारदके ऐसा कहनेपर त्रिलोकी कम्पित होगई ॥ १७ ॥ देव गन्धर्व दानव हाहाकार करने लगे, तब क्रोध शान्त होनेपर विलाप कर नारदजी अपनेको धिक्कार देने लगे ॥ १८ ॥
नारायणसभायोगो महालक्ष्मीसमीपतः ॥ अहो तुंबुरुणा प्राप्तो धिङ्मां मूढमचेतनम् ॥ १९ ॥ योऽयं हरेः सन्निकासाद्दूतैर्निर्वासितः कथम् ॥ जीवन्यास्यामि कुत्राहं किं मे तुंबुरुणा कृतम् ॥ २० ॥
कि, नारायणके और महालक्ष्मीके समीपमें तुम्बुरुके सामने तिरस्कार हुआ मुझे धिक्कार है ॥ १९ ॥ जो कि नारायणके सन्मुख दूतोंसे निकाला गया अब मैं जीता कहाँ जाऊँ मुझे तुम्बुरुने क्या कर दिया ॥ २० ॥
रोदमानो मुहुर्विद्वान्धिङ्मामिति च चिंतयन् ॥ ततो नारायणो लक्ष्म्याः शापं श्रुत्वा सुदारुणम् ॥ २१ ॥ लक्ष्म्या सह हृषीकेश आजगाम यतो मुनिः ॥ रमां प्रसाद्यं तं विप्रं प्रत्युवाच कृतांजलिः ।२२
२
(३४) अद्भुतरामायण [ षष्ठ-
वह विद्वान् बारंबार रुदन करते अपनेको धिक्कारते विचारने लगे और नारायणने लक्ष्मीका दारुण शाप सुनकर ॥ २१ ॥ लक्ष्मीके सहित नारदजीके समीप आगमन किया और लक्ष्मी नारदजीको प्रसन्न कर हाथ जोड बोली । २२
यदुक्तं भवता मह्यं तत्तथा न तदन्यथा । तत्र किंचित्प्रार्थयामि मुने तत्कृपया कुरु ॥ २३ ॥ आरण्यानां मुनीनां वै स्तोकं स्तोकं च शोणितम् ॥ कलशापूरितं भक्षेद्राक्षसी या च कामतः ॥ २४ ॥
जो अपने मेरे प्रति कहा है वह अन्यथा न होगा, मैं कुछ प्रार्थना करती हूँ आप मुझ पर कृपा करो ॥ २३ ॥ वनके मुनियोंका थोडा थोडा रुधिर कलशेमें भरकर प्राप्त हो जो राक्षसी अपनी इच्छासे उसको भक्षण करे ॥ २४ ॥
तस्या गर्भे भविष्यामि तच्छोणितसमुद्भवा ॥ इत्युक्तं रमया-चिंत्या(संभावान्नौ भवेदिति ॥ २५ ॥ नारदस्तु तथेत्याह अस्याः सर्वं हि दारुणम् ॥ ततो नारायणो देवः प्रोक्तवान्नारदं मुनिम् ॥ २६ ॥
उसीके गर्भसे उस रुधिर द्वारा मैं उत्पन्न हूं। अव लक्ष्मीने इस प्रकार अपने होनेकी प्रार्थना की ॥ २५ ॥ तब नारदने कहा यह सब दारुणता तुम्हारे निमित्त होगी तब नारायणने नारदसे कहा ॥ २६ ॥
नाहं दानेन तपसा नेज्यया नापि तीर्थतः । संतुष्यामि द्विजश्रेष्ठ यथा नाम्नां प्रकीर्तनात् ॥ २७ ॥ गानेन नामगुणयोर्मम सायुज्यमाप्नुयात् ॥ निदर्शनं कौशिकोऽत्र गानान्मल्लोकमाप्तवान् ॥२८॥
मैं दान, तप, इज्या (यज्ञ) तीर्थसे ऐसा प्रसन्न नहीं होता हूं जैसा नामकीर्तनसे होता हूं ॥ २७ ॥ जो मेरे नाम गान करता है वह मेरे सायुज्य लोकको प्राप्त होता है, इसमें उदाहरणरूप कौशिक है जो गानसे मेरे लोकको प्राप्त हुआ है ॥ २८ ॥
मूर्च्छनादियुतं गानं नाम्नामपि मम प्रियम् ॥ तुंबुरुस्तत्प्रभावेण प्रियस्त्वत्तोपि मे द्विज ॥ २९ ॥ मूर्च्छनातालयोंगेन गानेन त्वं तथा भव ॥ उलूकं पश्य गत्वा त्वं यदि गाने मतिस्तव ॥ ३० ॥
मूर्च्छनादियुक्त तालसे जो मेरे नाम गाता है वह मुझे अतिप्रिय है इसीके प्रभावसे तुम्बुरु तुमसे अधिक प्यारा है ॥ २९ ॥ मूर्च्छना तालयोग और गानकर तुम भी इस प्रकारके हो यदि तुम्हारी गानमें मति है तो जाकर उलूकको देखो ॥ ३० ॥
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (३५)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (३५)
मानसोत्तरशैले तु गानबंधुरिति स्मृतः ॥ तद्गच्छ शीघ्रं शैलेंद्रं गानवांस्त्वं भविष्यसि ॥ ३१ ॥ इत्युक्तो विस्मयाविष्टो नारदो वाग्विदां वरः ॥ मानसोत्तरशैले तु गानबंधुं जगाम वै ॥ ३२ ॥
वह मानसके उत्तर पर्वतपर गानबंधु नामसे विख्यात है उसके पास जानेसे तुम गानविद्यायुक्त हो जाओगे ॥ ३१ ॥ श्रेष्ठ बोलनेवालोंमें श्रेष्ठ नारदजी यह कहने पर मानसके उत्तर और गानबंधुके समीपमें गये ॥ ३२ ॥
गंधर्वाः किन्नरा यक्षास्तथा चाप्सरसां गणाः ॥ समासीनास्तु परितो गानबंधुश्च मध्यतः ॥ ३३॥ गानाशिक्षासमापन्नाः शिक्षिता स्तेन पक्षिणा ॥ स्निग्धकंठस्वरास्तत्र समासीना मुदान्विताः ॥ ३४ ॥
गंधर्व किन्नर यक्ष अप्सराओंके समूह उसके चारों ओर थे और गान बंधु मध्यमें स्थित था ॥ ३३ ॥ गान शिक्षासे युक्त उसने अनेक पक्षियोंको भी कर दिया था, स्निग्ध कंठवाले अनेक पक्षी वहां स्थित थे ॥ ३४ ॥
ततो नारदमालोक्य गानबंधुरुवाच ह ॥ प्रणिपत्य यथा न्याय्यं स्वागतेनाभ्यपूजयत् ॥ ३५ ॥ किमर्थं भगवन्नत्र चागतोऽसि महद्युते ॥ किं कार्यं हि महाब्रह्मन्ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ ३६ ॥
तब नारदजीको आता देख गानबंधु कहने लगा और नम्रतासे प्रणाम कर पूजन करता हुआ ॥ ३५ ॥ हे महाकान्तिमान ! आप किस कारणसे यहां आकर प्राप्त हुए हो, हे महाब्रह्मन् ! कहिये, आपका क्या कार्य है उसके करनेमें देर न करूं ॥ ३६ ॥
