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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (८९)

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जगदेतन्महाबाहो पुनर्जातमिवाभवत् ॥ न रावणादभ्यधिको दुष्टो लोकभयंकरः ॥ ११ ॥ दशास्यैर्दशदिक्कार्यमाज्ञापयति राक्षसः ॥ स दशास्यो हतो राम दिष्ट्या च जगदुद्धृतम् ॥ १२ ॥ मानो यह जगत् फिर उत्पन्न हुआ है, रावणसे अधिक लोगोंको भयदायक कोई दुष्ट नहीं था ॥ ११ ॥ इस राक्षसकी दशोंदिशाओंमें आज्ञा प्रचलित होती थी, भाग्यसे उसको मारकर आपने जगत्का उद्धार किया ॥ १२ ॥

भगवानसि भूपाल ब्रह्मणा प्रार्थितः पुरा ॥ पुंडरीकविशालाक्षः श्याम आजानुबाहुकः ॥ १३ ॥ अयोध्यायां प्रादुरभूदिक्ष्वाकुकुल नंदनः ॥ त्वद्दर्शनान्महाबाहो निवृत्ताःस्मो वयं प्रभो ॥ १४ ॥ हे राम ! आप प्रथम ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेसे भूपालरूप धारण कर आये हो, आपके कमलकेसे बडे नेत्र हैं, श्यामशरीर जानुपर्यन्त लम्बी भुजा हैं। १३ । इक्ष्वाकुकुलके आनन्द देनेको आप आयोध्यामें प्रगट हुए हो, हे प्रभो ! आपके दर्शनसेही हम आनन्दित हो गये ॥ १४ ॥

तपश्चरामः सहितास्त्वत्प्रसादाद्वनेवने ॥ किंतु सीता महादेवी प्राप दुखं महत्प्रभो ॥ १५ ॥ तदेव स्मर्यमाणं सच्चित्तमुद्वेजयेद्धि नः ॥ एवमुक्ते तु मुनिभिः सानुक्रोशं पुनः पुनः ॥ १६ ॥ आपके प्रसादसे वन वनमें निर्भयतप करते हैं, हे प्रभो ! परन्तु सीतादेवीने महादुःख पाया है ॥ १५ ॥ यही स्मरण करनेसे हमारा चित्त उद्वेजित है, जब दयासे वारम्वार मुनिजनोंने यह वचन कहे ॥ १६ ॥

जहास मधुरं साध्वी सीता जनक नंदिनी ॥ उवाच सस्मितं देवी तान्मुनीन्मितभाषिणी ॥ १७ ॥ मुनयो यद्यदुक्तं हि रावणस्य वधं प्रति ॥ परिहास इवाभाति प्रशंसनमिदं द्विजाः ॥ १८ ॥ तब जनकनंदिनी साध्वी सीता हँस पडी और हँसती हुई देवी उन मुनियोंसे कहने लगी ॥ १७ ॥ जो कुछ मुनियोंने रावणके वधके प्रति कहा है हे ब्राह्मणो ! यह प्रशंसा परिहास कहलाती है ॥ १८ ॥

रावणो हि दुराचारः सत्यमेतन्न संशयः ॥ दशभिर्वदनैर्वीरो जगदुद्वेजको हि सः ॥ १९ ॥ दशास्यस्य वधो विप्रा न प्रशंसामिहा- र्हति ॥ एतच्छ्रुत्वा तु मुनयो विस्मयं परमं गताः ॥ २० ॥

(९०) अद्भुतरामायण [ सप्तदश-

रावण बडा दुराचारी था यह सत्य है और इसमें सन्देह नहीं है, वह अपने दशवदनोंसे जगत्का उद्वेजन करनेवाला था ।। १९ ।। परन्तु हे ब्राह्मणो ! रावणका वध कुछ विशेष प्रशंसाके योग्य नहीं है यह वचन सुनकर मुनि परम विस्मयको प्राप्त हुए ।। २० ।।

किमेतदिति होचुस्ते परस्परमुखेक्षणाः ।। अयोनिसां भवा सीता काकुत्स्थकुलमाश्रिता ।। २१ ।। अस्मानपिंजहासेयं किमेतन्नैव विद्महे ।। तच्छ्रु.त्वा वचनं तेषां मुनीनां भावितात्मनाम् ।। २२ ।।

और यह क्या है ऐसा कह परस्पर एक दूसरेका मुख देखने लगे, अयोनिसे उत्पन्न हुई सीता इक्ष्वाकुवंशके आश्रित हुई ।। २१ ।। हमारे वचनोंपर हास्य करती है इसका कारण हम नहीं जानते हैं तब उन ज्ञानात्मा मुनियोंके यह वचन सुनकर ।। २२ ।।

सीता भीता प्रणम्योचे कृतांज्जलिपुटा सती । पृथग्जनेव ❊ मुनयो नाहमनृतभाषिणी ।। २३ ।। यदि चाज्ञापयथ मां तदा वक्ष्यामि चादितः ।। अगस्त्यप्रमुखा विप्राः सीताया विनयान्वितम् ।। २४ ।।

जानकी डरती हुई प्रणाम कर कहने लगी हे मुनियो ! मैं पामर मनुष्योंके समान असत्यभाषिणी नहीं हूँ ।। २३ ।। जो आप मुझे आज्ञा दें तो मैं आदिसे कहती हूँ, तब अगस्त्यादि ऋषि जानकीके यह विनययुक्त वचन ।। २४ ।।

आकर्ण्य वचनं प्रीताः प्रोचुस्ते कथ्यतामिति ।। ततः सीता महाभागा प्रवक्तुमुपचक्रमे ।। २५ ।। पतिं मुनीन्देवरंश्च मंत्रिणः श्रेणिमुख्य-कान् ।। विनयेनाभ्यनुज्ञाप्य पूर्ववृत्तांतमादरात् ।। २६ ।।

सुनकर जानकीसे कहने लगे वर्णन करो तब महाभागा जानकी कहनेकी इच्छा करने लगी ।। २५ ।। पति मुनि देवर मन्त्री और और श्रेणीके मुख्य लोगोंसे आज्ञा ले पूर्ववृत्तान्त वर्णन करने लगी ।। २६ ।।

पूर्वं विवाहान्मुनयो यदास पितृमंदिरे ।। तदैकोऽतिथिरूपेण ब्राह्मणः समुपागतः ।। २७ ।। आगत्य पितरं मह्यं तमुवाच द्विजोत्तमः ।। चतुरो वार्षिकान्मासान्स्थास्यामि तव मंदिरे ।। २८ ।।

हे मुनियो ! विवाहसे पूर्व जब मैं अपने पिताके मंदिरमें रहती थी तब


* पामर इव संधिरार्षः ।

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अतिथिरूप वहां एक ब्राह्मण आया ॥ २७ ॥ वह ब्राह्मण आकर मेरे पितासे कहने लगा मैं चौमासेके चारं महीने तुम्हारे मंदिरमें रहूंगा ॥ २८ ॥

यदि सेवापरो नित्यं भवस्यमरसन्निभः ॥ जनको मत्पिता देवद्विजभक्तिपरायणः ॥ २९ ॥ ब्राह्मणं वासयामास नानाभक्ष्यं समादिशत् । अहं च तस्य सेवायै नियुक्ता धर्मभीरुणा ॥ ३० ॥

हे राजन् ! जो नित्य मेरी सेवामें तत्पर रहोगे तो, देवताहो जावोगे हमारे पिता जनकजी द्विज और देवताकी भक्तिमें परायण हैं ॥ २९ ॥ उस ब्राह्मणको नाना प्रकारके भक्ष्य भोज्यकी सामग्री प्रदान की गई; और धर्मभीरु हमारे महाराजने मुझे उसकी सेवा करनेको नियुक्त किया ॥ ३० ॥

यदा यथाज्ञापयति द्विजः स परमार्थवित् । तं तथा ह्यकरवं तत्र रात्रिन्दिवमतन्द्रिता ॥ ३१ ॥ नानातीर्थाभिगमनं कृतं तेन महात्मना। तत्रत्याश्च यथाश्चित्राः श्रावयामास मां द्विजः ॥ ३२ ॥

परमार्थका जाननेवाला वह ब्राह्मण जो जो आज्ञा देता, वह मैं रातदिन निरालस्य होकर सम्पादन करती थी ॥ ३१ ॥ उस महात्माने अनेक तीर्थोंमें अभिगमन किया था, वहां उस ब्राह्मणने मुझे अनेक प्रकारकी कथा श्रवण कराई ॥ ३२ ॥

