भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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स्वांगं निरीक्षमाणेण परमप्रेक्षता तथा ।। न गायेदूर्ध्वबाहुश्च नोर्ध्वदृष्टिः कथंचन ।। ९ ।। हासो भयं क्षुधा कंपः शोकोऽन्यस्य स्मृतिस्तृषा ।। नैतानि सप्तरूपाणि गानयोगे महामते ।। १० ।। केवल अपने अंगको देखते ऊपरको भुजा उठाकर वा केवल ऊपरको दृष्टि देकर ।। ९-।। हँसते हुए डरमें भूखमें कँपा शोक दूसरेकी यादमें प्यासेमें इन प्रसंगोंमें गान करना उचित नहीं है ।। १० ।।

नैकहस्तेन शस्येत तालसंघट्टनं मुने ।। क्षुधार्तेन भयार्तेन तृषार्तेन तथैव च ।। ११ ।। गानयोगो न कर्तव्यो नांधकारे कथंचन ।। एव- मादीनि योग्यानि कर्तव्यानि महामुने ।। १२ ।। एक हाथसे ताल देकर गान करना उचित नहीं है, भूखे प्यासे घवराये हुएको ।। ११ ।। किसी प्रकारसे गान योग्य कर्त्तव्य नहीं है; इसी प्रकार अंध- कारमें भी न गावे, हे महामुने ! इस प्रकारसे योग्य अयोग्य कर्त्तव्य विचारे १२।।

एवमुक्तः स भगवात्रारदो विधिरक्षणे ।। अशिक्षत तथा गीतं दिव्यवर्षसहस्रकम् ।। १३ ।। ततः समस्तसंपन्नो गीतप्रस्तावका- दिषु ।। विपंच्यादिषु संपन्नः सर्वस्वरवि भागवित् ।। १४ ।। जब इस प्रकारसे कहा तब दिव्य सहस्त्र वर्षतक नारदजी गीत सीखते रहे ।। १३ ।। तब गीतकी प्रस्तावना आदिके पारगामी हुए वीणाके सब स्वरोंके ज्ञान हुए ।। १४ ।।

अयुतानि च षट्त्रिंशत्सहस्राणि शतानि च ।। स्वराणां भेदयोगेन ज्ञातवान्मुनिसत्तमः ।। १५ ।। ततो गंधर्वसंघाश्च किन्नराणां तथा गणाः ।। मुनिना सह संयुक्ताः प्रीतियुक्तास्तु तेऽभवन् ।। १६ ।। छियालीस सहस्त्र ४६००० स्वरभेदोंको नारदजीने भली प्रकारसे जान लिया ।। १५ ।। तथा गंधर्व और किन्नरोंके समूह मुनिके संगमें परम प्रीतिका प्राप्त हुए ।। १६ ।।

गानबंधुं मुनिः प्राह प्राप्य गानमनुत्तमम् ।। त्वां समासाद्य संपन्नं त्वं हि गीतविशारदः ।। १७ ।। ध्वांकशत्रो महाप्राज्ञ किमवाप्यं करोमि ते ।। गानबंधुस्ततः प्राह नारदं मुनि पुंगवम् ।। १८ ।। तब गानबंधुसे नारदजीने कहा, अब मैं तुमको प्राप्त हो उत्तम गानयोगको प्राप्त हुआ तुम सम्पन्न और गीतविशारद हो ।। १७ ।। हे उलूकराज ! अब मैं तुम्हारा क्या प्रिय करूं ? तब गानबन्धुने नारदजीसे कहा ।। १८ ।।

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