तच्छ्रुत्वा नारदो धीमान्प्रत्युवाच सपक्षिणम् ॥ उलूकेन्द्र महाप्राज्ञ शृणु सर्वं यथातथम् ॥ ३७ ॥ मम वृत्तं प्रवक्ष्यामि तच्च भूतं महाद्भुतम् ॥ वैकुण्ठनगरेब्रह्मन्नारायणसमीपगम् ॥ ३८ ॥
यह सुन बुद्धिमान् नारद पक्षिराजसे कहने लगे हे महाप्राज्ञ उलूकेन्द्र ! आप सब यथा योग्य श्रवण कीजिये ॥ ३७ ॥ मैं अपना महाद्भुत वृत्तान्त कहता हूं कि, वैकुण्ठनगरमें नारायणके समीपमें ॥ ३८ ॥
मां विनिर्धूय संदृष्टं समाहूय च तुंबुरुम् ॥ लक्ष्मीसमन्वितो विष्णु- रशृणोद्गानमुत्तमम् ॥ ३९॥ ब्रह्मादयो वयं सर्वे निरस्ताः स्थानत- श्च्युताः ॥ कौशिकाद्याः समासीना गानयोगेन वै हरिम् ॥ ४० ॥
( ३६ ) अद्भुतरामायण [ षष्ठ-
मुझे तिरस्कार कर तुम्बुरुकी स्थिती की गई है और लक्ष्मीसहित विष्णुने उसका गान श्रवण किया है ॥३९॥ ब्रह्मादि हम सब देवता स्थानसे बाहर किये गये और कौशिकादि बैठे रहे गानयोगसे नारायणके समीप रहे ॥ ४० ॥
समाराध्यैव संप्राप्ता गाणपत्यं यथासुखम् ॥ तेनाहमतिदुःखार्त्तो यत्तप्तं तु मया तपः ॥ ४१ ॥ यद्दत्तं यद्धुतं चैव यच्चापि श्रुतमेव हि ॥ यदधीतं च गानस्य कलां नार्हति षोडशीम् ॥ ४२ ॥
और उनकी आराधनासे उनको गाणपत्य पदकी प्राप्ति हुई है, उससे मैं बडा दुःखी हूं, जो कुछ मैंने तप किया है ॥ ४१ ॥ जो दिया, हवन किया और सुना है, जो पढा है वह गानविद्याकी सोलहवीं कलाभी नहीं है ॥ ४२ ॥
विष्णोर्माहात्म्ययुक्तस्य गानयोगस्य वै ततः ॥ पश्चात्तापं च मे दृष्ट्वा मां च नारायणोऽब्रवीत् ॥ ४३ ॥ उलूकं गच्छ देवर्षे गानबन्धुं मतिर्यदि ॥ गाने च वर्तते ब्रह्मंस्तत्र त्वं गानमाप्स्यसि ॥ ४४ ॥
जिस कारण कि विष्णुके माहात्म्यसे युक्त गानयोगकी अधिकाई देख पश्चात्ताप करते मुझसे नारायण कहने लगे ॥ ४३ ॥ हे देवर्षि ! यदि गानमें आपको इच्छा है तो उलूककेपास जाइये वह गानका आचार्य्य है वहां तू गानकी प्राप्ति करेगा ॥ ४४ ॥
इत्यहंप्रेषितस्तेन त्वत्समीपमिहागतः ॥ किं करिष्यामि शिष्योऽहं तव मां पाल्याव्यय ॥४५॥ नारदं प्राह धर्मात्मा गानबन्धुर्महायशाः ॥ शृणु नारद यद्वृत्तं पुरा मम महामते ॥ ४६ ॥
इस प्रकार मैं उनका भेजा तुम्हारे पास आया हूं हे अविनाशी ! मैं तुम्हारा किंकर हूँ, तुम मेरा पालन करो ॥ ४५ ॥ महायशस्वी गानबन्धु नारदजीसे बोले हे नारद ! जो हमारा पूर्वजन्मका वृत्तांत है वह सुनो ॥ ४६ ॥
अत्याश्चर्य्यसमायुक्तं सर्वपापहरं शुभम् ॥ भुवनेशइति ख्यातो राजाभूद्धार्मिकः पुरा ॥ ४७ ॥ अश्वमेधसहस्रैश्च वाजपेया युतेन च ॥ अन्यैश्च विविधैर्यज्ञैरिष्टवान्भूरिदक्षिणैः ॥ ४८ ॥
जो अति आश्चर्यसंयुक्त और पापका हरनेवाला है पहले एक धर्मात्मा राजा था ॥ ४७ ॥ सहस्त्र अश्वमेध और दशसहस्त्र वाजपेय और भी अनेक बडी बडी दक्षिणवाले यज्ञ ॥ ४८ ॥
सर्ग ] . हिन्दीटीकासहित (३७)
सर्ग ] . हिन्दीटीकासहित (३७)
गवां कोटयर्बुदं चैव सुवर्णस्य तथैव च ।। वाससां रथनागानां कन्या श्वानां तथैव च ।। ४९ ।। दत्त्वा स राजा विप्रेभ्यो मेदिनीं पर्यपालयत् ।। न्यवारयत्स्वके राज्ये गानयोगेन केशवम् ।। ५० ।। गौ करोडों, अरबों सुवर्ण, वस्त्र, रथ, नाग कन्या अश्व ।। ४९ ।। राजाने ब्राह्मणोंको दिये पृथ्वीका पालन करता रहा औ गानयोगसे केशवको निवारण किया ।। ५० ।।
अन्यं वा गानयोगेन गायेद्यदि स मे भवेत् ।। वध्यः सर्वात्मना तस्माद्वेदैरीड्यः परः पुमान् ।। ५१ ।। न ब्राह्मणैश्च गातव्यं वह- द्भिर्वेदमुत्तमम् ।। गानयोगेन सर्वत्र स्त्रियो गायंतु मां सदा ।। ५२ ।। कि, जो कोई गान करेगा वह मेरे हाथसे वध्य होगा कारण कि, नारायणकी स्तुति वेदवचनोंसे होती है ।। ५१ ।। वेदधारी ब्राह्मणोंको गान नहीं करना चाहिये और गानयोगसे सर्वत्र स्त्रियें मुझको ज्ञान करें ।। ५२ ।।
सूतमागधसंघाश्च गीतं मे कारयन्तु वै ।। इत्याज्ञाप्य महातेजा राज्यं वै पर्यपालयत् ।। ५३ ।। तस्य राज्ञः पुराभ्याशे हरिमित्र इति स्मृतः ।। ब्राह्मणो विष्णुभक्तश्च सर्वद्वंद्वविवर्जितः ।। ५४ ।। सूत मागधोंके सहित स्त्रीजन मेरे निमित्त गान करें इस प्रकार कहकर वह महातेजस्वी राज्य करने लगा ।। ५३ ।। उस राजाके समीपमें एक हरिमित्र था, जो ब्राह्मण विष्णुभक्त और सब द्वन्द्वसे वर्जित था ।। ५४ ।।
नदीपुलिनमासाद्य प्रतिमाञ्च हरेः शुभाम् ।। समभ्यर्च्य यथा- शास्त्रं घृतदध्युत्तरं बहु ।। ५५ ।। मिष्टान्नं पायसं दत्त्वा हरेरावेद्य धूपकम् ।। प्रणिपत्य यथान्यायं तत्र विन्यस्तमानसः ।। ५६ ।। नदीके किनारे जाकर नारायणकी प्रतिमाको शास्त्रानुसार अर्चनकर शास्त्रपूर्वक घृत दही आदिके सहित ।। ५५ ।। मिष्टान्न और खीर धूपादि नारायणको निवेदन कर यथायोग्य प्रणाम कर उसमें मन लगाय ।। ५६ ।।