सेवया मम धैर्येण चानुकूल्येन तर्पितः । कदाचिद्ब्राह्मणश्रेष्ठः प्रियभाषी यदात्थ माम् ॥ ३३ ॥ तद्वोऽहमभिधास्यामि शृणुत द्विजपुंगवाः । एकदा प्रातरुत्थाय कृतमैत्रः कृताह्निकः ॥ ३४ ॥

मेरी सेवा, धैर्य और अनुकूलतासे तृप्त होकर एक समय वह प्रियभाषी श्रेष्ठ ब्राह्मण मुझसे कहने लगा ॥ ३३ ॥ हे ब्राह्मणो ! वह मैं तुमसे वर्णन करती हूं एक समय ब्राह्मण प्रातःकाल उठकर सूर्यार्घादि कर्म कर ॥ ३४ ॥

सीते इति समाभाष्य प्रवक्तुमुप चक्रमे । शृणु सीते मया दृष्टमाश्चर्यं कमलानने ॥ ३५ ॥ दधिमंडोदकाब्धेश्चय परः स्वादूदकोब्धिकः । पुष्करद्वीपमावृत्य वर्तते वलया कृतिः ॥ ३६ ॥

हे सीते ! ऐसा संबोधन देकर कहनेकी इच्छा करने लगा, हे कमलानने जानकी, जो आश्चर्य मैंने देखा है वह सुन ॥ ३५ ॥ दही मांड और जलके सागरसे परे स्वादु जलका समुद्र है, वह पुष्करद्वीपको घेरकर वलयाकार स्थित हुआ है ॥ ३६ ॥

(९२) अद्भुतरामायण [ सप्तदश-

पुष्करं पुष्करे दृष्टं महावह्निशिखोज्ज्वलम् । पत्रायुतायुतयुतं ब्रह्मणः परमासनम् ॥ ३७ ॥ तद्द्वीपवर्षयोर्मध्ये मानसोत्तरसंज्ञकः । मर्यादापर्वतो दैर्घ्ये चायामेऽयुतयोजनः ॥ ३८ ॥

वहां महाकमल अग्निशिखाके समान प्रकाशित है दश सहस्र कर्णिकायुक्त ब्रह्माजीका परमासन है ॥ ३७ ॥ उस द्वीप और वर्षके बीचमें मानसोत्तर संज्ञावाले मर्यादापर्वत लम्बाई चौडाईमें दशसहस्र योजनके हैं ॥ ३८ ॥

तच्छैलस्य चतुर्दिक्षु इंद्रादीनां पुराणि हि । क्रीडार्थं निर्मितान्येषां महांति विश्वकर्मणा ॥ ३९ ॥ सुमाली राक्षसश्रेष्ठ कैकसी नाम तत्सुता । मुनेर्विश्रवसः पत्नी सासूत रावणद्वयम् ॥ ४० ॥

उस पर्वतकी चारों दिशाओंमें इन्द्रादि लोकपालोंके पुर हैं विश्वकर्माने उनको क्रीडाके निमित्त निर्माण किया है ॥ ३९ ॥ एक राक्षस श्रेष्ठ सुमाली जिसकी कैकसी नाम कन्या थी, वह विश्रवस मुनिकी पत्नी दो रावण उत्पन्न करती हुई ॥ ४० ॥

एकः सहस्रवदनो द्वितीयो दशवक्त्रकः । जन्मकाले सुरैरुक्तमाकाशे रावणद्वयम् ॥ ४१ ॥ लोकानां रावणाज्जातं नामयौगिकमेतयोः । कनिष्ठो दशकंठोऽयं शितिकंठप्रसादतः ॥ ४२ ॥

एक सहस्रमुखका, दूसरा, दशमुखका था, जन्मकालमें आकाशमें देवताओंने कह दिया था कि रावण दो हैं ॥ ४१ ॥ लोकमें दो रावण हुए हैं इस कारण उनका एकही नाम था उनमें छोटा यह शिवजीके प्रसादसे ॥ ४२ ॥

लंकामधिवसत्येष धनदेन विनिर्मिताम् । ब्रह्मणो वरदानेन त्रिलोकीमवमन्यते ॥ ४३ ॥ श्रेष्ठः सहस्रवदनो रावणो लोकरावणः । स्वाभाविकबलेनासौ पुष्करद्वीपमाश्रितः ॥ ४४ ॥

कुबेरकी निर्मित की हुई लंकापुरीमें निवास करता है और ब्रह्माके वरदानसे त्रिलोकीका तिरस्कार करता है ॥ ४३ ॥ इसमें जो लोकका रुवानेवाला था उसने स्वाभाविक बलसे पुष्करद्वीपका आश्रय किया है ॥ ४४ ॥

सूर्य्याचन्द्रमसौ गृह्य क्रीडेत्कंदुकलीलया ॥ कुलाचलान्समुद्गृह्य कंदुकं क्रीडते हि सः ॥ ४५ ॥ मानसोत्तरशैलस्य चतुर्दिक्षु पुराणि हि ॥ आच्छिद्य संगृहीतानि दिगीशानां महात्मनाम् ॥ ४६ ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (९३)

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यह चन्द्र सूर्यको ग्रहण कर कंदुकलीला कर सकता है तथा कुलाचल पर्वतोंको लेकर कंदुकक्रीडा करता है ॥ ४५ ॥ जो मानस सरोवरके उत्तर चारों ओर पुर हैं उनको छेदनकर महात्मा दिक्पालोंको ग्रहण किया है ॥ ४६ ॥

तत्रैव रमते राजा मातामहकुलैः सह ॥ तत्रेंद्री या पुरी रम्या स स्वयं तत्र तिष्ठति ॥ ४७ ॥ अन्यान्यन्येभ्य एवादान्मंत्रिभ्यो राक्षसाधिपः ॥ विशेषतोऽलंकृता सा पुरी परमदुर्लभा ॥ ४८ ॥

वहां वह राजा मातामहके कुलसहित रमण करता है वहां एक इंद्रकी पुरी है जहां वह स्वयं स्थित हो रमता है ॥ ४७ ॥ उस राक्षसराजने अनेकोंको मंत्रिपद प्रदान किया है, विशेष करके वह पुरीं प्राणियोंको परम दुर्लभ है । ४८ ।

जगतां सारमाकृष्य यथास्थानं सुमंडिता ॥ चंपकाशोकमन्दारकदलीप्रियकार्जुनैः ॥ ४९ ॥ पाटलाशोकजंबूभिः कोविदारैश्च चंदनैः ॥ पनसैः सालतालैश्च तमालैर्देवदारुभिः ॥ ५० ॥

जगत्के सार खेंचकर उसको निर्माण किया है, चम्पक अशोक मन्दार कदली प्रिय अर्जुन ॥ ४९ ॥ पाटल अशोक जम्बू कोविदार चन्दन पनस साल तमाल ताल देवदारु ॥ ५० ॥

बकुलैः पारिजातैश्च कल्पवृक्षैरलंकृता ॥ अन्यैश्च विविधैर्वृक्षैः सर्वर्तुकुसुस्मोज्ज्वलैः ॥ ५१ ॥ दिव्यगन्धरसैर्दिव्यैः सर्वर्तुफलसंयुतैः ॥ भ्रमरैः कोकिलैर्नानावर्णपक्षिभिरुज्ज्वला ॥ ५२ ॥

वकुल पारिजात तथा कल्पवृक्षोंसे अलंकृत और भी सब ऋतुओंके फूलोंसे युक्त ॥ ५१ ॥ दिव्य गन्धरसोंसे युक्त सम्पूर्ण ऋतुओंके फलसे संयुक्त भौंरे कोयल और जहां नाना पक्षी बोल रहे हैं ॥ ५२ ॥

शातकौंभमयैः कैश्चित्कैश्चिदग्निशिखोपमैः ॥ नीलांजलनिभैश्चान्यैः शोभिता वरपादपैः ॥ ५३ ॥ दीर्घिकाः संति बह्व्योऽत्र जल पूर्णा महोदयाः ॥ महार्हमणिसोपानाः स्फाटिकांतर्कुट्तिमाः ५४

कहीं सुवर्णके बने कहीं अग्निके शिखाके समान कहीं नीलांजन पर्वत उज्ज्वल पर्वतोंसे शोभित हैं ॥ ५३ ॥ जहां जलसे अनेक बावडी शोभित हैं जहां महा महामणियोंकी जटिल सीढी बनी हैं ॥ ५४ ॥

