अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(५०) अद्भुतरामायण [ अष्टम-
कि, मैं त्रिलोकीका अधिपति अजर और अमर हो जाऊं, तब बहुत वर्षोंतक तप करके प्रकाशमान अग्निके समान प्रज्वलित हो उठा ॥ ३ ॥ जब उसके तेजसे सब जगत् दग्ध होने लगा तब देवताओंके सहित ब्रह्माजी आकर उससे कहने लगे ॥ ४ ॥
पौलस्त्य विरमाद्य त्वं तपसो मम वाक्यतः । तपसोग्रेण महता लोका भस्मीकृता इव ॥ ५ ॥ वरं ददामि ते वत्स यत्ते मनसि वर्तते । तपोधन लभस्वाद्य वरदान्मत्त ईप्सितम् ॥ ६ ॥
हे रावण ! अब तुम तपसे विरामको प्राप्त हो तुम्हारे तपसे संपूर्ण लोक भस्म हुएके समान हैं ॥ ५ ॥ हे वत्स ! जो तुम्हारे मनमें इच्छा है वह वर तुमको दूंगा तुम मुझसे इच्छित वरको प्राप्त होगे ॥ ६ ॥
न्यवारयत चक्षूंषि सूर्य्यबिंबावलोकनात् । प्रणिप्रत्यजगन्नाथं वरं वव्रे व रावणः ॥ ७ ॥ देहि सर्वामरत्वं मे वरदोऽसि यदि प्रभुः । तदाकर्ण्य वचो ब्रह्मा पुनः प्राह स रावणम् ॥ ८ ॥
अब तुम सूर्य्यके बिंबके अवलोकनसे नेत्रोंको निवारण करो, तब ब्रह्माजीको प्रणाम कर रावण वर मांगने लगा ॥ ७ ॥ हे प्रभु ! यदि वरदान देते हो तो मुझे सबसे अमर कर दीजिये, यह बचन सुनकर ब्रह्माजी फिर रावणसे बोले ८ ।
नहि सर्वामरत्वं ते वरमन्यं वृणीष्व मे । ततः स रावणः प्राह कूट वादी हि राक्षसः ॥ ९ ॥ न सुरा नासुरा यक्षाः पिशाचोरगराक्षसाः । विद्याधराः किन्नरा वा तथैवाप्सरसां गणाः ॥ १० ॥
कि, कोई सबसे अमर नहीं होसकता, तुम दूसरा वर मांगो, तब यह कूटवादी राक्षस बोला ॥ ९ ॥ सुर असुर यक्ष पिशाच राक्षस उरग विद्याधर किन्नर अप्सराओंके गण ॥ १० ॥
न हन्युर्मां कथं चित्ते देहि मे वरमुत्तमम् । अन्यच्च ते वृणे ब्रह्मंस्तच्छृणुष्व पितामह ॥ ११ ॥ आत्मनो दुहिता मोहादत्यर्थं प्रार्थिता भवेत् । तदा मृत्युर्मम भवेद्यदि कन्या न कांक्षति ॥ १२ ॥
मुझे किसी प्रकार मार न सकें यही उत्तम वर दीजिये; हे ब्रह्माजी ! और जो वर माँगते हैं वह भी आप श्रवण कीजिये ॥ ११ ॥ जब मैं अज्ञानसेही अपनी कन्याकेही स्वीकारकी इच्छा करूँ तब मेरी मृत्यु हो ॥ १२ ॥