अगायत हरिं तत्र तालवीणालयान्वितम् ।। अतीव स्नेहसंयुक्त- स्तद्गीतेनान्तरात्मना ।। ५७ ।। ततो राज्ञः समादेशा.दूटास्तस्य समागताः ।। तदर्चनादि सकलं निर्धूय च समन्ततः ।। ५८ ।।
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( ३८ ) अद्भुतरामायण [ षष्ठ-
ताल वीणा लयके सहित नारायणका गुण गाता था, और अपने मनमें महान् स्नेह करता था ॥ ५७ ॥ तब राजाकी आज्ञासे योद्धा वहां आये उन्होंने वह पूजादिकी सामग्री सब नष्ट कर दी ॥ ५८ ॥
ब्राह्मणं च गृहीत्वा ते राज्ञे सम्यङ्न्यवेदयन् ॥ ततो राजा द्विजश्रेष्ठं परिभर्त्स्र्य सुदुर्मनाः ॥ ५९ ॥ राज्यान्निर्वासयामास हृत्वा सर्वधनादिकम् ॥ प्रतिमां च हरेश्चैव नापश्यत्स यदृच्छया ॥ ६० ॥
और ब्राह्मणको पकड़कर राजाके पास ले गये, तब राजाने दुःखी हो उस ब्राह्मणको बहुत झिडका ॥ ५९ ॥ और सब धनादि लेकर उसे राज्यसे निकाल दिया और कभी उसने अपनी इच्छासे नारायणकी मूर्तिका दर्शन न किया । ६० ।
ततः कालेन महता कालधर्ममुपेयिवान् ॥ लोकान्तरमनुप्राप्य उलूकं देहमाश्रितः ॥ ६१ ॥ सर्वत्र गच्छमानोपि भक्ष्यं किंचिन्न चाप्तवान् ॥ क्षुधार्तश्च सदा खिन्नो यममाह सुदुःखितः ६२ ॥
फिर कुछ समयके उपरान्त वह कालधर्मको प्राप्त हुआ लोकान्तरको प्राप्त होकर उलूक हो गया ॥ ६१ ॥ सर्वत्र जानेपरभी उसको कहीं कुछ भक्ष्य प्राप्त न हुआ और क्षुधासे खिन्न हो यमराजसे उसने कहा ॥ ६२ ॥
क्षुत्पीडा वर्तते देव दुर्गतस्य सदा मम ॥ मया पापं कृतं किंवा किं करिष्यामि वै यम ॥ ६३ ॥ ततस्तं धर्मराट् प्राह धर्माधर्मप्रदर्शकः ॥ त्वया हि सुमहत्पापं कृतमज्ञानतो नृप ॥ ६४ ॥
हे देव ! मुझे बडी क्षुधा है और सदा मेरी दुर्गति है हे यम ! मैंने क्या पाप किये हैं और अब मैं क्या करूं ॥ ६३ ॥ तब धर्माधर्मके दिखानेवाले यमराज उससे बोले, हे राजन् ! अज्ञानसे तुमने बडे पाप किये हैं ॥ ६४ ॥
हरिमित्रं प्रति तदा वासुदेवपरायणम् ॥ हरिमित्रे कृतं पापं वासुदेवार्चनादिषु ॥ ६५ ॥ तेन पापेन संप्राप्तः क्षुद्बोधस्त्वां सदा नृप ॥ दानयज्ञादिकं सर्वं प्रनष्टं ते नराधिप ॥ ६६ ॥
हरिमित्र वासुदेवपरायण हरिमित्रमें आपने पापाचरण किया है ॥ ६५ ॥ हे राजन् उस पापसे आपको सदा क्षुधाकी प्राप्ति हुई है हे राजन् ! इसी कारण तुम्हारे दानयज्ञादि सब नष्ट होगये हैं ॥ ६६ ॥
गीतनाट्यलयोपेतं गायमानं सदा हरिम् ॥ हरिमित्रं समाहूय हृतवानसि तद्धनम् ॥ ६७ ॥ उपहारदिकं सर्वं वासुदेवस्य सन्निधौ ॥ तव भृत्याः समाहृत्य पापं चक्रुस्तवाज्ञया ॥ ६८ ॥
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सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (३९)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (३९)
हरेः कीर्तिं विना चान्यद्ब्राह्मणेन नृपोत्तम ।। न गेययोगे मंतव्यं तस्मात्पापं त्वया कृतम् ।। ६९ ।। नष्टं ते स्वर्गलोकाद्यंगच्छ पर्वतको टरम् ।। ।। पूर्वोत्सृष्टं स्वदेहं ते खाद नित्यं निकृत्य वै ।। ७० ।।
गीत नाटच लयसे युक्त गायन करते हुए हरिमित्रका तुमने संपूर्ण धन हरण कर लिया ।। ६७ ।। जो कुछ उपहारादि था वह सब वासुदेवके समीपसे भृत्योंनें लेकर फेंक दिया ।। ६८ ।। हे राजन् ! हरिकी कीर्तिके बिना ब्राह्मणको गानयोग न करना चाहिये, यह पाप तुमने किया है ।। ६९ ।। तुम्हारे स्वर्ग-लोकादि इसी कर्मसे नष्ट होगये, तुम पर्वतकी कोटरमें जाकर अपनी देहकोही नोच नोचके प्रतिदिन भक्षण करो. ।। ७० ।।
तस्मिन्क्षीणे त्विमं देहं खाद नित्यं क्षुधान्वितः ।। महानिरय- यसंस्थस्त्वं यावन्मन्वंतरं भवेत् ।। ७१ ।। मन्वंतरे ततोऽतीते भूम्यां त्वं श्वा भविष्यसि ।। ततः कालेन कियता मानुष्यमनुलप्स्यसे ।। ७२ ।।
क्षुधासे व्याकुल होकर तू नित्य इसी देहको भक्षण कर, इस प्रकार एक मन्वन्तर-तक महानरकमें निवास कर ।। ७१ ।। मन्वंतर बीतनेसे भूमिमें तू कुत्ता होगा, फिर बहुत कालके उपरान्त मनुष्यशरीरको प्राप्त होगा ।। ७२ ।।
एमुक्त्वा यमो विद्वांस्तत्रैवान्तरधीयत ।। सोऽहं नारद भूपालः पुरेदानीमुलूकताम् ।। ७३ ।। लब्धवान्कर्मदोषेण हरिमित्रकृतेन वै ।। ततो मानसशैलेऽहं कोटरे ह्यवसं मुने ।। ७४ ।।
यह कह यमराज वहीं अन्तर्धान होगये हे नारद ! सो वह राजा मैं उलूकताको प्राप्त हुआ हूं ।। ७३ ।। हरिमित्रके साथ क्षुद्रता करनेसे यह दोष मुझको प्राप्त हुआ है हे मुने ! तब मैं इस मानसकी कोटरामें निवास करने लगा ।। ७४ ।।
पूर्वो मृतकदेहो मे भक्षणाय ह्युपस्थितः ।। क्षुधान्वितोऽतंदेहं खादितुं ह्युपचक्रमे ।।७५।। तत्क्षणं दैवयोगेन हरिमित्रो महायशाः ।। विमानेनार्कवर्णेन स्तूयमानोऽप्सरोगणैः ७६ ।।