फुल्लपद्मोत्पलवनाश्चक्रवाकोपशो-भिताः दात्यूहगणसंघृष्टा

(९४) अद्भुतरामायण [सप्तदश-

हंससारसनादिताः ॥ ५५ ॥ तत्र तत्रावनेर्देशा वैदूर्यमणिसन्निभाः ॥
शार्दूलैः परमोपेताः सुखार्थमुपकल्पिताः ॥ ५६ ॥
फूले पद्म उत्पलके वनके वन है, उनपर चकवाचकवी शोभित हैं, पक्षीगणोंसे नादित है ॥ ५५ ॥ उस वनके देश जहां तहां वैदूर्यमणियोंसे शोभित, शार्दूललोंसे युक्त जो सुखके निमित्त कल्प किये हैं ॥ ५६ ॥

सर्वर्तुसुखदा रम्याः पुंस्कोकिलकला रवाः ॥ ये वृक्षा नंदनेऽ-
तिष्ठन् ये च चैत्रवने स्थिताः ॥ ५७ ॥ मन्दरेऽन्येषु शैलेषु ते वृक्षास्तत्र
संस्थिताः ॥ नानामणिमयी भूमिर्मुक्ताजालमयी तथा ॥ ५८ ॥
सबऋतुओंमें सुख देनेवाले पुंस्कोकिलाके शब्दोंसे युक्त जो वृक्ष नन्दनवनमें स्थित हैं जो चैत्रवनमें स्थित हैं ॥ ५७॥ जो वृक्ष मन्दराचलपर स्थित हैं जो भूमि नानामणिमय मुक्ताजालमयी ॥ ५८ ॥

विचित्रबद्धसोपानप्रासादैरुपशोभिता ॥ पुरद्वारसमाकीर्णा पुरी
परमशोभना ॥ ५९ ॥ न देवैरनुभूयेत स्वर्गिभिर्नोनुभूयते ॥ तत्पुरी-
स्थितिमाकांक्ष्य तपः कुर्वन्ति सत्तमाः ॥ ६० ॥
विचित्र सीढ़ियोंसे महलोंसे शोभित पुरद्वारोंसे आकीर्ण पुरी शोभित है ॥ ५९॥ जिसका देवता और स्वर्गी भी अनुभव नहीं कर सकते उस पुरीमें स्थितिके निमित्त महात्मा तप करते हैं ॥ ६० ॥

तस्यां सहस्त्रवदनो रावणो राक्षसाधिपः ॥ आस्ते जगद्वशीकृत्य
हेलया बाहु लीलया ॥ ६१ ॥ इंद्रादींस्त्रिदशान्सर्वान्गले बद्ध्वा स
किन्नरान् ॥ गन्धर्वान्निन्दानवान्भीमान्सर्पान्विद्याधरांस्तथा ॥ ६२ ॥
उसका राजा वह सहस्त्र मुखका रावण है, और सब जगत्को अपनी भुजाओंसे वश करके स्थित होता है ॥ ६१ ॥ वह इन्द्रादि देवताओंको किन्नरों गन्धर्वों दानव भयंकर सर्प और विद्याधरोंको पराजय कर ॥ ६२ ॥

बालक्रीडनया क्रीडन्मेरुं मन्येत सर्षपम् ॥ गोष्पदं मन्यते चाब्धि
सर्वलोकांस्तृणोपमान् ॥ ६३ ॥ द्वीपांल्लोष्टसमान्वीरो न किंचिद्गणय-
न्दृशा ॥ स यदा सर्वलोकानां त्रासने समुपारभत् ॥ ६४ ॥
उनसे बालक्रीडाके समान खेल करता हुआ मेरुको सरसोंके समान मानता है सागरको गौके पदके समान और सब लोक को तृणके समान ॥६३॥ द्वीपोंको

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मट्टीके ढेलेके समान मानता है और वीरोंको तो कुछ गिनताही नहीं है जब उसने सब लोकोंको त्रास देना आरंभ किया ॥ ६४ ॥

तदा पितामहोऽभ्येत्य पुलस्त्यो विश्रवास्तथा ॥ न्यवारयन्यत्न- स्ततं तातवत्सेति भाषकः ॥ ६५ ॥ एवं स रावणो देवि सहस्र वदनो महान् ॥ पुष्करद्वीपमासाद्य वर्तते जनकात्मजे ॥ ६६ ॥

तब पितामह पुलस्त्य और विश्रवाने आकर तात, वत्स आदि सम्बोधन देकर यत्नसे उसे निवारण किया ॥ ६५ ॥ हे देवी ! इस प्रकारका वह सहस्र वदन रावण पुष्करद्वीपमें निवास करता है ॥ ६६ ॥

तस्यानुजो दशास्योऽयं लंकायां जानकि स्थितः ॥ ६७ ॥ चित्राणीत्यादीनि मे शंसयित्वा विप्रो मासांश्चतुरो यापयित्वा ॥ राजानं मां चाशिषा योजयित्वा जगामैकः प्रोषितस्तीर्थयात्राम् ॥ ६८।

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वा. आ. अद्भुतोत्तरकाण्डे सीताभाषणं नाम सप्तदशः सर्गः ॥ १७ ॥

हे जानकि ! उसका छोटा भाई लंकापुरीमें निवास करता है ॥ ६७ ॥ इस प्रकार और भी विचित्र कथा कह चार महीने निवास कर राजा और मुझको आशीर्वाद देकर वह ब्राह्मण तीर्थयात्राको चला गया ॥ ६८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रा. वा. आदि. अद्भु. ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां सीताभाषणं नाम सप्तदशः सर्गः ॥ १७ ॥


अष्टादश सर्ग

रावणकी सेनाका निकलना

एवं स रावणो विप्राः सहस्रवदनो महान् ॥ प्रोक्तस्तेन द्विजेनाहं श्रुत्वाश्चर्यं च विस्मिता ॥ १ ॥ अद्यापि तन्मय हृदि जागरूकं हि वर्तते ॥ पत्या मे बाहुवीर्येण दशास्यो रावणो हतः ॥ २ ॥

हे ब्राह्मणो ! इस प्रकार उस ब्राह्मणने मुझसे सहस्र मुखवाले रावणकी कथा कही थी, जिसे सुनकर मुझे बडा विस्मय हुआ ॥ १ ॥ अबतक वह मेरे हृदयमें जागते हुएके समान वर्तता है मेरे स्वामीने भुजबलसे दशशिरवाले रावणको मारा है ॥ २ ॥

(९६) अद्भुतरामायण [अष्टादश-

सानुगः ससुतामात्यः सभ्रातृकः सबान्धवः ॥ मत्कृते च पुरी दग्धा सेतुर्बद्धश्च वारिधौ ॥ ३ ॥ सुग्रीवेण सहायेन तथा हनुमदा- दिना ॥ इदं लोकोत्तरं कर्म कृतं लोकहितं महत् ॥ ४ ॥ पुत्र अनुचर भाई बन्धुओंके सहित उसे मेरे निमित्त मारकर लंकापुरी जलायी, सागरमें पुल बांधा ॥ ३ ॥ सुग्रीव और हनुमानाजीकी सहायता लेकर यह लोकके निमित्त बडा चमत्कारी कर्म किया है ॥ ४ ॥

तथापि हृदि मे नैतदाश्चर्यं प्रतिभाति हि ॥ यदि तस्य वधं कुर्याद्रावणस्य दुरात्मनः ॥ ५ ॥ तदा संभाव्यते कीर्त्तिर्जगत्स्वास्थ्यम- वाप्नुयात् । अतो मे हसितं विप्राः क्षमध्वं ज्वलनोपमाः ॥ ६ ॥ . परन्तु तथापि मेरे हृदयमें कुछ आश्चर्य नहीं विदित होता है, जो इस दुरात्मा रावणका वध किया तब आपकी महान् कीर्ति फैलकर जगत् स्वस्थ हो जाय, हे अग्नितुल्य ब्राह्मणो ! इस कारण आप मेरे हास्यको क्षमा करो । ५ । ६

आकर्ण्य मुनयः सर्वे साधु साध्विति वादिनः । जानकीं प्रशंसंसुस्ते सर्वलोकहितैषिणीम् ॥ ७ ॥ राघवो वचनं श्रुत्वा सीताया वीर्यवर्द्धनम् सिंहनादं विनद्योच्चैः सर्वाना ज्ञापयत्प्रभुः ॥ ८ ॥ यह वचन सुनकर सब मुनि धन्य धन्य कहने लगे, और सब जगत्की हित-कारिणी जानकीकी प्रशंसा करने लगे ॥ ७ ॥ रामचन्द्र सीताके वीर्यवर्द्धक वचन सुनकर सिंहनाद कर सबको आज्ञा देने लगे ॥ ८ ॥

