भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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(४४) · अद्भुतरामायण [सप्तम-

ब्रह्मणो दिवसे ब्रह्मन्मनवः स्युश्चतुर्दश ॥ ततस्त्रैलोक्यसंप्लाबो भविष्यति महामुने ॥ १९ ॥ तावन्मे स्याद्यशोभागस्तावन्मे परमं शुभम् ॥ मनसाध्यापितं मे स्याद्दाक्षिण्यान्मुनिसत्तमः ॥ २० ॥

हे भगवन् ! ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मनु बीत जाते हैं उस समय त्रिलोकी नष्ट हो जायगी ॥ १९ ॥ तवतकं मेरा उत्तम यश बना रहे, हे मुनिश्रेष्ठ ! मनसे ही मुझको चतुरताकी प्राप्ति हो जाय ॥ २० ॥

उलूकं प्राह देवर्षिः सर्वं तेऽस्तु मनोगतम् ॥ अतीते कल्पसंयोगे गरुडस्त्वं भविष्यसि ॥ २१ ॥ गुणगानादच्युतस्य सायुज्यं तस्य लप्स्यसे ॥ स्वस्ति तेऽस्तु महाप्राज्ञ गमिष्यामि प्रसीद मे ॥ २२ ॥

देवर्षिने उलूकसे कहा, जो तुम्हारी इच्छा है, वह सब होजायगा, एक कल्प बीत जानेपर तू गरुड होगा ॥ २१ ॥ और नारायणके गुण गान करनेके कारण उनकी सायुज्यताको प्राप्त होगा हे महाप्राज्ञ ! आपका मंगल हो मैं जाता हूं तुम प्रसन्न रहो ॥ २२ ॥

एवमुक्त्वा ययौ विप्रो जेतुं तुंबुरुमुत्तमम् ॥ तुंबुरोश्च गृहाभ्याशे ददर्श विकृताकृतीन् ॥ २३ ॥ कृत्तबाहूरुपादांश्च कृतनासा- क्षिवक्षसः ॥ कृतोत्तमांगांगुलींश्च छिन्नभिन्नकलेवरान् ॥ २४ ॥

यह कह नारदजी तुम्बुरुके जीतनेको गये, तब तुम्बेरुके घरके निकट विकृत आकारवाले ॥ २३ ॥ हाथ जंघा पैर कटे नासिका वक्षस्थल कटे, छिन्न शिर, कोई अंगुलीसे छिन्न कोई भिन्न कलेवर ॥ २४ ॥

पुंसः स्त्रियश्च विकृतानददर्शायुतशो बहून् ॥ नारदेन च ते प्रोक्ताः के यूयं कृतविग्रहाः ॥ २५ ॥ नारदं प्रोचुरपि ते त्वया कृतांगा वयम् ॥ वयं रागाश्च रागिण्योगानेन भिन्नसंधिना ॥ २६ ॥

ऐसी सहस्रों स्त्रियोंको नारदजीने देखकर उनसे पूछा तुम्हारे अंग किसने नष्ट करदिये ॥ २५ ॥ यह सुन उन्होंने नारदजीसे कहा, आपनेही हमारी यह दशा की है, हम राग रागिनी हैं जिस समय आप भिन्न सन्धानसे ॥ २६ ॥

भवता गीयते यर्हि तर्ह्यवस्थेदृशी हि नः ॥ पुनस्तुंबुरुगानेन च्छिन्नभिन्नप्ररोहणम् ॥ २७ ॥ तुंबुरुर्जीवयत्येष त्वं मारयसि नारद ॥ तदाश्चर्यं महद्दृष्ट्वा श्रुत्वा च विस्मयान्वितः ॥ २८ ॥

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