और पूर्व मृतक शरीर मेरे भक्षणके निमित उपस्थित हुआ, मैं क्षुधायुक्त हो उस देहके खानेकी इच्छा करने लगा उसी क्षण दैवयोगसे महायशस्वी हरिमित्र सूर्यके समान प्रकाशमान विमानपर स्थिर अप्सराओंसे स्तुतिको प्राप्त हो ।। ७५ ।। ७६ ।।
(४०) अद्भुतरामायण [ षष्ठ-
विष्णुदूतैः परिवृतः पथा तेनागतो नृप ।। विष्णुभक्तो महातेजाः पथि मां दृष्टवान्प्रभु ।।७७।। भुवनेशशरीरंतद्ददर्शोलूक सन्निधौ ।। पृष्टोऽहं तेन दयया शवसन्निधिसंस्थितः ।। ७८ ।।
विष्णुके दूतोंसे युक्त उस मार्गसे जाता था; उस महातेजस्वी विष्णु भक्तने मार्गमें राजाको देखा ।। ७७ ।। जब उलूकके निकट भुवनेशका शरीर देखा तब शवके निकट खडे होकर उसने दयासे पूछा ।। ७८ ।।
भुवनेशस्य नृपतेर्देहोऽयं दृश्यते खग ।। उलूक त्वं च किमिदं खादितुं चोद्यतो भवान् ।। ७९ ।। तच्छ्रुत्वा हरिमित्राय प्रणम्य विनयान्वितः ।। कृतांजलिपुटो भूत्वा बहुमानपुरः सरम् ।। ८० ।।
हे पक्षी ! यह तो राजा भुवनेशका शरीर दीखता है और उलूक तू उसको कैसे भक्षण करता है ।। ७९ ।। यह वचन सुन वह हरिमित्रको प्रणामकर विनयसे सहित हाथ जोड बहुत मानसे ।। ८० ।।
तत्सर्वं पूर्ववृत्तांतं नारदास्मै न्ववेदयम् ।। पुरापराधं त्वयि यत्तस्य पाकोऽयमागतः ८१ ।। यावन्मन्वन्तरं विप्रखादिष्यामि शवं त्विमम् ।। ततः श्वाहं भविष्यामि भविष्यामि ततो नरः ।।८२।।
पहला सब वृत्तांत उससे वर्णन करता हुआ बोला पहले जो तुम्हारा अपराध किया था उसका यह फल हमको प्राप्त हुआ है ।। ८१ ।। हे विप्र ! एक मन्वन्तर- तक इस शवको मुझे खाना पडेगा फिर कुत्ता होकर पीछे मनुष्यकी योनि मिलेगी ।। ८२ ।।
एतदाकर्ण्य करुणो हरिमित्रामहायशाः ।। कृपया मां समाचष्ट शृणुलूक महीपते ।। ८३ ।। मयि त्वयापराधं यत्तत्सर्वं क्षान्तवान- हम् ।। शवो ह्यदर्शनं यातु न च श्वा त्वं भविष्यसि ।। ८४ ।।
महायशस्वी दयालू हरिमित्र यह वचन श्रवणकर कृपापूर्वक मुझे बोले, हे महाबुद्धिमान् उलूक ! तू सुन ।। ८३ ।। जो कुछ तैंने मेरा अपराध किया है वह मैंने सब क्षमा करदिया, यह शव अन्तर्धान होजाय और तुझको कुत्तेकी योनि नहीं मिलेगी ।। ८४ ।।
त्वामद्य गानयोगश्च प्राप्नोतु मत्प्रसादतः ।। स्तुहि विष्णुं च गानेन जिह्वा स्पष्टा च जायताम् ।। ८५ ।। सुरविद्याधराणां च गंधर्वाप्सरसां तथा । गानाचार्यो भवेथास्त्वं भक्ष्यभोज्यसमन्वितः ८६
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (४१)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (४१)
मेरे प्रसादसे तुझको गानयोगकी प्राप्ति होगी और विष्णुके गानयोग तेरी जिह्वा स्तुतिके योग्य स्पष्ट होजायगी ॥ ८५ ॥ देवता विद्याधर गन्धर्व अप्सराओंका तू गान विद्याका आचार्य होगा और अनेक प्रकारके भक्ष्य भोज्य आकर प्राप्त होंगे ॥ ८६ ॥
ततः कतिपयाहोभिः सर्वं भद्रं भविष्यति ॥ हरिमित्रवचस्तच्च विष्णुदूतोपबृंहितम् ॥ ८७ ॥ सर्वं निरयसंज्ञंमेक्षणादेव व्यनाशयत् ॥ प्रकृत्या विष्णुभक्तानामीदृशो करुणा द्विज ॥ ८८ ॥
फिर कुछ दिनोंमें सम्पूर्ण मंगल हो जायगा, जब हरिमित्रने विष्णु दूतोंके समक्ष यह वचन कहे ॥८७॥ तो क्षणमात्रमें सब नरककी सामग्री नष्ट होगई, हे नारद ! विष्णुभक्तोंकी स्वभावसेही यह प्रकृति होती है ॥ ८८ ॥
कृतापराधलोकानामपि दुखं व्यपोहति ॥ अमृतस्यन्दि वचनमुक्त्वा स प्रययौ हरिम् ॥ ८९ ॥ सर्वं ते कथितं येन गानाचार्योहमृत्तमः ॥ प्राप्स्यामि हरिमेतेन हरिमित्रप्रसादतः ॥ ९० ॥
नारदैतदनुवर्णितं मयापूर्वजन्मचरितं महाद्भुतम् ॥ यः श्रृणोति हरिमेत्य चेतसा स प्रयाति भवनं गदाभृतः ॥ ९१ ॥
इत्यार्षे श्रीम. वाल्मी. आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकांडे हरिमित्रोपाख्यानं नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥
कि, अपराधी जनोंके भी दुःख दूर करते हैं इस प्रकार वह अमृतके भरे वचनोंको कहकर हरिके लोकको गया ॥ ८९ ॥वह सब आपसे कहा जिस कारण मैं गानाचार्यपदको प्राप्त हुआ हूं, हरिमित्रके प्रसादसे मैं नारायणको प्राप्त हूं गा ॥ ९० ॥ हे नारद ! यह आपसे पूर्वजन्मका महा अद्भुत चरित्र वर्णन किया, जो चित्त लगाकर इसे सुनते हैं वह नारायणके लोकको प्राप्त होते हैं ॥ ९१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये भाषाटीकायां अद्भुतोत्तर काण्डे हरिमित्रोपाख्यानं नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥
(४२) अद्भुतरामायण [सप्तम-
सप्तम सर्ग
नारदजीको गानविद्याका प्राप्त होना
गानबंधुः पुनः प्राह नारदं मुनिसत्तमम् ।। एते किन्नरसंघा वै विद्याध्राप्सरसां गणाः ।। १ ।। गानाचार्यमुलूकं मां गानशिक्षार्थमागताः ।। तपसा नैव शक्त्या वा गान विद्या तपोधन ।। २ ।।