मुनयोऽद्यैव गंतव्यं रावणस्य जयाय वै । लक्ष्मणं भरतं चैव शत्रुघ्नं चादिशत्प्रभुः ॥ ९ ॥ मित्र सुग्रीव हे राजन्सर्वे जांबवदादयः । गच्छामः सहितास्तत्र सैनिकैः सह मंत्रिभिः ॥ १० ॥ हे मुनियो ! आजही हम रावणको जीतने जाते हैं लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्नको प्रभुने आज्ञा दी ॥ ९ ॥ हे राजन् सुग्रीव ! मित्र और सम्पूर्ण सैनिकजनोंके सहित हम वहां जायेंगे ॥ १० ॥

इत्याज्ञाप्य महाबाहुः सस्मार पुष्पकं रथम् । स्मरणादागतस्तत्र पुष्कको रथसत्तमः ॥ ११ ॥ तत्रारुक्षन्महावीरारामाचन्द्रपुरो- गमाः । भरतो लक्ष्मणश्चैव शत्रुघ्नश्चामितद्युतिः १२ । - वह महाबाहु इस प्रकार कहकर पुष्पकको स्मरण करते हुए वह पुष्पक .

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१७)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१७)

विमान स्मरण करते ही आकर प्राप्त हुआ ।। ११ ।। उसके ऊपर रामचन्द्र आदि सम्पूर्ण वीर चढ़े भरत लक्ष्मण शत्रुघ्न जो स्थित हुए ।। १२ ।।

सुग्रीव प्रमुखाः सर्वे वानराजितकाशिनः । विभीषणो महाबाहुः सह रक्षोगणैः प्रभुः ।। १३ ।। मात्रा पित्राप्यकथनादजानन्बोधितोनया । सीतया रामकार्यार्थं निर्ययौ राघवाज्ञया ।। १४ ।।

सुग्रीवको आदि लेकर शत्रुको जीतनेवाले वानर तथा महाबाहुविभीषण राक्षसोंके सहित स्थित हुए ।। १३ ।। माता पिता आदिसे भी न कहकर इन जानकीके प्रेरे हुए रामचन्द्रकी आज्ञासे वे सब चले ।। १४ ।।

सुमंत्राद्या मंत्रिणश्च ऋषयस्ते च निर्ययुः । नानाशस्त्रप्रहरणा धृतायुधकलापिनः ।। १५ ।। मुमुचुस्ते सिंहनादं महाघोरं महाबलाः । धनुःशब्देन रामस्य सिंहनादेन चैव हि ।। १६ ।।

सुमन्त्रादि मन्त्री और वे सब ऋषि वहांसे चले; वे सब अनेक प्रकारके आयुध धारण कर बोलनेवाले ।। १५ ।। वे महाबली घोर सिंहनाद करने लगे, रामके धनुषशब्दसे और सिंहनादसे ।। १६ ।।

चचाल वसुधा शैलाश्चेलुः पेतुर्ग्रहाश्च खात् । नद्योऽशुष्यन्समुद्वेलाः सागराश्च चकंपिरे ।। १७ ।। सुग्रीवो हनुमान्नीलो जांबवान्नल एव च । ग्रसंत इव ते सर्वे निर्ययू रामशासनात् ।। १८ ।।

पृथ्वी और शैल चलायमान हो गये, तारे टूटने लगे, नदी सूखने लगी, सागरने मर्यादा छोडदी ।। १७ ।। सुग्रीव हनुमान् नील जाम्बवंत यह सब मानो आकाशको ग्रसते हुए चले ।। १८ ।।

स तया सीतया सार्धं रामचन्द्रो महाबलः । कामगं पुष्पकं दिव्यमारुरोह धनुर्धरः ।। १९ ।। पुष्पकं ते समारुह्य सर्व एव महाबलाः । सीतया भ्रातृभिः सार्द्धं रामचन्द्रं महाबलाः ।। २० ।।

फिर सीताके सहित महाबली रामचन्द्र धनुष धारण किये कामगामी पुष्पक विमानमें स्थित हुए ।। १९ ।। वे सब महाबली पुष्पकविमानमें स्थित होकर सीता और भाइयोंके सहित रामचन्द्र स्थित हुए ।। २० ।।

प्रोत्साहयंतो वचनैर्नियर्युजितकाशिनः । रामाज्ञया पुष्पकं तदा-

(९८) अद्भुतरामायण [अष्टादश-

काशपथमाश्रितम् ॥ २१ ॥ मनोमारुतवेगेन क्षणेन गरुडो यथा ॥ जगाम पुष्करद्वीपं यत्रास्ते मानसोत्तरः ॥ २२ ॥ वे शत्रुके जीतनेवाले थे उनको अपने वीरताके वचनोंसे उत्साह करते हुए तब रामचन्द्रकी आज्ञासे पुष्कविमान आकाशमें प्राप्त हुआ ॥ २१ ॥ मन और पवन तथा गरुडके समान वेगकर मानसोत्तर पुष्करद्वीपमें क्षणमात्रमें प्राप्त हुआ ॥ २२ ॥

मानसोत्तरमासाद्य विस्मितास्ते महाबलाः ॥ किं चित्रं किं चित्रमिति प्रोचुराश्चर्यलक्षणाः ॥ २३ ॥ राघवो भ्रातृभिः सार्द्धं सह वानरपुंगवैः ॥ सिंहनादं ननादोच्चैर्धनुश्चापि व्यकर्षयत् ॥ २४ ॥ मानसके उत्तर भागमें प्राप्त होकर वे महावली विस्मित हुए कैसा विचित्र है ? इस प्रकार वे वारंवार कहने लगे ॥ २३ ॥ रामचन्द्रने वानर और भ्राताओंके साथ सिंहनाद करके धनुषको खैंचा ॥ २४ ॥

स शब्दस्तुमुलो भूत्वा पृथिवीं चांतरिक्षकम् ॥ पातालविवरांश्चैव पूरयामास सर्वतः ॥ २५ ॥ रावणः सहसोत्तस्थौ किमेतदिति संव- दन् ॥ तत्राथ राक्षसाः क्रुद्धाः सर्व एव विनिर्ययुः ॥ २६ ॥ वह तुमुलशब्द पृथ्वी अन्तरिक्षाऔर सब ओरसे पातालके विवरोंको पूर्ण करता हुआ ॥ २५ ॥ तब रावण यह क्या है ऐसा कहकर एक साथ उठ बैठा और वहांके सब राक्षस क्रोध कर एक साथ वहां निकले ॥ २६ ॥

अहो कुतः स्विच्छब्दोऽयं साधु सर्वैर्निरूप्यताम् ॥ इत्याभाष्य राक्षसेंद्रो राक्षसैर्द्रर्महाबलैः ॥ २७ ॥ नगरान्निर्ययौ शीघ्रं संदष्टोष्ठ- पुटो बली ॥ द्वादशादित्यसंकाशः सहस्रवदनो महान् ॥ २८ ॥ और बोले जान्ना चाहिये कि, यह शब्द कहांसे होता है, इस प्रकार वह राक्षसेन्द्र महावली राक्षसोंके साथ शीघ्र ॥ २७ ॥ होठ चबाता हुआ निकला वह बारह सूर्यके समान सहस्र मुखका महाबली था ॥ २८ ॥

द्विसहस्रभुजोद्रिक्तो द्विसहस्रविलोचनः ॥ महामेघसमध्वानो वडवाग्निसमः क्रुधा ॥ २९ ॥ शतयोजनविस्तीर्णे रथे सूर्यसमत्विषि । नानायुधानि संगृह्य परिघप्रासतोमरान् ॥ ३० ॥ दो सहस्र भुजा और सहस्र नेत्रवाला महामेघके समान वडवा अग्निके समान क्रोध किये ॥ २९ ॥ सूर्यके समान कांतिमान् अनेक प्रकारके आयुध परिघ प्रास तोमर लेकर ॥ ३० ॥

सर्ग ] .हिन्दीटीकासहित (९९)

सर्ग ] .हिन्दीटीकासहित (९९)

भुशुण्डिः परशून्घंटां लोहं मुद्गरचक्रकम् ।। पाशांश्च विविधा- न्गृह्य बाणान्कर्मारर्जितान् ।। ३१ ।। विपाठान्क्षुरधारांश्च अर्धचन्द्रा- कृतीनपि ।। नानायुधसहस्राणि नानाविधधनूंषिच ।। ३२ ।।

