भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

पृष्ठ 96, कुल 173 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 96

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (८९)

जगदेतन्महाबाहो पुनर्जातमिवाभवत् ॥ न रावणादभ्यधिको दुष्टो लोकभयंकरः ॥ ११ ॥ दशास्यैर्दशदिक्कार्यमाज्ञापयति राक्षसः ॥ स दशास्यो हतो राम दिष्ट्या च जगदुद्धृतम् ॥ १२ ॥ मानो यह जगत् फिर उत्पन्न हुआ है, रावणसे अधिक लोगोंको भयदायक कोई दुष्ट नहीं था ॥ ११ ॥ इस राक्षसकी दशोंदिशाओंमें आज्ञा प्रचलित होती थी, भाग्यसे उसको मारकर आपने जगत्का उद्धार किया ॥ १२ ॥

भगवानसि भूपाल ब्रह्मणा प्रार्थितः पुरा ॥ पुंडरीकविशालाक्षः श्याम आजानुबाहुकः ॥ १३ ॥ अयोध्यायां प्रादुरभूदिक्ष्वाकुकुल नंदनः ॥ त्वद्दर्शनान्महाबाहो निवृत्ताःस्मो वयं प्रभो ॥ १४ ॥ हे राम ! आप प्रथम ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेसे भूपालरूप धारण कर आये हो, आपके कमलकेसे बडे नेत्र हैं, श्यामशरीर जानुपर्यन्त लम्बी भुजा हैं। १३ । इक्ष्वाकुकुलके आनन्द देनेको आप आयोध्यामें प्रगट हुए हो, हे प्रभो ! आपके दर्शनसेही हम आनन्दित हो गये ॥ १४ ॥

तपश्चरामः सहितास्त्वत्प्रसादाद्वनेवने ॥ किंतु सीता महादेवी प्राप दुखं महत्प्रभो ॥ १५ ॥ तदेव स्मर्यमाणं सच्चित्तमुद्वेजयेद्धि नः ॥ एवमुक्ते तु मुनिभिः सानुक्रोशं पुनः पुनः ॥ १६ ॥ आपके प्रसादसे वन वनमें निर्भयतप करते हैं, हे प्रभो ! परन्तु सीतादेवीने महादुःख पाया है ॥ १५ ॥ यही स्मरण करनेसे हमारा चित्त उद्वेजित है, जब दयासे वारम्वार मुनिजनोंने यह वचन कहे ॥ १६ ॥

जहास मधुरं साध्वी सीता जनक नंदिनी ॥ उवाच सस्मितं देवी तान्मुनीन्मितभाषिणी ॥ १७ ॥ मुनयो यद्यदुक्तं हि रावणस्य वधं प्रति ॥ परिहास इवाभाति प्रशंसनमिदं द्विजाः ॥ १८ ॥ तब जनकनंदिनी साध्वी सीता हँस पडी और हँसती हुई देवी उन मुनियोंसे कहने लगी ॥ १७ ॥ जो कुछ मुनियोंने रावणके वधके प्रति कहा है हे ब्राह्मणो ! यह प्रशंसा परिहास कहलाती है ॥ १८ ॥

रावणो हि दुराचारः सत्यमेतन्न संशयः ॥ दशभिर्वदनैर्वीरो जगदुद्वेजको हि सः ॥ १९ ॥ दशास्यस्य वधो विप्रा न प्रशंसामिहा- र्हति ॥ एतच्छ्रुत्वा तु मुनयो विस्मयं परमं गताः ॥ २० ॥

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित) · पृष्ठ 96, कुल 173 में से · BharatKosha