फिर गानबन्धु नारदजीसे कहने लगा; यह किन्नर विद्याधर अप्सराओंके समूह ।। १ ।। गानाचार्य मेरे पास शिक्षाके निमित्त आते हैं हे तपोधन ! गानविद्या तपसे नहीं आती है ।। २ ।।
तस्माच्छ्रमणे युक्तश्च मत्तस्त्वं गानमाप्नुहि ।। एवमुक्तो मुनिस्तस्मै प्रणिपत्य जगौ यथा ।। ३ ।। तच्छृणुष्व मुनिश्रेष्ठ वासुदेवं नमस्य च ।। उलूकेनैवमुक्तस्तु नारदो मुनिसत्तमः ।। ४ ।।
इससे श्रम कर् तुम हमसे गान विद्या सीखो, तब मुनिराज प्रणाम कर जैसे गान करने लगे ।। ३ ।। हे मुनिश्रेष्ठ ! वह सुनो ! वासुदेवको नमस्कार कर नारदजी उलूकके वचन मान ।। ४ ।।
शिक्षाक्रमेण संयुक्तस्तत्र गानमशिक्षत ।। गानबंधुस्तमाहेदं त्यक्तलज्जो भवाधुना ।। ५ ।। स्त्रीसंगमे तथा गीतेक्षुतेऽन्वाख्यानसंगमे । व्यवहारे च धान्यानामर्थानां च तथैव च ।। ६ ।।
शिक्षाक्रमसे संयुक्त गान सीखने लगे तब गानबन्धुने कहा नारदजी ! अब लाज त्याग देनी चाहिये ।। ५ ।। स्त्रीसंगम, गीत, छीक अन्वाख्यान, धान्यका व्यवहार, धनके व्यवहारमें ।। ६ ।।
आयेव्यये तथा नित्यं त्यक्तलज्जस्तु वै भवेत् ।। न कुण्ठितेन गूढेन नित्यं प्रावरणादिभिः ।। ७ ।। हस्तविक्षेपभावेन व्यादितास्येन चैव हि ।। निर्यातजिह्वायोगेन न गेयं च कथंचन ।। ८ ।।
आय और व्ययमें कभी लज्जा नहीं करनी चाहिये, कुण्ठित गूढ अत्यन्त ढके स्थानमें ।। ७ ।। तथा हाथ फैलाकर सकोडकर बहुत मुख फैलाकर जिह्वा मीचकर कभी गाना न चाहिये ।। ८ ।।
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (४३)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (४३)
स्वांगं निरीक्षमाणेण परमप्रेक्षता तथा ।। न गायेदूर्ध्वबाहुश्च नोर्ध्वदृष्टिः कथंचन ।। ९ ।। हासो भयं क्षुधा कंपः शोकोऽन्यस्य स्मृतिस्तृषा ।। नैतानि सप्तरूपाणि गानयोगे महामते ।। १० ।। केवल अपने अंगको देखते ऊपरको भुजा उठाकर वा केवल ऊपरको दृष्टि देकर ।। ९-।। हँसते हुए डरमें भूखमें कँपा शोक दूसरेकी यादमें प्यासेमें इन प्रसंगोंमें गान करना उचित नहीं है ।। १० ।।
नैकहस्तेन शस्येत तालसंघट्टनं मुने ।। क्षुधार्तेन भयार्तेन तृषार्तेन तथैव च ।। ११ ।। गानयोगो न कर्तव्यो नांधकारे कथंचन ।। एव- मादीनि योग्यानि कर्तव्यानि महामुने ।। १२ ।। एक हाथसे ताल देकर गान करना उचित नहीं है, भूखे प्यासे घवराये हुएको ।। ११ ।। किसी प्रकारसे गान योग्य कर्त्तव्य नहीं है; इसी प्रकार अंध- कारमें भी न गावे, हे महामुने ! इस प्रकारसे योग्य अयोग्य कर्त्तव्य विचारे १२।।
एवमुक्तः स भगवात्रारदो विधिरक्षणे ।। अशिक्षत तथा गीतं दिव्यवर्षसहस्रकम् ।। १३ ।। ततः समस्तसंपन्नो गीतप्रस्तावका- दिषु ।। विपंच्यादिषु संपन्नः सर्वस्वरवि भागवित् ।। १४ ।। जब इस प्रकारसे कहा तब दिव्य सहस्त्र वर्षतक नारदजी गीत सीखते रहे ।। १३ ।। तब गीतकी प्रस्तावना आदिके पारगामी हुए वीणाके सब स्वरोंके ज्ञान हुए ।। १४ ।।
अयुतानि च षट्त्रिंशत्सहस्राणि शतानि च ।। स्वराणां भेदयोगेन ज्ञातवान्मुनिसत्तमः ।। १५ ।। ततो गंधर्वसंघाश्च किन्नराणां तथा गणाः ।। मुनिना सह संयुक्ताः प्रीतियुक्तास्तु तेऽभवन् ।। १६ ।। छियालीस सहस्त्र ४६००० स्वरभेदोंको नारदजीने भली प्रकारसे जान लिया ।। १५ ।। तथा गंधर्व और किन्नरोंके समूह मुनिके संगमें परम प्रीतिका प्राप्त हुए ।। १६ ।।
गानबंधुं मुनिः प्राह प्राप्य गानमनुत्तमम् ।। त्वां समासाद्य संपन्नं त्वं हि गीतविशारदः ।। १७ ।। ध्वांकशत्रो महाप्राज्ञ किमवाप्यं करोमि ते ।। गानबंधुस्ततः प्राह नारदं मुनि पुंगवम् ।। १८ ।। तब गानबंधुसे नारदजीने कहा, अब मैं तुमको प्राप्त हो उत्तम गानयोगको प्राप्त हुआ तुम सम्पन्न और गीतविशारद हो ।। १७ ।। हे उलूकराज ! अब मैं तुम्हारा क्या प्रिय करूं ? तब गानबन्धुने नारदजीसे कहा ।। १८ ।।
(४४) · अद्भुतरामायण [सप्तम-
ब्रह्मणो दिवसे ब्रह्मन्मनवः स्युश्चतुर्दश ॥ ततस्त्रैलोक्यसंप्लाबो भविष्यति महामुने ॥ १९ ॥ तावन्मे स्याद्यशोभागस्तावन्मे परमं शुभम् ॥ मनसाध्यापितं मे स्याद्दाक्षिण्यान्मुनिसत्तमः ॥ २० ॥
हे भगवन् ! ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मनु बीत जाते हैं उस समय त्रिलोकी नष्ट हो जायगी ॥ १९ ॥ तवतकं मेरा उत्तम यश बना रहे, हे मुनिश्रेष्ठ ! मनसे ही मुझको चतुरताकी प्राप्ति हो जाय ॥ २० ॥
उलूकं प्राह देवर्षिः सर्वं तेऽस्तु मनोगतम् ॥ अतीते कल्पसंयोगे गरुडस्त्वं भविष्यसि ॥ २१ ॥ गुणगानादच्युतस्य सायुज्यं तस्य लप्स्यसे ॥ स्वस्ति तेऽस्तु महाप्राज्ञ गमिष्यामि प्रसीद मे ॥ २२ ॥
