भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (४९)

यह आपसे गीतका वर्णन किया ब्राह्मण वासुदेव नामको रातदिन गान करता हुआ ॥ ६३ ॥ हरिका गान करनेसे सायुज्य और सब यज्ञोंका फल प्राप्त होता है दूसरेकी कीर्ति गान करनेसे नरक होता है ॥ ६४ ॥

कर्मणा मनसा वाचा वासुदेवपरायणः । गायञ्छृण्वंस्तमाप्नोति तस्माच्छ्रेष्ठः प्रियंवदः ॥ ६५ ॥ कथितमिदमपूर्वं जानकीजन्मपूर्वं श्रुति-सुखमतिगुह्यं स्नेहतस्तेऽतिवाह्यम् । कलुष कुलविपक्षं भव्य-दानैकदक्षं नृभिर विरतवंद्यं सर्वदेवाभिनंद्यम् ॥ ६६ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकांडे नारदगान प्राप्तिवर्णनं सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥

मन वचन कर्मसे वासुदेवपरायण हो गाना श्रवण करनेसे उस पदकी प्राप्ति होती है, इस कारण वह प्रियंवद और श्रेष्ठ है ॥ ६५ ॥ आपसे यह अपूर्व जानकीजन्मका कारण कहा यह कर्णसुखद अतिगुह्य है आपके स्नेहसे वर्णन किया है, पापका नाश करनेवाला कल्याण देनेमें एकही चतुर वैरागियोंको सुखदायक और सब देवताओंको आनन्द देनेवाला है ॥ ६६ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामा.णे वा. आ. अद्भुतोत्तरकाण्डे पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र कृत भाषाटीकायां नारदगानप्राप्तिवर्णनं नाम सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥

अष्टम सर्ग

सीताजीका जन्मवर्णन

यथा सा शोणितोद्भूता राक्षसीगर्भ संभवा । यथा भूमितलोत्पन्ना जानकी च यथा हि सा ॥ १ ॥ सीता तच्छृणु विप्रेन्द्र वर्णयामि तवा-नघ । दशास्यो रावणो नाम तपस्तप्तुं मनो दधे ॥ २ ॥

और जिस प्रकार लक्ष्मी रुधिरसे राक्षसीके गर्भद्वारा उत्पन्न होकर फिर भूमितलमें प्राप्त हुई सो कथा सुनो ॥ १ ॥ हे विप्रेन्द्र ! वह कथा मैं आपसे वर्णन करता हूं सुनो—जिस समय दशमुख रावणने तप करनेकी इच्छा की । २ ।

त्रैलोक्यस्याधिपत्याय अजरामरणाय च ॥ बहुवर्षं तपस्तप्त्वा ज्वलनार्कसमोज्ज्वलत् ॥ ३॥ तत्तेजसा जगत्सर्वं दह्यमानं यदाभवत् । तमुवाच तदा ब्रह्मा समागत्य सुरैर्वृतः ॥ ४ ॥