भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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(९८) अद्भुतरामायण [अष्टादश-

काशपथमाश्रितम् ॥ २१ ॥ मनोमारुतवेगेन क्षणेन गरुडो यथा ॥ जगाम पुष्करद्वीपं यत्रास्ते मानसोत्तरः ॥ २२ ॥ वे शत्रुके जीतनेवाले थे उनको अपने वीरताके वचनोंसे उत्साह करते हुए तब रामचन्द्रकी आज्ञासे पुष्कविमान आकाशमें प्राप्त हुआ ॥ २१ ॥ मन और पवन तथा गरुडके समान वेगकर मानसोत्तर पुष्करद्वीपमें क्षणमात्रमें प्राप्त हुआ ॥ २२ ॥

मानसोत्तरमासाद्य विस्मितास्ते महाबलाः ॥ किं चित्रं किं चित्रमिति प्रोचुराश्चर्यलक्षणाः ॥ २३ ॥ राघवो भ्रातृभिः सार्द्धं सह वानरपुंगवैः ॥ सिंहनादं ननादोच्चैर्धनुश्चापि व्यकर्षयत् ॥ २४ ॥ मानसके उत्तर भागमें प्राप्त होकर वे महावली विस्मित हुए कैसा विचित्र है ? इस प्रकार वे वारंवार कहने लगे ॥ २३ ॥ रामचन्द्रने वानर और भ्राताओंके साथ सिंहनाद करके धनुषको खैंचा ॥ २४ ॥

स शब्दस्तुमुलो भूत्वा पृथिवीं चांतरिक्षकम् ॥ पातालविवरांश्चैव पूरयामास सर्वतः ॥ २५ ॥ रावणः सहसोत्तस्थौ किमेतदिति संव- दन् ॥ तत्राथ राक्षसाः क्रुद्धाः सर्व एव विनिर्ययुः ॥ २६ ॥ वह तुमुलशब्द पृथ्वी अन्तरिक्षाऔर सब ओरसे पातालके विवरोंको पूर्ण करता हुआ ॥ २५ ॥ तब रावण यह क्या है ऐसा कहकर एक साथ उठ बैठा और वहांके सब राक्षस क्रोध कर एक साथ वहां निकले ॥ २६ ॥

अहो कुतः स्विच्छब्दोऽयं साधु सर्वैर्निरूप्यताम् ॥ इत्याभाष्य राक्षसेंद्रो राक्षसैर्द्रर्महाबलैः ॥ २७ ॥ नगरान्निर्ययौ शीघ्रं संदष्टोष्ठ- पुटो बली ॥ द्वादशादित्यसंकाशः सहस्रवदनो महान् ॥ २८ ॥ और बोले जान्ना चाहिये कि, यह शब्द कहांसे होता है, इस प्रकार वह राक्षसेन्द्र महावली राक्षसोंके साथ शीघ्र ॥ २७ ॥ होठ चबाता हुआ निकला वह बारह सूर्यके समान सहस्र मुखका महाबली था ॥ २८ ॥

द्विसहस्रभुजोद्रिक्तो द्विसहस्रविलोचनः ॥ महामेघसमध्वानो वडवाग्निसमः क्रुधा ॥ २९ ॥ शतयोजनविस्तीर्णे रथे सूर्यसमत्विषि । नानायुधानि संगृह्य परिघप्रासतोमरान् ॥ ३० ॥ दो सहस्र भुजा और सहस्र नेत्रवाला महामेघके समान वडवा अग्निके समान क्रोध किये ॥ २९ ॥ सूर्यके समान कांतिमान् अनेक प्रकारके आयुध परिघ प्रास तोमर लेकर ॥ ३० ॥