अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
पृष्ठ 58, कुल 173 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्ग ] हिन्दीटीकासहित (५१)
तथेत्युक्त्वा जगामाशु ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ नरांश्चाजीगणद्रक्षो मत्वा तांस्तृणवद्द्विज ॥ १३ ॥ ब्रह्मदत्तवरो राजा रावणोवरदर्पितः ॥ त्रैलोक्यजयसर्वस्वं प्राप्तवान्बाहुवीर्यतः ॥ १४ ॥
बहुत अच्छा यह कहकर ब्रह्माजी ब्रह्मलोकको चले गये मनुष्योंको तृणके समान मानकर ब्रह्माजीसे मनुष्योंका अवैध्यत्व नहीं मांगा ॥ १३ ॥ ब्रह्माजीके वरदानसे मत्त हुआ रावण बडे पराक्रमसे त्रिलोकीके जय सर्वस्वको प्राप्त हुआ ॥ १४ ॥
एकदा रावणो राजा दंडकारण्यमागतः ॥ तदर्षीन्नग्निकल्पांश्च दृष्ट्वा मनस्यचिंतयत् ॥ १५ ॥ एतान जित्वा हि कथं त्रिलोकीजयभागहम् ॥ एषां वधेन च श्रेयो न पश्यामि महात्मनाम् ॥ १६ ॥
एक समय राजा रावण दण्डकारण्यमें प्राप्त हुआ वहांके अग्निके समान कान्तिमान् ऋषियोंको देखकर विचार करने लगा ॥ १५ ॥ बिना इनके जीते कैसे मैं त्रिलोकीका जीतनेवाला हो सकता हूं और इन महात्माओंके मारनेसे भी मैं मंगल नहीं देखता हूं ॥ १६ ॥
दुरात्मा स विचिंत्यैतत्प्राह तान्मुनिपुंगवान् ॥ अहं सर्वस्य जगतः शास्ताः च जयभागहम् ॥ १७ ॥ भवतां जयमाकांक्षे जयं दत्त द्विजर्षभाः ॥ इत्युक्त्वा स शराग्रेण क्षताच्छोणितमंगतः ॥ १८ ॥
यह विचार कर वह दुरात्मा उन मुनियोंसे कहने लगा में सब जगत्का शास्ता और जयभागी हूं ॥ १७ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! आपके जय करनेकी इच्छा करता हूं; हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! मुझे जय दो यह कह बाणके अग्रभागको चुभाय उनके शरीरसे रुधिर ॥ १८ ॥
बलादाकृष्य तेषां वै कलशेऽस्थापयत्प्रभुः ॥ तत्र गृत्समदो नाम शतपुत्रपिता द्विजः ॥ १९ ॥ दुहित्रर्थे भार्यया स प्रार्थितो भगवान् मुनिः । लक्ष्मीर्मे दुहिता भूयादित्यसौ कलशे विभुः ॥ २० ॥
बलपूर्वक निकालकर एक कलशमें स्थापन करता हुआ, उनमें एक गृत्समद ब्राह्मण सौ पुत्रका पिता था ॥ १९ ॥ उसने भार्यासहित भगवानसे एक कन्याकी प्रार्थना की थी कि, लक्ष्मी मेरी कन्या होजाय इस प्रकार वह कलशेमें ॥ २० ॥