अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसर्ग हिन्दीटीकासहित (८७)
सिंधुना संस्तुतो रामः सेतुं सिंधौ बबंध ह । लंकायां रावणं हत्वा सगणं मधुसूदनः ॥ १७ ॥ आरोप्य पुष्पकं सीतां विभीषणसहायवान् । अयोध्यांमगमद्रामः सुग्रीवहनुमदादिभिः ॥ १८ ॥
फिर सिंधुसे स्तुतिको प्राप्त हो रामचन्द्रने सागरमें सेतु बांधा और लंकापुरी जाय गणोंसहित रावणको मारकर ॥ १७ ॥ विभीषणको साथ ले पुष्पक विमानमें सीताको बैठाया सुग्रीव हनुमदादिके सहित रामचन्द्र अयोध्याको चले ॥ १८ ॥
आनंदे योजयामास भ्रातॄन्मातॄंश्च बांधवान् । राजा सर्वस्य लोकस्य प्रजानामनुरंजनः ॥ १९ ॥ रामं राजानमासाद्य तिर्यञ्चोऽपि ययुर्मुदम् । देवदुन्दुभयो नेदुः सर्वदा हि नभस्तले । ववृषुर्जंलदाः काले पुष्पवृष्टिः पपात च ॥ २० ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे ज्वालाप्रसाद मिश्रकृत भाषाटीकायां रामराज्योपलंभनं नाम षोडशः सर्गः ॥ १६ ॥
भ्राता माता और बांधवोंको आनन्दमें युक्त किया, वह सब लोकके राजा प्रजाके आनन्द देनेवाले हुए ॥ १९ ॥ रामचन्द्र राजाको प्राप्त होकर पशु पक्षी भी प्रसन्न हुए, सर्वदा आकाशमें देवदुन्दुभी बजने लगी, समयपर मेघवर्षा और फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥ २० ॥
इत्यार्षे श्रीम. वाल्मी. आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकांडे रामराज्योपलंभनं नामषोडशः सर्गः ॥ १६ ॥
सप्तदश सर्ग
जानकीवचन सहस्रमुख रावणका वृत्तान्त
प्राप्तराज्यस्य रामस्य राक्षसानां क्षये कृते ॥ आजग्मुर्मुनयस्तत्र राघवं प्रति नंदितुम् ॥ १ ॥ विश्वामित्रो यवक्रीतो रैभ्यश्चच्यवन एव च ॥ कण्वश्च मुनिशार्दूलो ये पूर्वा दिशमाश्रिताः ॥ २ ॥
जिस समय राक्षसोंका वध हो चुका और रामचन्द्रको राज्य मिला तब रामचन्द्रको अभिनन्दन करनेके निमित्त मुनिजन आये ॥ १ ॥ विश्वामित्र-