अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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यह चन्द्र सूर्यको ग्रहण कर कंदुकलीला कर सकता है तथा कुलाचल पर्वतोंको लेकर कंदुकक्रीडा करता है ॥ ४५ ॥ जो मानस सरोवरके उत्तर चारों ओर पुर हैं उनको छेदनकर महात्मा दिक्पालोंको ग्रहण किया है ॥ ४६ ॥
तत्रैव रमते राजा मातामहकुलैः सह ॥ तत्रेंद्री या पुरी रम्या स स्वयं तत्र तिष्ठति ॥ ४७ ॥ अन्यान्यन्येभ्य एवादान्मंत्रिभ्यो राक्षसाधिपः ॥ विशेषतोऽलंकृता सा पुरी परमदुर्लभा ॥ ४८ ॥
वहां वह राजा मातामहके कुलसहित रमण करता है वहां एक इंद्रकी पुरी है जहां वह स्वयं स्थित हो रमता है ॥ ४७ ॥ उस राक्षसराजने अनेकोंको मंत्रिपद प्रदान किया है, विशेष करके वह पुरीं प्राणियोंको परम दुर्लभ है । ४८ ।
जगतां सारमाकृष्य यथास्थानं सुमंडिता ॥ चंपकाशोकमन्दारकदलीप्रियकार्जुनैः ॥ ४९ ॥ पाटलाशोकजंबूभिः कोविदारैश्च चंदनैः ॥ पनसैः सालतालैश्च तमालैर्देवदारुभिः ॥ ५० ॥
जगत्के सार खेंचकर उसको निर्माण किया है, चम्पक अशोक मन्दार कदली प्रिय अर्जुन ॥ ४९ ॥ पाटल अशोक जम्बू कोविदार चन्दन पनस साल तमाल ताल देवदारु ॥ ५० ॥
बकुलैः पारिजातैश्च कल्पवृक्षैरलंकृता ॥ अन्यैश्च विविधैर्वृक्षैः सर्वर्तुकुसुस्मोज्ज्वलैः ॥ ५१ ॥ दिव्यगन्धरसैर्दिव्यैः सर्वर्तुफलसंयुतैः ॥ भ्रमरैः कोकिलैर्नानावर्णपक्षिभिरुज्ज्वला ॥ ५२ ॥
वकुल पारिजात तथा कल्पवृक्षोंसे अलंकृत और भी सब ऋतुओंके फूलोंसे युक्त ॥ ५१ ॥ दिव्य गन्धरसोंसे युक्त सम्पूर्ण ऋतुओंके फलसे संयुक्त भौंरे कोयल और जहां नाना पक्षी बोल रहे हैं ॥ ५२ ॥
शातकौंभमयैः कैश्चित्कैश्चिदग्निशिखोपमैः ॥ नीलांजलनिभैश्चान्यैः शोभिता वरपादपैः ॥ ५३ ॥ दीर्घिकाः संति बह्व्योऽत्र जल पूर्णा महोदयाः ॥ महार्हमणिसोपानाः स्फाटिकांतर्कुट्तिमाः ५४
कहीं सुवर्णके बने कहीं अग्निके शिखाके समान कहीं नीलांजन पर्वत उज्ज्वल पर्वतोंसे शोभित हैं ॥ ५३ ॥ जहां जलसे अनेक बावडी शोभित हैं जहां महा महामणियोंकी जटिल सीढी बनी हैं ॥ ५४ ॥
फुल्लपद्मोत्पलवनाश्चक्रवाकोपशो-भिताः दात्यूहगणसंघृष्टा