अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
पृष्ठ 92, कुल 173 में से
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षोडश सर्ग
रामचन्द्रका रावणको मार राज्य पाना
रामः प्रत्याह च पुनर्हनूमन्तं महाद्युतिः ।। रक्षसा मे हृता भार्या रावणेन दुरात्मना ।। १ ।। सुग्रीवेण रांमं सख्यं कारयाद्य-प्लवङ्गम ।। हसित्वा मधुरं वीरो हनूमानब्रवीद्वचः ।। २ ।।
तब फिर रामचन्द्रजी महावीरसे कहने लगे, कि हे महावीर ! दुरात्मा रावणने हमारी भार्याको हरण कर लिया है ।। १ ।। हे वानरश्रेष्ठ ! सुग्रीवके साथ हमारी मित्रता करा दो, तब मधुर हँसकर महावीरजी कहने लगे ।। २ ।।
तव भार्या महाभाग रावणेन हृतेति यत् ।। विश्वं यथेदमाभाति तथेदं प्रतिभाति मे ।। ३ ।। तथापि प्रभुणादिष्टं कार्यमेव हि किंकरैः ।। इत्युक्त्वा हनुमांस्तूर्णं प्रसन्नेनांतरात्मना ।। ४ ।।
हे महाभाग ! आपकी भार्याको रावणने हरण किया है जैसा यह विश्व विदित होता है इसी प्रकारसे हो ।। ३ ।। तौभी जो आपने आज्ञा दी है वह दासोंको अवश्य करनी चाहिये, यह कह प्रसन्न हो शीघ्रतासे महावीर ।। ४ ।।
आरोप्य स्कंधयोर्वीरौ सुग्रीवांतिकमानयत् ।। तौ दृष्ट्वा पुरुष-व्याघ्रो सुग्रीवो वानरोत्तमः ।। ५ ।। वालिनं तं जितं मेने प्राप्त मेने रुमां स्त्रियम् ।। सख्यं चकाररामेण दिष्ट्यादिष्ट्येति चाब्रवीत् ।। ६ ।।
दोनोंको कंधेपर चढाकर सुग्रीवके समीप ले आये, वानरोत्तम सुग्रीव उन दोनोंको देखकर ।। ५ ।। अपनी रुमास्त्रीको प्राप्त और वालीको जीता हुआ मानने लगा, और अपने भाग्यकी सराहना कर रामके साथ मित्रता की ।। ६ ।।
वालिनो विलयं कृत्वाराज्यं चास्मै निवेद्य च ।। नानादेश्यान्वानरांश्च आनाय्य रघुनन्दनौ ।। ७ ।। हनूमदंगदारूढौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ।। सिंधौस्तटं तौ ययतुः सुग्रीवेण सह प्रभुः ।। ८ ।।
वालीको मार सुग्रीवको राज्य दे, देश-देशान्तरोंसे वानरोंको बुलाया ।। ७ ।। हनुमान् और अंगदके ऊपर राम लक्ष्मण चढकर सुग्रीवके साथ सागरके तटपर गये ।। ८ ।।