अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
पृष्ठ 95, कुल 173 में से
संदर्भ में पढ़ें(८८) अद्भुतरामायण [सप्तदश-
यवक्रीत, रैभ्य, च्यवन, मुनिश्रेष्ठ कण्व जो पूर्वदिशाके रहनेवाले ऋषि थे वे आये ॥ २ ॥
स्वस्त्यात्रेयश्च नमुचोऽरिमुचोगस्त्य एव च ।। आजग्मुर्मुनयस्तत्र ये श्रिता दक्षिणां दिशम् ॥ ३ ॥ उपगुः कामठो धूम्रो रौद्राश्वो मुनिपुंगवः ।। आजग्मुर्मुनयस्तत्र ये प्रतीचीं समाश्रिताः ॥ ४ ॥
स्वस्तिआत्रेय, नमुच, अरिमुच, अगस्त्य यह दक्षिणदिशाके रहनेवाले मुनि आकर प्राप्त हुए ॥ ३ ॥ उपगु, कामठ, धूम्र, रौद्राश्व, मुनिश्रेष्ठ यह पश्चिम दिशाके रहनेवाले महात्मा ऋषि आकर प्राप्त हुए ॥ ४ ॥
शिष्योपशिष्यसहिता वसिष्ठप्रमुखर्षयः ।। आजग्मुर्हि महात्मानं उत्तरां दिशमाश्रिताः ॥ ५ ॥ प्राप्य ते तु महात्मानो राघवस्य निवेशनम् ।। गृहीत्वा फलमूलानि हुताशसमविग्रहाः ॥ ६ ॥
शिष्य उपशिष्य आदिके सहित वसिष्ठ आदि ऋषि उत्तरादिशाके रहनेवाले आकर प्राप्त हुए ॥ ५ ॥ यह सब महात्मा रामचन्द्रके स्थानमें आकर प्राप्त हुए फल मूल ग्रहण किये अग्निके समान शरीरवाले ॥ ६ ॥
राघवं प्रतिनंद्याथ विविशुः परमासने ।। राघवश्च महातेजाः सीतया सह सुव्रत ॥ ७ ॥ भ्रातृभिर्मंत्रिभिः सार्द्धं पौरैः श्रेणिमुखैस्तथा ।। विनीत उपसंगम्य पूजयामास तान्मुनीन् ॥ ८ ॥
रामचन्द्रको अभिनंदन कर परमासनमें स्थित हुए, महातेजस्वी रामचन्द्रजी जानकीके सहित ॥ ७ ॥ भाई और मंत्रियोंके साथ तथा पुरवासी जनोंके साथ नम्रतासे उन मुनियोंसे मिल उनकी पूजा करते हुए ॥ ८ ॥
अगस्त्यप्रमुखा विप्रा दिष्ट्या दिष्ट्येति चाब्रुवन् ।। राघवं प्रशशंसुस्ते मुनयो वाग्विदां वराः ॥ ९ ॥ त्वं हि देवो जगन्नाथो जगतामुपकारकः ।। रावणस्य सपुत्रस्य सामात्यस्य बधात्प्रभो ॥ १० ॥
और वाणी बोलनेमें चतुर से अगस्त्यादि महर्षि धन्य हो धन्य हो इस प्रकार कहकर रामचंद्रकी प्रशंसा करने लगे ॥ ९ ॥ हे देव जगन्नाथ ! तुमही जगत्के उपकार करनेवाले हो, हे प्रभो ! पुत्र अमात्य जनोंके सहित रावणका वध करनेसे ॥ १० ॥