भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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सर्ग ] .हिन्दीटीकासहित (९९)

भुशुण्डिः परशून्घंटां लोहं मुद्गरचक्रकम् ।। पाशांश्च विविधा- न्गृह्य बाणान्कर्मारर्जितान् ।। ३१ ।। विपाठान्क्षुरधारांश्च अर्धचन्द्रा- कृतीनपि ।। नानायुधसहस्राणि नानाविधधनूंषिच ।। ३२ ।।

भुशुण्डी परशु घंटे लोहे मुद्गर चक्र पाश तथा बाणोंको ग्रहण कर ॥३१॥ विपाठ क्षुरधार अर्धचन्द्रके आकार सहस्रों आयुध और अनेक प्रकारके धनुष ।। ३२ ।।

प्रगृह्य सहसा प्रायाद्यत्र रामो धनुर्धरः ।। लोचनैः क्रोधसंदीप्तैरु- ल्काभिरिव दीपितः ।। ३३ ।। कोयमित्यब्रवीत्क्रोधादलं प्रोद्वमन्निव ।। सिंहनादं मम पुरे रिपुत्वाद्विससर्ज ह ।। ३४ ।।

लेकर जहां धनुर्धर रामचन्द्र थे वहां आये, क्रोध भरे नेत्र मानो उल्कासे दीपित हुए ।। ३३ ।। अग्निको क्रोधसे वमन करता कहने लगा, यह कौन है ? कि शत्रु होकर मेरे पुरमें सिंहनाद करता है ।। ३४ ।।

ममापि रिपुरस्तीति दुर्यशः समुपस्थितम् ।। इंद्राद्याः ककुभां नाथा भृत्याः प्राणपरीप्सया ।। ३५ ।। पातालविवरे स्वर्गं स्वर्गे पातालमेककम् ।। करोमि सहसैवाहं मानवानां तथैकताम् ।। ३६ ।।

मेरेभी शत्रु हैं, यह मेरा वडा दुर्यश प्राप्त हुआ है, इन्द्रादि लोकपाल तो मेरे दासवत हैं ।। ३५ ।। पातालके छिद्रोंमें स्वर्गको स्वर्गमें पातालको तथा मनुष्योंकोभी एकत्र कर सकता हूं ।। ३६ ।।

मेरुप्रभृतिशैलांश्च चूर्णयाम्यणुसंख्यया ।। देवलोकं नृणां कुर्यान्नृ- लोकं त्रिदिवौकसाम् ।। ३७ ।। उद्धृत्य पृथिवीं छिद्यामनंतं नखरा- ग्रकैः ।। ब्रह्मा मां वारयामास सांत्वयन्प्रियभाषितैः ।। ३८ ।।

मेरुप्रभृति पर्वतोंको मैं चूर्ण कर सकता हूँ देवलोकको मनुष्यलोक और मनुष्य लोकको देवलोक कर सकता हूं ।। ३७ ।। पृथ्वी और शेषजीको नखोंसे उद्धृत कर सकता हूं और करताही था कि, ब्रह्माजीने आकर इस कार्यसे मुझको निवारण किया ।। ३८ ।।

अन्यथा राक्षसमृते नारदं जगतीतले ।। सूर्य्याचन्द्रमसौ भूत्वा तिथिप्रणयनं त्वहम् ।। ३९ ।। बलाहकत्वमिंद्रत्वं पृथ्वीसेकादिकाः क्रियाः ।। कुर्यां यमत्वं वह्नित्वं वरुणत्वं धनेशताम् ।। ४० ।।