भुशुण्डी परशु घंटे लोहे मुद्गर चक्र पाश तथा बाणोंको ग्रहण कर ॥३१॥ विपाठ क्षुरधार अर्धचन्द्रके आकार सहस्रों आयुध और अनेक प्रकारके धनुष ।। ३२ ।।

प्रगृह्य सहसा प्रायाद्यत्र रामो धनुर्धरः ।। लोचनैः क्रोधसंदीप्तैरु- ल्काभिरिव दीपितः ।। ३३ ।। कोयमित्यब्रवीत्क्रोधादलं प्रोद्वमन्निव ।। सिंहनादं मम पुरे रिपुत्वाद्विससर्ज ह ।। ३४ ।।

लेकर जहां धनुर्धर रामचन्द्र थे वहां आये, क्रोध भरे नेत्र मानो उल्कासे दीपित हुए ।। ३३ ।। अग्निको क्रोधसे वमन करता कहने लगा, यह कौन है ? कि शत्रु होकर मेरे पुरमें सिंहनाद करता है ।। ३४ ।।

ममापि रिपुरस्तीति दुर्यशः समुपस्थितम् ।। इंद्राद्याः ककुभां नाथा भृत्याः प्राणपरीप्सया ।। ३५ ।। पातालविवरे स्वर्गं स्वर्गे पातालमेककम् ।। करोमि सहसैवाहं मानवानां तथैकताम् ।। ३६ ।।

मेरेभी शत्रु हैं, यह मेरा वडा दुर्यश प्राप्त हुआ है, इन्द्रादि लोकपाल तो मेरे दासवत हैं ।। ३५ ।। पातालके छिद्रोंमें स्वर्गको स्वर्गमें पातालको तथा मनुष्योंकोभी एकत्र कर सकता हूं ।। ३६ ।।

मेरुप्रभृतिशैलांश्च चूर्णयाम्यणुसंख्यया ।। देवलोकं नृणां कुर्यान्नृ- लोकं त्रिदिवौकसाम् ।। ३७ ।। उद्धृत्य पृथिवीं छिद्यामनंतं नखरा- ग्रकैः ।। ब्रह्मा मां वारयामास सांत्वयन्प्रियभाषितैः ।। ३८ ।।

मेरुप्रभृति पर्वतोंको मैं चूर्ण कर सकता हूँ देवलोकको मनुष्यलोक और मनुष्य लोकको देवलोक कर सकता हूं ।। ३७ ।। पृथ्वी और शेषजीको नखोंसे उद्धृत कर सकता हूं और करताही था कि, ब्रह्माजीने आकर इस कार्यसे मुझको निवारण किया ।। ३८ ।।

अन्यथा राक्षसमृते नारदं जगतीतले ।। सूर्य्याचन्द्रमसौ भूत्वा तिथिप्रणयनं त्वहम् ।। ३९ ।। बलाहकत्वमिंद्रत्वं पृथ्वीसेकादिकाः क्रियाः ।। कुर्यां यमत्वं वह्नित्वं वरुणत्वं धनेशताम् ।। ४० ।।

( १०० ) अद्भुतरामायण [ अष्टादश-

नहीं तो राक्षसोंके सिवाय पृथ्वीमें और किसीको न रखता, सूर्य चन्द्रमा होकर मैं ही तिथिका प्रणयन करता ॥ ३९ ॥ मेघपन, इन्द्रपन, पृथ्वीको सेकादि क्रिया, यमत्व अग्नित्व वरुणंत्व कुबेरत्व मैं ही कर सकता हूं ॥ ४० ॥

इत्येवं बहुधा गर्जन्नाजगामांतिकं हरेः ॥ सेनाध्यक्षा राक्षसेंद्रा राज्ञा सार्द्धं सामागताः ॥ ४१ ॥ नानाप्रहरणोपेता नानारथपदातिनः ॥ एकैकस्यापि पर्याप्ता जगती नेति मन्महे ॥ ४२ ॥

इस प्रकार अनेक प्रकारसे गर्जना करता हुआ रामके समीप आया, सेनाध्यक्ष राक्षसेन्द्र राजाके साथ आये ॥ ४१ ॥ यह सब नाना प्रकारके प्रहार लिये अनेक रथ पैदलोंसे युक्त एक ऐसे वीर थे कि, पृथ्वीमें वलसे नहीं समा सकते थे ।४२।

केषांचिदपि नामानि भारद्वाज निबोध मे ॥ कोटिशो मनसः पूर्णः शलः पालो हलीमुखः ॥ ४३ ॥ पिच्छलः कौणपश्चक्रः कालवेगः प्रकाशकः ॥ हिरण्यबाहुः शरणः कक्षकः कालदन्तकः ॥ ४४ ॥

हे भरद्वाज ! उनमें कुछेकके नाम मुझसे सुनो । कोटिश, मनस, पूर्ण, शल, पाल, हलीमुख ॥ ४३ ॥ पिच्छल, कौणप, चक्र, कालवेग, प्रकाशक, हिरण्यबाहु, शरण, कक्षक, कालदन्तक ॥ ४४ ॥

पुच्छाण्डको मंडलकः पिंडसेक्ता रभेणकः ॥ उच्छिखः करभो भद्रो विश्वजेता विरोहणः ॥ ४५ ॥ शिली शलकरो मूकः सुकुमारः प्ररेषणः ॥ मुद्गरः शशरोमा च सुरोमा च महाहनुः ॥ ४६ ॥

पुच्छाण्डक, मण्डलक, पिण्डसेक्ता, रभेणक, उच्छिख, करभ, भद्र, विश्वजेता, विरोहण ॥ ४५ ॥ शिली, शलकर, मूक, सुकुमार, प्ररेषण, मुद्गर, शशरोमा, सुरोमा, महामनु ॥ ४६ ॥

पारावतः पारियात्रः पांडुरो हरिणः कृशः ॥ विहंगः शरभो दक्षः प्रमोदः सहपातनः ॥ ४७ ॥ कृकरः कुण्डरो वैणीवेणीस्कंधः कुनारकः ॥ बाहुकः शंखवेगश्च धूर्त्तकः पातपातको ॥ ४८ ॥

पारावत, पारियात्र, पाण्डुर, हरिण, कृश, विहंग, शरभ, दक्षप्रमोद, सहातापन ॥ ४७ ॥ कृकर, कुंडर वैणी, वेणीस्कंद, कुमारक, बाहुक, शंखवेग धूर्त्तक, पात, पातक ॥ ४८ ॥

शंकुकर्णः पिटरकः कुटीरमुखसंचकौ ॥ पूर्णांगदः पूर्णमुखः प्रभाषः शकुलिर्हरिः ॥ ४९ ॥ अमाहिठः कामठकः सुषेणो मानसो व्ययः ॥ भैरवो मुण्डदेवांगः पिशंगश्चोडपालकः ॥ ५० ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१०१)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१०१)

. शंकुकर्ण, पिटरक, कुटीरमुख, सेचक, पूर्णमुख, भाष, शकुलि,हरि ॥ ४९ ॥ अमाहिठ, कामठक, सुषेण, मानस, व्यय; भैरव, मुण्ड, देवांग, चोडपालक ॥ ५० ॥

ऋषभो वेगवान्नाम पिंडारकमहाहनू ॥ रक्तांगः सर्वसारंगः समृद्धः पाटवाकसौ ॥ ५१ ॥ वराहको रावणकः सुचित्रश्चित्रवेगिकः ॥ पराशरस्तरुणिको मणिस्कन्धस्तथारुणिः ॥ ५२ ॥

ऋषभ, वेगवान्, पिण्डारक, महाहनु, रक्तांग, सर्वसारङ्ग, समृद्ध, पाट, वासक ॥ ५१ ॥ वराहक, रावणक, सुत्रिच, चित्रवेगिक, पराशर, तरुणिक, मणिस्कंध, अरुणि ॥ ५२ ॥

सेनाध्यक्षा महाब्रह्मन्कीर्तिताः कीर्तिवर्धनाः ॥ प्राधान्येन बहुत्वात्तु न सर्वे परिकीर्तिताः ॥ ५३ ॥ न शक्याः परिसंख्यातुं ये युद्धाय समागताः॥नीलरक्ता सिता घोरा महाकाया महाबलाः ॥ ५४ ॥