देवर्षिने उलूकसे कहा, जो तुम्हारी इच्छा है, वह सब होजायगा, एक कल्प बीत जानेपर तू गरुड होगा ॥ २१ ॥ और नारायणके गुण गान करनेके कारण उनकी सायुज्यताको प्राप्त होगा हे महाप्राज्ञ ! आपका मंगल हो मैं जाता हूं तुम प्रसन्न रहो ॥ २२ ॥
एवमुक्त्वा ययौ विप्रो जेतुं तुंबुरुमुत्तमम् ॥ तुंबुरोश्च गृहाभ्याशे ददर्श विकृताकृतीन् ॥ २३ ॥ कृत्तबाहूरुपादांश्च कृतनासा- क्षिवक्षसः ॥ कृतोत्तमांगांगुलींश्च छिन्नभिन्नकलेवरान् ॥ २४ ॥
यह कह नारदजी तुम्बुरुके जीतनेको गये, तब तुम्बेरुके घरके निकट विकृत आकारवाले ॥ २३ ॥ हाथ जंघा पैर कटे नासिका वक्षस्थल कटे, छिन्न शिर, कोई अंगुलीसे छिन्न कोई भिन्न कलेवर ॥ २४ ॥
पुंसः स्त्रियश्च विकृतानददर्शायुतशो बहून् ॥ नारदेन च ते प्रोक्ताः के यूयं कृतविग्रहाः ॥ २५ ॥ नारदं प्रोचुरपि ते त्वया कृतांगा वयम् ॥ वयं रागाश्च रागिण्योगानेन भिन्नसंधिना ॥ २६ ॥
ऐसी सहस्रों स्त्रियोंको नारदजीने देखकर उनसे पूछा तुम्हारे अंग किसने नष्ट करदिये ॥ २५ ॥ यह सुन उन्होंने नारदजीसे कहा, आपनेही हमारी यह दशा की है, हम राग रागिनी हैं जिस समय आप भिन्न सन्धानसे ॥ २६ ॥
भवता गीयते यर्हि तर्ह्यवस्थेदृशी हि नः ॥ पुनस्तुंबुरुगानेन च्छिन्नभिन्नप्ररोहणम् ॥ २७ ॥ तुंबुरुर्जीवयत्येष त्वं मारयसि नारद ॥ तदाश्चर्यं महद्दृष्ट्वा श्रुत्वा च विस्मयान्वितः ॥ २८ ॥
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (४५)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (४५)
गान करते हो तबही हमारी यह दशा होजाती है फिर जब तुम्बुरु गान करते हैं तब यह हमारे छिन्न भिन्न शरीर ॥ २७ ॥ तुम्बुरु गन्धर्वद्वारा जीवित होते हैं और हे नारद ! तुम मारते हो, यह देखकर नारदजी बड़े आश्चर्यको प्राप्त हुए ॥ २८ ॥
धिग्धिगुक्त्वा जगामाथ नारदोऽपि जनार्दनम् ।। श्वेतद्वीपे स भगवान्नारदं प्राह माधवः ।। २९ ।। गानबंधौ च यद्गानं न चैतेनासि पारगः ।। तुंबुरोः सदृशो नासि गानेगानेन नारद ।। ३० ।।
और अपने आपको धिक्कार देकर श्रीकृष्णके पास गये, तब श्वेतद्वीपमें भगवान्ने नारदजीसे कहा ॥ २९ ॥ कि गानवन्धुसे गाना सीखकर गान-विद्याके पारगामी नहीं हुए हो हे नारद ! गानविद्यामें अभी तुम तुम्बुरुके समान नहीं हुए हो ॥ ३० ॥
मनोर्वैवस्वतस्याहमष्टाविंशतिमे युगे ।। द्वापरांते भविष्यामि यदुवंशकुलोद्भवः ।। ३१ ।। देवक्यां वसुदेवस्य कृष्णनाम्ना महामुने ।। तदानीं मां समागम्य स्मारयेतद्यथातथम् ।। ३२ ।।
जब वैवस्वत मनुके अट्ठाईसवें युगमें द्वापरके अन्तमें यदुकुलमें मैं अवतार लूंगा ॥ ३१ ॥ देवकीवसुदेवसे जन्म लेनेसे कृष्ण मेरा नाम होगा उस समय तुम आकर हमें इस वातका स्मरण कराना ॥ ३२ ॥
तत्र त्वां गानसम्पन्नं करिष्यामि महाव्रत ।। तुंबुरोश्च समं चैव तथातिशयसंयुक्तम् ।। ३३ ।। तावत्कालं यथायोगं देवगंधर्वयोनिषु ।। शिक्ष त्वं हि यथान्यायमित्युक्त्वांतरधीयत ।। ३४ ।।
हे सुव्रत ! उस समय में तुमको गानसम्पन्न कर दूंगा और तुम्बुरुसे भी अधिक करदूंगा ॥ ३३ ॥ तबतक तुम यथायोग्य देवगन्धर्वकी योनिमें इसकी यथायोग्य शिक्षा करो, यह कह भगवान् अन्तर्धान होगये ॥ ३४ ॥
ततो मुनिः प्रणम्यैनं वीणावादन तत्परः ।। देवर्षिर्देवसंकाशः सर्वाभरणभूषितः ।। ३५ ।। तपसां निधिरत्यर्थं वासुदेवपरायणः ।। स्कंधे विपंचीमाधाय सर्वलोकांश्चचार सः ।। ३६ ।।
तब मुनि भगवान्को प्रणाम कर वीणा बजानेमें तत्पर हुए देवताओंके समान सम्पूर्ण आभरणोंसे भूषित ॥ ३५ ॥ तपोनिधि अत्यन्त वासुदेवपरायण कंधेके ऊपर वीणा धरे सब लोकोंमें विचरते थे ॥ ३६ ॥
(४६) अद्भुतरामायण [सप्तम-]
वारुणं याम्यमाग्नेयमैन्द्रं कौबेरमेव च ॥ वायव्यं च तथैशानं संशंश प्राप्य धर्मवित् ॥ ३७ ॥ गायमानो हरिं सम्यग्वीणा वादविचक्षणः ॥ गंधर्वाप्सरसां संघैः पूज्यमानस्ततस्ततः ॥ ३८ ॥ ब्रह्मलोकं समासाद्य कस्मिंश्चित्कालपर्यये ॥ हाहा हूहूश्च गंधर्वो गीतवाद्यविशारदौ ॥ ३९ ॥ ब्रह्मणो गायकौ दिव्यौ नित्यं गंधर्वसत्तमौ ॥ तत्र ताभ्यां समासाद्य गायमानो हरिं विभुम् ॥ ४० ॥
वरुण यम अग्नि इन्द्र कुबेर वायु तथा शान दिशामें यह धर्मात्मा संदेहको प्राप्त हो ॥ ३७ ॥ वीणा बजाकर नारायणके गुणानुवाद गाते यक्ष और गंधर्व अप्सराओंसे पूजित होने लगे ॥ ३८ ॥ ब्रह्मलोकको प्राप्त हो कुछ दिन उपरान्त वहां जो गीतवाद्यमें विशारद हाहा हूहूनामक गन्धर्व थे ॥ ३९ ॥ अर्थात् गंधर्व नित्य ब्रह्माजीके गान करनेवाले हैं उनके साथ मिलकर नारायणके निमित्त गान करते हुए ॥ ४० ॥
ब्रह्मणा च महातेजाः पूजितो मुनिसत्तमः ॥ तं प्रणम्य महात्मानं सर्वलोकपितामहम् ॥ ४१ ॥ चचार च यथाकामं सर्वलोकेषु नारदः ॥ पुनः कालेन महता गृहं प्राप्य च तुम्बुरोः ॥ ४२ ॥
