अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(८४) अद्भुतरामायण [ पंचदश-
योगेश्वररूप अनन्तशक्ति परायण ब्रह्मतनु पवित्रको शरणकी इच्छावाले हम सब नमस्कार करते हैं, हे भूताधिपते ! प्रसन्न हूजिये ॥ २० ॥
त्वत्पादपद्मस्मरणादशेषं संसारबीजं विलयं प्रयाति ॥ मनो नियम्य प्रणिधाय कार्यं प्रसाद्याम्येकरसं भवंतम् ॥ २१ ॥ नमोऽस्तु रामाय भवोद्भवाय कालाय सर्वैकहराय तुभ्यम् ॥ नमोऽस्तु रामाय कपर्दिने ते नमोऽग्नये दर्शय रूपमग्र्यम् ॥ २२ ॥
आपके चरणकमलके स्मरणसे सब संसारके बीज जन्ममरण नष्ट हो जाते हैं, मनको रोक कायाको प्रणिधान कर एकरस आपको मैं प्रसन्न करता हूं ॥ २१ ॥ संसारके उत्पत्तिकारण, सबके उत्पन्न करनेवाले कालरूप एक हरनेवाले आपको प्रणाम है, राम कदर्पि अग्निरूप आपको प्रणाम है, आप अग्न्यरूप हो ॥ २२ ॥
ततः स भगवान्रामो लक्ष्मणेन सह प्रभुः ॥ संहृत्य परमं रूपं प्रकृतिस्थोऽभवत्स्वयम् ॥ २३ ॥ स तस्य स्तवमाकर्ण्य वायुपुत्रस्य धीमतः ॥ प्राह गम्भीरया वाचा हनूमन्तं रघूत्तमः ॥ २४ ॥
तब भगवान् राम अपना लक्ष्मणसहित रूप छिपाकर प्रकृतिमें स्थित होते हुए ॥ २३ ॥ तब वायुपुत्रका यह वचन सुनकर रामचन्द्र गम्भीर वचनसे कहने लगे ॥ २४ ॥
स्तोष्यांति येऽनया स्तुत्या ते यास्यंति परां गतिम् ॥ स्थिरो भव हनूमंस्त्वं कार्यमौपायिकं कुरु ॥ २५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणेवाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे हनुमत्कृतस्तवराजे पञ्चदशः सर्गः ॥ १५ ॥
जो इस स्तोत्रसे स्तुति करेंगे वे परमगतिको प्राप्त होंगे, हे महावीर ! आप स्थित होकर उपाययुक्त कार्य करो ॥ २५ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मी. आदि. अद्भुतोत्तरकाण्डे ज्वालाप्रसाद मिश्रभाषाटीकायां हनुमत्कृतस्तवराजे पंचदशः सर्गः ॥ १५ ॥