हे ब्रह्मन् ! यह महाकीर्तिवर्द्धन सेनाध्यक्ष कहे हैं प्रधानभी बहुत हैं, विस्तारके कारण सबका वर्णन नहीं किया ॥ ५३ ॥ युद्ध करनेको आये थे उनकी संख्या नहीं हो सकती, नील रक्त सित घोर महाकाय महाबली ॥ ५४ ॥

सप्तशीर्षाद्विशीर्षाश्च पञ्चशीर्षास्तथापरे । कालानलमहाघोरा हुताशसमविग्रहाः ॥ ५५ ॥ महाकाया महावेगाः शैलशृंगसमुच्छ्रयाः । योजनायामविस्तीर्णाद्वियोजनसमुच्छ्रयाः ॥ ५६ ॥

सात शिरके दो शिरके पांचशिरके कालानलके समान महाघोर अग्निके समान शरीरवाले ॥ ५५ ॥ महाकाय महावेगवान् शैलशृंगके समान ऊंचे एक योजनके चौड़े दो योजनके ऊंचे ॥ ५६ ॥

कामरूपाः कामबला दीप्तानलसमत्विषः । अन्ये च बहवः शूराः शूलपट्टिशधारिणः ॥५७॥ दिव्यप्रहरणोपेता नानावेषविभूषिताः ॥ शृणु नामानि चान्येषां येऽन्ये रावणसैनिकाः ॥ ५८ ॥

कामरूपी कामबली दीप्त अनलके समान कान्तिमान् और भी बहुतसे शूर शूल पट्टिश लिये ॥ ५७ ॥ दिव्य प्रहारसे नाना युक्त वेषसे विभूषित थे, रावणके सेनापतियोंके नाम सुनो ॥ ५८ ॥

शंकुकर्णोनिकुम्भश्च पद्मः कुमुद एव च ॥ अनन्तो द्वादशभुजस्तथा कृष्णोपकृष्णकौ ॥ ५९ ॥ घ्राणश्रवाः कपिस्कंधः कांचनाक्षो जलन्धमः ॥ अक्षसंतर्दनो ब्रह्मन्कुनदीकस्तमोऽभ्रकृत् ॥ ६० ॥

(१०२) अद्भुतरामायण [ अष्टादश

  • शंकुकर्ण, निकुम्भ, पद्म, मुकुद, अनन्त, द्वादशभुजा, कृष्ण उपकृष्ण ।। ५९ ।। घ्राणश्रवा, कपिस्कंध, कांचनाक्ष, जलन्धम, अक्षसंतर्दन ,कुनदीक, तमोभ्रकृत् ।। ६० ।।

एकाक्षो द्वादशाक्षश्च तथैवैकजराभिधः ।। सहस्रबाहुर्विकटो व्याघ्राख्य क्षितिकंपनः ।। ६१ ।। पुण्यनामानुनामा च सुवक्त्रः प्रियदर्शनः ।। परिश्रितः कोकनदः प्रियमाल्यानुलेपनः ।। ६२ ।।

एकाक्ष, द्वादशाक्ष, एकजरा, सहस्रबाहु, विकट; व्याघ्र क्षितिकंपन ।। ६१ ।। पुण्यनाम, अनुनाम, सुवक्त्र, परिश्रित, कोकनद, प्रियमाल्यानुलेपन ।। ६२ ।।

अजोदरो गजशिराः स्कंधाक्षः शतलोचनः ।। ज्वालाजिह्वः करालश्च सितकेशो जटी हरिः ।। ६३ ।। चतुर्दंष्ट्रोष्ठजिह्वश्च मेघनादः पृथुश्रवाः ।। विकृताक्षो धनुर्वक्त्रो जाठरो मारुताशनः ।। ६४ ।।

अजोदर, गजशिर, स्कन्धाक्ष, शतलोचन, ज्वालाजिह्व, कराल, सितकेश, जटी, हरि ।। ६३ ।। चतुर्दंष्ट्र, ओष्ठजिह्व, मेघनाद, पृथुश्रव, विकृताक्ष, धनुर्वक्त्रः जाठर मारुताशन ।। ६४ ।।

उदाराक्षो रथाक्षश्च वज्रनाभो वसुप्रभः ।। समुद्रवेगो विपेन्द्रः शैलकम्पी तथैव च ।। ६५ ।। वृषमेषप्रवाहश्च तथा नंदोपनंदकौ ।। धूम्रश्वेतः कलिंगश्च सिद्धार्थो वरदस्तथा ।। ६६ ।।

उदाराक्ष; रथाक्ष, वज्रनाभ, वसुप्रभ, समुद्रवेग, शैलकंपी ।। ६५ ।। वृषमेषप्रवाह, नन्द, उपनन्द, धूम्रश्वेत, कलिंग, सिद्धार्थ, वरद ।। ६६ ।।

प्रियकश्चैकनन्दश्च बहुवीर्यः प्रतापवान् ।। आनंदश्च प्रमोदश्च स्वस्तिको ध्रुवकस्तथा ।। ६७ ।। क्षेमबाहुः सुबाहुश्च सिद्धपात्रश्च सुव्रतः ।। गोव्रजः कनकापीडो महापारिषदेश्वरः ।। ६८ ।।

प्रियक, एकनन्द, बहुवीर्य, प्रतापवान् आनन्द, प्रमोद; स्वस्तिक ध्रुव ।। ६७ ।। क्षेमबाहु, सिद्धपात्र, सुव्रत, गोव्रज, कनकापीड, महापारिषदेश्वर ६८

गायनो दमनश्चैवः बाणः खङ्गश्च वीर्यवान् ।। वैताली गतिताली च तथा कथकवातिकौ ।। ६९ ।। हंसजः पंकदिग्धांगः समुद्रोन्मादनश्च ह ।। रणोत्कटः प्रहासश्च वेतसिद्धश्च नन्दकः ।। ७० ।।

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१०३)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१०३)

गायन, दमन, वाण, वीर्यवान्, खड्ग वैताली, गतिताली, कथक वोतिक ॥ ६९ ॥ हंसज, पंकदिग्धांग, समुद्र, उन्मादन, रणोत्कट, प्रहास, वेतसिद्ध नन्दक ॥ ७० ॥

एते पुरा रावणसैन्यपाला नानायुधप्राहरणा रणेषु ॥ हंसेषु मेषेषु वृषेषु वीरा रामं प्रतस्थुः कृतसिंहनादाः ॥ ७१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रा. वा. अद्भुतोत्तरकाण्डे रावण सैन्यनिर्याणं नामाष्टादशः सर्गः ॥ १८ ॥

यह रावणके सेनापति युद्धमें अनेक प्रकारके प्रहार करनेवाले हंस मेष वृषके ऊपर चढे सिंहनाद करते रामसे युद्ध करनेको चले ॥ ७१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रा. वा. आ. अ. भाषाटीकायां रावणसैन्यनिर्माणं नामाष्टादश सर्गः ॥ १८ ॥


एकोनविंश सर्ग

सहस्रमुखी रावणके पुत्रोंका युद्धको चलना

रावणस्यौरसाः पुत्रास्सह राक्षसपुंगवैः ॥ नानाप्रहरणोपेता दुद्रुवू राघवं रणे ॥ १ ॥ नामान्येषां प्रवक्ष्यामि भरद्वाज शृणुष्व मे ॥
कालकण्ठः प्रभाषश्च तथा कुम्भाण्डको परः ॥ २ ॥

रावणके औरस पुत्र महाराक्षसोंके साथमें अनेक प्रकारके प्रहार लेकर धावमान हुए ॥ १ ॥ हे भरद्वाज ! उनके नाम मैं कहता हूं सो तू मुझसे सुन; कालकण्ठ, प्रभाष, कुम्भांडक ॥ २ ॥

कालकक्ष शितश्चैव भूतलोन्मथनस्तथा ॥ यज्ञबाहुः प्रबाहुश्च देवयाजी च सोमदः ॥ ३ ॥ मज्जालश्च महातेजाः क्रथः क्राथोवसुव्रतः ॥ तुहरश्च तुहारश्च चित्रदेवश्च वीर्यवान् ॥ ४ ॥

कालकक्ष, शित, भूतल, उन्मथन, यज्ञबाहु, प्रवाहू देवयाजी, सोमप ॥ ३ ॥ महातेजस्वी, मज्जाल, क्रथ, क्राथ, वसुव्रत, तुहर, तुहार, वीर्यवान्, चित्रदेव ॥ ४ ॥