और महातेजस्वी ब्रह्माजीसे पूजित होकर उन सर्वलोकके पितामह ब्रह्माजीको प्रणाम कर ॥ ४१ ॥ सब लोकमें यथेच्छ विचरण करने लगे बहुत कालके उपरान्त तुम्बुरुके घरमें प्राप्त हो ॥ ४२ ॥
वीणामादाय तत्रस्थस्तत्रस्थैरप्यलक्षितः ॥ सुरकन्याश्च तत्रस्थाः षड्जाद्याः सहधैवताः ॥ ४३ ॥ व्रीडितो भगवान्दृष्ट्वा निर्गतश्च स सत्वरम् ॥ शिक्षयामास बहुशस्तत्र तत्र महामुनिः ॥ ४४ ॥
अन्योंसे अलक्षित हो वीणा लेकर चले वहां वह षड्ज धैवत आदि देवकन्या स्थित थीं ॥ ४३ ॥ उनको देखकर लज्जित हो नारदजी वहांसे चले गये और जहां तहां मुनिने बहुत शिक्षा दी ॥ ४४ ॥
कालेऽतीते ततो विष्णुरवतीर्णो जगन्मयः ॥ देवक्यां वसुदेवस्य यादवोऽसौ महाद्युतिः ॥ ४५ ॥ सप्तस्वराङ्गना द्रष्टुं गानविद्याविशारदः ॥ ययौ रैवतके कृष्ण प्रणिपत्य महामुनिः¹ ॥ ४६ ॥
¹ नारदः
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (४७)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (४७)
बहुत, समय बीतनेपर जगत्प्रभु विष्णुका अवतार हुआ, देवकीमें वसुदेवके घर जगत्पति अवतार लेते हुए ॥ ४५ ॥ सात स्वर और उनकी अंगनाओंके देखनेको यह गानविद्यामें विशारद रैवतक पर्वतपर श्रीकृष्णको प्रणाम करने गये ॥ ४६ ॥
व्यज्ञापयदशेषं तच्छ्वेतद्वीपे त्वया पुरा ॥ नारायणेन कथितं गानयोगार्थमुत्तमम् ॥ ४७ ॥ तच्छ्रुत्वा प्रहसन्कृष्णः प्राह जांबवतीं मुदा ॥ एनं मुनिवरं भद्रे शिक्षयस्व यथाविधि ॥ ४८ ॥
और उस श्वेतद्वीपकी वार्ताको श्रवण कराया कि, नारायणरूपसे आपने गानयोगकी वार्ता कही थी ॥ ४७ ॥ यह सुन श्रीकृष्णने हँसकर जांबवतीसे कहा हे भद्रे ! यथायोग्य इन मुनिश्रेष्ठको शिक्षा दो ॥ ४८ ॥
वीणागानसमायोगे तथेत्याह च सा पतिम् । प्रहसंती यथायोगं शिक्षयामास तं मुनिम् ॥ ४९ ॥ ततः संवत्सरे पूर्णे नारदं प्राह केशवः । सत्याः समीपमागच्छ शिक्षस्व तथा पुनः ॥ ५० ॥
वीणागानका योग सिखाओ, जांबवतीने स्वीकार कर हँसते हँसते यथायोग्य नारदजीको शिक्षा देनी प्रारंभ की ॥ ४९ ॥ फिर संवत्सर पूर्ण होजानेपर केशवने नारदजीसे कहा अब सत्याके समीप जाकर सीखो ॥ ५० ॥
तथेत्युक्त्वा सत्यभामां प्रणिपत्य ययौ मुनिः । तया स शिक्षितो विद्वान्पूर्णे संवत्सरे ततः ॥ ५१ ॥ वासुदेवनियुक्तोऽसौ रुक्मिण्याः सदनं गतः । अंगनाभिस्तत्रत्याभिर्दासीभिर्मुनिसत्तमः ॥ ५२ ॥
बहुत अच्छा यह कह मुनि सत्याको प्रणाम करनेको गये उसने एक वर्षतक नारदजीको शिक्षा दी ॥ ५१ ॥ फिर श्रीकृष्णकी आज्ञासे नारदजी रुक्मिणीके भवनमें गये वहां बहुतसी श्रेष्ठ दासी विद्यमान थीं ॥ ५२ ॥
उक्तोऽसौ गायमानोऽपि न स्वरं वेत्सि वै मुने । ततः श्रमेण महता यावत्संवत्सरद्वयम् ॥ ५३ ॥ शिक्षितोऽसौ तदा देव्या रुक्मण्याधिजगौ मुनिः । न तु स्वरांगनाः प्राप तंत्रीयोगे महामुनिः ॥ ५४ ॥
जब वह गाना सिखाने लगीं तो नारद जीको उनके स्वरका ज्ञानभी तो नहीं होता था तब बडे परिश्रमसे दो वर्षतक सिखाती रही ॥ ५३ ॥ और रुक्मिणीके सिखाये नारदजी गाने लगे परन्तु देवाङ्गनाओंके तन्त्रीयोगको प्राप्त न हुए ॥ ५४ ॥
(४८) अद्भुतरामायण [सप्तम-
आहूय कृष्णो भगवान्स्वयमेव महामुनिम् । अशिक्षदमैयात्मा गानयोगमनुत्तमम् ॥ ५५ ॥ कृष्णदत्तेन गानेन तस्यायाताः स्वरांगनाः । ब्रह्मानन्दः समभवन्नारदस्य च चेतसि ॥ ५६ ॥
तब श्रीकृष्ण भगवान् स्वयं ही महामुनिको बुलाकर वह अविनाशी गान-योग सिखाने लगे ॥ ५५ ॥ तब कृष्णके गाना सिखानेपर सुरांगना आकर प्राप्त हुई और नारदजीके चितमें ब्रह्मानंदकी प्राप्ति हुई ॥ ५६ ॥
ततो द्वेषादयो दोषाः सर्वे अस्तं गता द्विज । ईर्ष्या च तुंबुरौ यासीन्नारदस्य च सा गता ॥ ५७ ॥ ततो ननर्त देवर्षिः प्रणिपत्य जनार्दनम् । उवाच च हृषीकेशः सर्वज्ञस्त्वं महामुने ॥ ५८ ॥
तब नारदजीके द्वेषादि दोष सब अस्त होगये और तुम्बुरुके प्रति जो ईर्षा थी वह भी जाती रही ॥ ५७ ॥ तब नारायणको प्रणाम कर देवर्षि नृत्य करने लगे और श्रीकृष्णने कहा नारद ! अब तुम सर्वज्ञ हुए ॥ ५८ ॥
प्राचीनगानयोगेन गायस्व मम सन्निधौ । एतत्ते प्रार्थितं प्राप्तं मम लोके तथैव च ॥ ५९ ॥ नित्यं तुम्बुरुणा सार्द्धं गायस्व च यथातथम् । एवमुक्तो मुनिस्तत्र यथायोगं चचार सः ॥ ६० ॥
मेरे निकट प्राचीन गानयोगसे गाओ यह मैंने आपसे अपने लोककी प्राप्ति कही है ॥ ५९ ॥ नित्य आप तुंबुरुके साथ गान करिये यह सुनकर मुनि त्रिलोकीमें सञ्चरण करने लगा ॥ ६० ॥
तथा संपूजयत्कृष्णं रुद्रं भुवन नायकम् । तदा जगौ हरेस्तत्र नियोगाच्छंकरालये ॥ ६१ ॥ रुक्मिण्या सत्यया सार्द्धं जांबवत्या महामुनिः । कृष्णेन च द्विजश्रेष्ठ श्रुतिजातिविशारदः ॥ ६२ ॥
