अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(५२) अद्भुतरामायण अष्टम-
दुग्धं चाहरहस्तत्र कुशाग्रेण समंत्रतः ॥ स्थापयत्येष नियत- स्तदहर्निर्ययौ वनम् ॥ २१ ॥ तद्दिने दैवयोगेन कलशे तत्र रावणः ॥ मुनीनां शोणितं स्थाप्य गृहीत्वा स्वगृहं ययौ ॥ २२ ॥ कुशाग्रभागसे दुग्धकी स्थिति करता हुआ और कलशमें दूध रखकर वह बनको चला गया ॥ २१ ॥ दैवयोगसे रावणने उस दिन उसी कलशमें ब्राह्मणों- का रुधिर भरा और घरको लेगया ॥ २२ ॥
भार्या मंदोदरीं प्राह कलशं रक्ष सुंदरि ॥ विषादप्यधिकं विद्धि शोणितं कलशे स्थितम् ॥ २३ ॥ न देयं नापि वा भक्ष्यं मुनीनां शोणितं त्विदम् ॥ त्रैलोक्यजयलाभेन रावणो लोकरावणः ॥ २४ ॥ और अपनी भार्या मंदोदरीसे कहा हे सुन्दरी ! इस कलशको अच्छी प्रकारसे रक्षा कर; जो रुधिर इस कलशमें स्थित है उसको विषसे भी तीक्ष्ण जान ॥ २३ ॥ यह मुनियोंका रुधिर न किसीको देना चाहिये न भक्षण करना चाहिये, लोकोंका रुवानेवाला रावण त्रिलोकीके जयलाभसे ॥ २४ ॥
देवदानवयक्षाणां गंधर्वाणां च कन्यकाः ॥ आहृत्य रमयामास मंदरे सह्यपर्वते ॥ २५ ॥ हिमवन्मेरुविंध्याद्रौ रमणीयवने तथा ॥ मंदोदरी तथा दृष्ट्वा पतिं सा हि मनस्विनी ॥ २६ ॥ देव दानव यक्ष और गन्धर्वोंकी कन्या लाकर मन्दर पर्वतपर और सह्यपर्वत- पर रमता था ॥ २५ ॥ हिमालयमें रमणीय विंध्याचलमें विहार करने लगा, तब इस प्रकार मंदोदरी अपने पतिको देखकर ॥ २६ ॥
आत्मानं गर्हयामास भर्तुः स्नेहमपश्यती । धिग्जीवितं हि नारीणां यौवनं कुलमेव च ॥ २७ ॥ वंचिताः पतिना याः स्युस्तस्मान्मे मरणं वरम् ॥ पुरा रावणसंदिष्टं शोणितं श्वेडतोऽधिकम् ॥ २८ ॥ भर्ताका स्नेह औरोंमें देखकर अपनी निन्दा करने लगी कि, स्त्रियोंके जीवन और कुलको धिक्कार है ॥ २७ ॥ पतिसे वंचित होकर मेरा मरनाही अच्छा है पहले जो रावने कहा कि, यह रुधिर तीक्ष्ण है ॥ २८ ॥
पपौ मरणमाकांक्ष्य पतिना वंचिता सती । लक्ष्मीशरणदुग्धेन मिश्रिताच्छोणितादभूत् ॥ २९ ॥ सद्यो रावणकांताया गर्भो ज्वलन- सन्निभः । ततो विस्मयमापन्ना सा हि मंदोदरी शुभाः ॥ ३० ॥