१ आरूढा इति शेषः ।

(१०४) अद्भुतरामायण [ एकोनविंश-

मधुरः सुप्रसादश्च किरीटश्च महाबलः॥ वसनो मधुवर्णश्च कलशोदर एव च ॥ ५ ॥ धर्मदो मन्मथकरः सूचीवक्त्रश्च वीर्यवान् ॥ श्वेतवक्त्रः सुवक्त्रश्च चारुवक्त्रश्च पाण्डुरः ॥ ६ ॥

मधुर, सुप्रसाद, महाबली, किरीट, वसन, मधुवर्ण, कलशोदर ॥ ५ ॥ धर्मद, मन्मथकर, वीर्यवान्, सूचिवक्त्र श्वेतवक्त्र, सुवक्त्र, चारुवक्त्र, पाण्डुर ॥ ६ ॥

दण्डबाहुः सुबाहुश्च रजः कोकिलकस्तथा ॥ अचलः काल- काक्षश्च बालेशो बालभक्षकः ॥ ७ ॥ संचानकः कोकनदो गृध्रपत्रश्च जम्बुकः ॥ लोहाजवक्त्रो जवनः कुम्भवक्त्रश्च कुम्भकः ॥ ८ ॥

दण्डबाहु, सुबाहु, कोकिलक, अचल, कालाकाक्ष, बालेश, बालभक्षक ॥ ७ ॥ सञ्चानक, कोकनद, गृध्रपत्र, जम्बूक, लोहाजवक्त्र, जवन, कुम्भ- वक्त्र ॥ ८ ॥

मुंडग्रीवश्च कृष्णौजा हंसवक्त्रश्च कुंर्जरः ॥ एते रावणपुत्राश्च महावीरपराक्रमाः ॥ ९ ॥ बाहुशब्दैः सिंहनादैः पूरयंतो दिशो दश ॥ एषां सैन्यसहस्राणां सहस्राण्यर्बुदानि च ॥ १० ॥

मुंडग्रीव, कृष्णौजा, हंसवक्त्र, कुञ्जर, यह रावणके पुत्र महाबली और पराक्रमी थे ॥ ९ ॥ बाहुशब्द और सिंहनादसे दशों दिशाओंको पूर्ण करते हुए, इनकी सेनाके सहस्रों और अर्बों ॥ १० ॥

नानाकृतिवयोरूपा विविधायुधपाणयः ॥ कूर्मकुक्कुटवक्त्राश्च सर्पजम्भकवक्त्रकाः ॥ ११ ॥ गोमायुमुखवक्त्राश्च शशोलूकमुखा- स्तथा ॥ खरोष्ट्रवदनाश्चैव वराहवदनास्तथा ॥ १२ ॥

अनेक प्रकारकी आकृति वय रूपवाले अनेक आयुध हाथमें लिये, कूर्म कुक्कुटमुखवाले सर्प जम्भकसे मुखवाले ॥ ११ ॥ शृगालमुखवाले शशक और खरगोशके मुखवाले, खर उष्ट्र तथा वराहके मुखवाले ॥ १२ ॥

मनुष्यमेषवक्त्राश्च शृगालवदनास्तथा ॥ मार्जारशशवक्त्राश्च दीर्घवक्त्राश्च केचन ॥ १३ ॥ नकुलोलूकवक्त्रश्च काकवक्त्रास्तथा- परे ॥ आखुबभ्रुकवक्त्राश्च मयूरवदनातस्था ॥ १४ ॥

मनुष्य मेष शृगाल मार्जार शशाके मुखवाले, कोई दीर्घमुख ॥ १३ ॥ नकुल, उलूकमुख, काक, आखु, बभ्रुमुख, मोरमुख ॥ १४ ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१०५)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१०५)

मत्स्यमेषाननाश्चैव अजाविमहिषाननाः ।। ऋक्षशार्दूलवक्त्राश्च द्वीपिंसिहाननास्तथा ।। १५ ।। भीमा गजाननाश्चैव तथा नक्रमुखा- स्तथा ।। गोखरोष्ट्रमुखाश्चान्ये वृषदंशमुखास्तथा ।। १६ ।। मत्स्य मेष अजा मुखवाले ऋक्ष, शार्दूल द्वीप, और सिंहमुखवाले ।। १५ ।। भयंकर हाथीकेसे मुखवाले, नाकेके समान मुखवाले, गो, खर उष्ट्र वृष दंष्ट्रमानस के मुखवाले ।। १६ ।।

महाजठरपापांगाः स्तवकाक्षाश्च दुर्मुखाः ।। पारावतमुखाश्चान्ये तथा वृषमुखाः परे ।। १७ ।। कोकिलाभाननाश्चान्ये श्येनतित्तिरिका- ननाः ।। कृकलासमुखाश्चैव विरजोऽम्बरधारिणः ।। १८ ।। महाजठरेपाद अंगवाले, स्तवकाक्ष, दुर्मुख, पारावतमुख, वृषमुख ।। १७ ।। कोकिलाम्रख, तित्तिरि मुख, कृकलासमुख, श्वेतवस्त्र धारण किये ।। १८ ।।

व्यासवक्त्राः शुकमुखाश्चंडवक्त्राः शुभाननाः ।। आशीविषाश्चीर- धरा गोनासावरणास्तथा ।। १९ ।। स्थूलोदराः कृशांगाश्च स्थूलां- गाश्च कृशोदराः ।। ह्रस्वग्रीवा महाकर्णा नानाव्यालविभूषणाः ।।२०। व्यालमुख शुकमुख, चण्डमुख, शुभानन, आशीविष, चीरबारी, गोनासाव- रण ।। १९ ।। स्थूलोदर, कृशांग, कृशोदर, ह्रस्वग्रीव, महाकर्ण अनेक व्यालके भूषणवाले ।। २० ।।

गजेंद्रचर्मवसनास्तथा कृष्णाजिनांबराः ।। स्कंधेमुखा द्विजश्रेष्ठ तथा ह्युदरतोमुखाः ।। २१ ।। पृष्ठेमुखा हनुमुखास्तथा जंघामुखा- स्तथा ।। पार्श्वाननाश्च बहवो नानादेशमुखास्तथा ।। २२ ।। गजेन्द्रके चर्मका वस्त्र पहरे, काले वस्त्रधारे, स्कंधमें मुखवाले, उदरमें मुखवाले ।। २१ ।। पीठमें मुखवाले हनुमुख, जंघामुख, पार्श्वानन नानादेशमें मुखवाले ।। २२ ।।

तथा कीटपतंगानां सदृशास्या महाबलाः ।। नानाव्यालमुखा- श्चान्ये बहुबाहुशिरोधराः ।। २३ ।। नानावक्षोभुजाः केचिद्भुजंग- वदनाः परे ।। खड्गमुखा वृकमुखा अपरे गरुडाननाः ।। २४ ।। कीट पतंगोंके समान मुखवाले, महाबली, सर्वमुखवाले, बहुत बाहु और शिरवाले ।। २३ ।। अनेक छाती भुजावाले, कोई भुजंगमुख, खड्ग, वृक गरुडके समान मुखवाले ।। २४ ।।

(१०६) अद्भुतरामायण [ एकोनविंश -

चोलसंवृतगात्राश्च नानाफलकवाससः ॥ नानावेषधराश्चान्ये नानामाल्यानुलेपनाः ॥ २५ ॥ नानावस्त्रधराश्चान्ये चर्मवासस एव च ॥ उष्णीषिणो मुकुटिनः कंबुग्रीवाः सुवर्चसः ॥ २६ ॥

कुरतोंसे शरीर ढके फलक वस्त्रवाले, नानावेषधारी नानामालाओंका अनुलेपन लगाये, नाना वेषधारी अनेक माला और अनुलेपन लगाये ॥ २५ ॥ नानावस्त्र और चर्म धारण किये पगडी मुकुटवाले शंखकेसी गर्दन सुन्दर कान्तिवाले ॥ २६ ॥

किरीटिनः पंचशिखास्तथा कठिनमूर्द्धजाः ॥ त्रिशिखा द्विशिखाश्चैव तथा सप्तशिखा अपि ॥ २७ ॥ शिखण्डिनोऽमुकुटिनो मुंडाश्च जटिलास्तथा ॥ चित्रमालाधराः केचित्केचिद्रोमाननास्तथा ॥ २८ ॥

किरीटधारी, पंचशिख, कठिन केशवाले, तीन शिखा और दो शिखावाले सात शिखावाले ॥ २७ ॥ शिखण्डी, मुकुटरहित, मुण्ड जटिल, चित्रमालाधारी कोई रोमानन ॥ २८ ॥

