अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
पृष्ठ 93, कुल 173 में से
संदर्भ में पढ़ें( ८६ ) अद्भुतरामायण षोडश-
पारेसमुद्रं लंकां च निरूप्याह रघू त्तमः ।। वानरा हि यथा यांति लंकांलक्ष्मण तत्कुरु ।। ९ ।। रामस्य वचनं श्रुत्वा समुद्रं प्राह लक्ष्मणः । सिंधो त्वं स्तभ यात्मानं यथा यास्यति वानराः ।।१०।।
सागरके पार लंकापुरीको देखकर रामचन्द्र कहने लगे, हे लक्ष्मण ! जिस प्रकारसे हम लंकाके निकट पहुँचे तैसा करो ॥९॥ रामचन्द्रके वचन सुनकर लक्ष्मण समुद्रसे कहने लगे, हे सागर ! अपनी आत्माको स्तंभित कर तो तेरे ऊपर वानर चले जायँगे ॥ १० ॥
सिन्धुस्तु प्रभुणादिष्टं न शुश्राव यदा। तदा लक्ष्मणः क्रोधसंदीप्तः पपाताब्धेर्जलांतरे ।। ११ ।। तद्देह-वह्निशिखया शुशोष जलधेर्जलम्। यादांसि स्थलभाजीनि देवा भीत दिशोऽद्रवन् ।। १२ ।।
जब सागर प्रभुके वचनोंको न सुनता हुआ तब लक्ष्मणजी क्रोधकर सागरमें कूद पडे ॥ ११ ॥ और अपने देहकी ज्वालासे सागरका जल सोखने लगे, सब जलजीव व्याकुल होगये और देवता भयभीत हो दिशाओंके अन्तमें पलायन कर गये ॥ १२ ॥
तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यं वानरा विस्मयं गताः । हाहाकारं प्रचुक्रुस्ते लोकाः सर्व चराचराः ।। १३ ।। ऋषयो भूतसंघाश्च स्वस्तिस्वस्तीति चाब्रुवन् । राघवो लक्ष्मणं प्राह नैतद्युक्तं त्वया कृतम् ।। १४ ।।
उस महा आश्चर्यको देखकर वानर आश्चर्यको प्राप्त हुए और सब चराचर लोक हाहाकार करने लगे ॥ १३ ॥ ऋषि और दूसरे प्राणी स्वस्ति २ कहने लगे तब राम लक्ष्मणसे कहने लगे यह तुमने अच्छा नहीं किया ॥ १४ ॥
पुनरेनं पूरयाम सीताविरहजेन वै । अश्रुणेति प्रतिज्ञाय तं तथा-पूरयत्प्रभुः ।। १५ ।। रामोपरि तदाकाशात्पुष्पवृष्टिः पपात ह लोकाश्च सुस्थिता आसंश्चिन्तयित्वा पुनः पुनः ।। १६ ।।
अब सीताके वियोगसे उत्पन्न हुए आंसुओंसे फिर इसको पूर्ण करूँगा तब यह कहकर प्रभुने उसको पूर्ण कर दिया ॥ १५ ॥ तब आकाशसे रामचन्द्रके ऊपर फूलोंकी वर्षा होने लगी, लोक स्वस्थ हुए और बारम्बार विचार करने लगे ॥ १६ ॥