और रुद्रभवनके नायकका पूजनकर इस नारायणकी आज्ञासे वह शंकरके स्थानमें गानको गये ॥ ६१ ॥ रुक्मिणी, सत्या, जांबवती और श्रीकृष्णजीके साथमें महामुनि गान करने लगे ॥ ६२ ॥
एवं ते मुनिशार्दूल प्रोक्तो गीतक्रमो मया । ब्राह्मणो वासुदेवाख्यं गायमानोऽनिशं द्विज ॥ ६३ ॥ हरेः सायुज्यमाप्नोति सर्वयज्ञफलं लभेत् । अन्यथा नरकं गच्छेदगायमानोऽन्यदेव हि ॥ ६४ ॥
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (४९)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (४९)
यह आपसे गीतका वर्णन किया ब्राह्मण वासुदेव नामको रातदिन गान करता हुआ ॥ ६३ ॥ हरिका गान करनेसे सायुज्य और सब यज्ञोंका फल प्राप्त होता है दूसरेकी कीर्ति गान करनेसे नरक होता है ॥ ६४ ॥
कर्मणा मनसा वाचा वासुदेवपरायणः । गायञ्छृण्वंस्तमाप्नोति तस्माच्छ्रेष्ठः प्रियंवदः ॥ ६५ ॥ कथितमिदमपूर्वं जानकीजन्मपूर्वं श्रुति-सुखमतिगुह्यं स्नेहतस्तेऽतिवाह्यम् । कलुष कुलविपक्षं भव्य-दानैकदक्षं नृभिर विरतवंद्यं सर्वदेवाभिनंद्यम् ॥ ६६ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकांडे नारदगान प्राप्तिवर्णनं सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥
मन वचन कर्मसे वासुदेवपरायण हो गाना श्रवण करनेसे उस पदकी प्राप्ति होती है, इस कारण वह प्रियंवद और श्रेष्ठ है ॥ ६५ ॥ आपसे यह अपूर्व जानकीजन्मका कारण कहा यह कर्णसुखद अतिगुह्य है आपके स्नेहसे वर्णन किया है, पापका नाश करनेवाला कल्याण देनेमें एकही चतुर वैरागियोंको सुखदायक और सब देवताओंको आनन्द देनेवाला है ॥ ६६ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामा.णे वा. आ. अद्भुतोत्तरकाण्डे पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र कृत भाषाटीकायां नारदगानप्राप्तिवर्णनं नाम सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥
अष्टम सर्ग
सीताजीका जन्मवर्णन
यथा सा शोणितोद्भूता राक्षसीगर्भ संभवा । यथा भूमितलोत्पन्ना जानकी च यथा हि सा ॥ १ ॥ सीता तच्छृणु विप्रेन्द्र वर्णयामि तवा-नघ । दशास्यो रावणो नाम तपस्तप्तुं मनो दधे ॥ २ ॥
और जिस प्रकार लक्ष्मी रुधिरसे राक्षसीके गर्भद्वारा उत्पन्न होकर फिर भूमितलमें प्राप्त हुई सो कथा सुनो ॥ १ ॥ हे विप्रेन्द्र ! वह कथा मैं आपसे वर्णन करता हूं सुनो—जिस समय दशमुख रावणने तप करनेकी इच्छा की । २ ।
त्रैलोक्यस्याधिपत्याय अजरामरणाय च ॥ बहुवर्षं तपस्तप्त्वा ज्वलनार्कसमोज्ज्वलत् ॥ ३॥ तत्तेजसा जगत्सर्वं दह्यमानं यदाभवत् । तमुवाच तदा ब्रह्मा समागत्य सुरैर्वृतः ॥ ४ ॥
४
(५०) अद्भुतरामायण [ अष्टम-
कि, मैं त्रिलोकीका अधिपति अजर और अमर हो जाऊं, तब बहुत वर्षोंतक तप करके प्रकाशमान अग्निके समान प्रज्वलित हो उठा ॥ ३ ॥ जब उसके तेजसे सब जगत् दग्ध होने लगा तब देवताओंके सहित ब्रह्माजी आकर उससे कहने लगे ॥ ४ ॥
पौलस्त्य विरमाद्य त्वं तपसो मम वाक्यतः । तपसोग्रेण महता लोका भस्मीकृता इव ॥ ५ ॥ वरं ददामि ते वत्स यत्ते मनसि वर्तते । तपोधन लभस्वाद्य वरदान्मत्त ईप्सितम् ॥ ६ ॥
हे रावण ! अब तुम तपसे विरामको प्राप्त हो तुम्हारे तपसे संपूर्ण लोक भस्म हुएके समान हैं ॥ ५ ॥ हे वत्स ! जो तुम्हारे मनमें इच्छा है वह वर तुमको दूंगा तुम मुझसे इच्छित वरको प्राप्त होगे ॥ ६ ॥
न्यवारयत चक्षूंषि सूर्य्यबिंबावलोकनात् । प्रणिप्रत्यजगन्नाथं वरं वव्रे व रावणः ॥ ७ ॥ देहि सर्वामरत्वं मे वरदोऽसि यदि प्रभुः । तदाकर्ण्य वचो ब्रह्मा पुनः प्राह स रावणम् ॥ ८ ॥
अब तुम सूर्य्यके बिंबके अवलोकनसे नेत्रोंको निवारण करो, तब ब्रह्माजीको प्रणाम कर रावण वर मांगने लगा ॥ ७ ॥ हे प्रभु ! यदि वरदान देते हो तो मुझे सबसे अमर कर दीजिये, यह बचन सुनकर ब्रह्माजी फिर रावणसे बोले ८ ।
नहि सर्वामरत्वं ते वरमन्यं वृणीष्व मे । ततः स रावणः प्राह कूट वादी हि राक्षसः ॥ ९ ॥ न सुरा नासुरा यक्षाः पिशाचोरगराक्षसाः । विद्याधराः किन्नरा वा तथैवाप्सरसां गणाः ॥ १० ॥
कि, कोई सबसे अमर नहीं होसकता, तुम दूसरा वर मांगो, तब यह कूटवादी राक्षस बोला ॥ ९ ॥ सुर असुर यक्ष पिशाच राक्षस उरग विद्याधर किन्नर अप्सराओंके गण ॥ १० ॥
न हन्युर्मां कथं चित्ते देहि मे वरमुत्तमम् । अन्यच्च ते वृणे ब्रह्मंस्तच्छृणुष्व पितामह ॥ ११ ॥ आत्मनो दुहिता मोहादत्यर्थं प्रार्थिता भवेत् । तदा मृत्युर्मम भवेद्यदि कन्या न कांक्षति ॥ १२ ॥
मुझे किसी प्रकार मार न सकें यही उत्तम वर दीजिये; हे ब्रह्माजी ! और जो वर माँगते हैं वह भी आप श्रवण कीजिये ॥ ११ ॥ जब मैं अज्ञानसेही अपनी कन्याकेही स्वीकारकी इच्छा करूँ तब मेरी मृत्यु हो ॥ १२ ॥