विग्र*हैकवशा नित्यमजेयाः सुरसप्तमैः॥ कृष्णा निर्मंसवक्त्राश्च दीर्घपृष्ठा *निरूदराः ॥ २९ ॥ दीर्घपृष्ठा स्थूलपृष्ठाः प्रलम्बोदरमेहनाः ॥ महाभुजा ह्रस्वभुजा ह्रस्वगात्राश्च वामनाः ॥ ३० ॥

युद्धमें देवताओंको अजय, काले निर्मंस मुख, दीर्घपृष्ठ, और उदरवाले ॥ २९ ॥ दीर्घपृष्ठ, स्थूलपृष्ठ, प्रलम्ब उदर और मेहनवाले, महाभुज, ह्रस्वभुज, ह्रस्वगात्र, वामन (बौने) ॥ ३० ॥

कुब्जाश्च ह्रस्वजंघाश्च हस्तिकर्णशिरोधराः ॥ हस्तिनासाः कूर्मनासा वृकनासास्तथापरे ॥ ३१ ॥ वारणेन्द्रनिभाश्चान्ये दीप्तिमंतः स्वलंकृताः ॥ पिंगाक्षाः शंकुकर्णाश्च वक्रनासास्तथापरे । ३२ । पृथुदंष्ट्रा महादंष्ट्राः स्थूलोष्ठा हरिमूर्द्धजाः ॥ नानापादौष्ठदंष्ट्राश्च नानाहस्तशिरोधराः ॥ ३३ ॥ नानाचर्मभिराच्छन्ना नानावासाश्च सुव्रत ॥ हृष्टाः परिपतन्ति स्म महापरिघ बाहवः ॥ ३४ ॥

कुबडे, ह्रस्वजंघ, हाथीकेसे कान और शिरवाले, हस्तिनास, कूर्मनास वृकनास, ॥ ३१ ॥ कोई वारणेन्द्रके समान, दीप्तिमान्, अलंकृत, पिंगाक्ष, शंकुकर्ण, वक्रनास ॥ ३२ ॥ पृथुदंष्ट्र, महादंष्ट्र, स्थूलोष्ठ, हरिकेश, नानाचरण


* विग्रहो युद्धम् * दीर्घत्वमार्षम् ।

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१०७)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१०७)

ओष्ठ दाढोंवाले, अनेक हाथ और शिरवाले ॥ ३३ ॥ अनेक चर्मोंसे आच्छा- दित; अनेक प्रकारके वस्त्रधारे, महापस्घिके समान भुजवाले, प्रसन्न हो युद्ध करनेको चले ॥ ३४ ॥

दीर्घग्रीवा दीर्घनखा दीर्घपादशिरोभुजाः ॥ पिंगाक्षा नीलकण्ठाश्च स्वर्णकर्णाश्च सुव्रत ॥ ३५ ॥ वृकोदरनिभाः केचित्केचिदंजनसं निभाः ॥ श्वेताक्षा लोहितग्रीवाः पिंगाक्षाश्चतथापरे ॥ ३६ ॥

दीर्घगर्दन, दीर्धनख, दीर्घचरण, दीर्घ शिर और भुजवाले, पिंगाक्ष, नीलकंठ, स्वर्णकर्णवाले ॥ ३५ ॥ कोई वृकोदरके समान, कोई अञ्जनपर्वतके समान, श्वेताक्ष, लोहितग्रीव, पिंगाक्ष ॥ ३६ ॥

कल्माषबाहवो विप्र चित्रवर्णाश्च केचन ॥ चामरापीडकनिभाः श्वेत लोहितकान्तयः ॥ ३७ ॥ नानावर्णाः सुवर्णाश्च मयूरसदृश- प्रभाः ॥ पाशोद्यतकराः केचिद्व्यादितास्याः खराननाः ॥ ३८ ॥

हे विप्र ! कोई कल्माष (काली) भुजावाले, कोई चित्रवर्ण, चमरकी पीडाके समान, श्वेत और लाल कांतिवाले ॥ ३७ ॥ अनेक वर्ण और सुवर्ण मोरके समान कांतिवाले, कोई पाश हाथमें उठाये, कोई मुखफैलाये खरके समान मुखवाले ॥ ३८ ॥

शतघ्नीचक्रहस्ताश्च तथा मुसलपांणयः ॥ असिमुद्गरहस्ताश्च दंडहस्ताश्च केचन ॥ ३९ ॥ गदाभुशुण्डिहस्ताश्च तथा तोमरपा- णयः ॥ आयुधैर्विविधैर्घोरैर्महात्मानो महौजसः ॥ ४० ॥

शतघ्नी, चक्र हाथमें लिये, मुसलहाथमें लिये; कोई असि मुद्गर हाथमें लिये, कोई दंड हाथमें लिये ॥ ३९ ॥ गदा भुशुण्डी हाथमें लिये, तोमरे हाथमें लिये तथा महात्मा लोग अनेक घोर आयुध हाथमें लिये ॥ ४० ॥

महाबला महावेगा असंख्याता विनिर्ययुः ॥ घंटाजालपिनद्धांगा ननृतुस्ते रणाजिरे ॥ ४१ ॥ कोटिशो विक्रतरूक्षभाषिणो यातुधान- गणसैन्यपालकाः॥दुद्रुवू रघुकुलावतं सकं गृह्णधावनपोथ वादिन ४२॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदि काव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे रावणपुत्रनिर्याण नामैकोनविंश सर्गः ॥ १९ ॥

महाबली महावेगवान् असंख्यों चले और घंटाजालसे नद्ध हुए रणस्थलमें नृत्य करने लगे ॥ ४१ ॥ असंख्य विकृत और रूखे बोलनेवाले, राक्षसोंकी

(१०८) अद्भुतरामायण [ विशंति-

सेना पालनेवाले रामचन्द्रके ऊपर धावमान हुए; और पकडो २ ऐसे कठोर वचन बोलने लगे ॥ ४२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये अद्भुतोत्तरकाण्डे भाषाटीकायां रावण- पुत्रनिर्याणं नाम एकोनविंशः सर्गः ॥ १९ ॥

विशंति सर्ग

संकुलयुद्धवर्णन

धनूंषि च विधुन्वानस्ततो वैश्रवणानुजः ।। कोऽयं किमर्थमायातः इति चिन्तापरोऽभवत् ।। १ ।। ततो गगनसंभूता वाणी समुपद्यत ।। भो रावण महावीर्य रामोऽयं समुपागतः ।। २ ।।

तब वह सहस्त्रमुख रावण धनुष्यको कम्पायमान करता हुआ यह कौन कहाँसे आया है यह चिन्ता करने लगा ॥ १ ॥ तब उस समय आकाशसे वाणी हुई हे महावीर्यवान् रावण ! यह रामचन्द्र आये हैं ॥ २ ॥

राघवोऽयमयोध्याया राजा धर्मस्वरूपधृक् ।। लंकायां निहतो येन दाराकर्शो तवानुजः ।। ३ ।। त्वद्वधार्थमिहायातो विभीषण वसुप्रदः ।। भ्रातृभिर्वानरैर्ऋक्षै राक्षसैर्मानुषैर्युतः ।। ४ ।।

यह धर्मस्वरूपधारी राम अयोध्याके राजा हैं, यह धर्मका स्वरूप हैं जिन्होंने लंकामें रावणका वध किया है ॥ ३ ॥ यह विभीषणके राज्य देनेवाले हैं। भाई, वानर, ऋक्ष, राक्षस, मनुष्योंको साथ आये हैं ॥ ४ ॥

श्रुत्वा ह्यमानुषं वाक्यं रावणो लोकरावणः ।। क्रोधमाहारयामास द्विगुणं मुनिपुंगव ।। ५ ।। हन्यतां वध्यतामेष मानुषो रिपुसंज्ञितः ।। मम विश्वजितः साक्षाद्रणाय समुपस्थितः ।। ६ ।।

लोक रावण रावण यह अमानुषी वचन सुनकर दूना क्रोध करता हुआ बोला ॥ ५ ॥ इस मनुष्यसंज्ञक शत्रुको मारो, वध कर डालो, यह मुझ विश्वके जीतनेवालेसे युद्ध करनेको स्थित हुआ है ॥ ६ ॥

इत्युक्त्वा बाणजालानि चक्रपर्वततोमरान् ।। चिक्षेप सहसा रक्षः पुष्पकोपरि सुव्रतः ।। ७ ।। राक्षसी सा चमूर्घोरा वानरानृक्ष- 'मानुषान् ।। चखादकांश्चिदपरान्पोथयामासदर्पितान् ।। ८ ।।