भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 173 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 49

(४२) अद्भुतरामायण [सप्तम-

सप्तम सर्ग

नारदजीको गानविद्याका प्राप्त होना

गानबंधुः पुनः प्राह नारदं मुनिसत्तमम् ।। एते किन्नरसंघा वै विद्याध्राप्सरसां गणाः ।। १ ।। गानाचार्यमुलूकं मां गानशिक्षार्थमागताः ।। तपसा नैव शक्त्या वा गान विद्या तपोधन ।। २ ।।

फिर गानबन्धु नारदजीसे कहने लगा; यह किन्नर विद्याधर अप्सराओंके समूह ।। १ ।। गानाचार्य मेरे पास शिक्षाके निमित्त आते हैं हे तपोधन ! गानविद्या तपसे नहीं आती है ।। २ ।।

तस्माच्छ्रमणे युक्तश्च मत्तस्त्वं गानमाप्नुहि ।। एवमुक्तो मुनिस्तस्मै प्रणिपत्य जगौ यथा ।। ३ ।। तच्छृणुष्व मुनिश्रेष्ठ वासुदेवं नमस्य च ।। उलूकेनैवमुक्तस्तु नारदो मुनिसत्तमः ।। ४ ।।

इससे श्रम कर् तुम हमसे गान विद्या सीखो, तब मुनिराज प्रणाम कर जैसे गान करने लगे ।। ३ ।। हे मुनिश्रेष्ठ ! वह सुनो ! वासुदेवको नमस्कार कर नारदजी उलूकके वचन मान ।। ४ ।।

शिक्षाक्रमेण संयुक्तस्तत्र गानमशिक्षत ।। गानबंधुस्तमाहेदं त्यक्तलज्जो भवाधुना ।। ५ ।। स्त्रीसंगमे तथा गीतेक्षुतेऽन्वाख्यानसंगमे । व्यवहारे च धान्यानामर्थानां च तथैव च ।। ६ ।।

शिक्षाक्रमसे संयुक्त गान सीखने लगे तब गानबन्धुने कहा नारदजी ! अब लाज त्याग देनी चाहिये ।। ५ ।। स्त्रीसंगम, गीत, छीक अन्वाख्यान, धान्यका व्यवहार, धनके व्यवहारमें ।। ६ ।।

आयेव्यये तथा नित्यं त्यक्तलज्जस्तु वै भवेत् ।। न कुण्ठितेन गूढेन नित्यं प्रावरणादिभिः ।। ७ ।। हस्तविक्षेपभावेन व्यादितास्येन चैव हि ।। निर्यातजिह्वायोगेन न गेयं च कथंचन ।। ८ ।।

आय और व्ययमें कभी लज्जा नहीं करनी चाहिये, कुण्ठित गूढ अत्यन्त ढके स्थानमें ।। ७ ।। तथा हाथ फैलाकर सकोडकर बहुत मुख फैलाकर जिह्वा मीचकर कभी गाना न चाहिये ।। ८ ।।