अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
पृष्ठ 99, कुल 173 में से
संदर्भ में पढ़ें(९२) अद्भुतरामायण [ सप्तदश-
पुष्करं पुष्करे दृष्टं महावह्निशिखोज्ज्वलम् । पत्रायुतायुतयुतं ब्रह्मणः परमासनम् ॥ ३७ ॥ तद्द्वीपवर्षयोर्मध्ये मानसोत्तरसंज्ञकः । मर्यादापर्वतो दैर्घ्ये चायामेऽयुतयोजनः ॥ ३८ ॥
वहां महाकमल अग्निशिखाके समान प्रकाशित है दश सहस्र कर्णिकायुक्त ब्रह्माजीका परमासन है ॥ ३७ ॥ उस द्वीप और वर्षके बीचमें मानसोत्तर संज्ञावाले मर्यादापर्वत लम्बाई चौडाईमें दशसहस्र योजनके हैं ॥ ३८ ॥
तच्छैलस्य चतुर्दिक्षु इंद्रादीनां पुराणि हि । क्रीडार्थं निर्मितान्येषां महांति विश्वकर्मणा ॥ ३९ ॥ सुमाली राक्षसश्रेष्ठ कैकसी नाम तत्सुता । मुनेर्विश्रवसः पत्नी सासूत रावणद्वयम् ॥ ४० ॥
उस पर्वतकी चारों दिशाओंमें इन्द्रादि लोकपालोंके पुर हैं विश्वकर्माने उनको क्रीडाके निमित्त निर्माण किया है ॥ ३९ ॥ एक राक्षस श्रेष्ठ सुमाली जिसकी कैकसी नाम कन्या थी, वह विश्रवस मुनिकी पत्नी दो रावण उत्पन्न करती हुई ॥ ४० ॥
एकः सहस्रवदनो द्वितीयो दशवक्त्रकः । जन्मकाले सुरैरुक्तमाकाशे रावणद्वयम् ॥ ४१ ॥ लोकानां रावणाज्जातं नामयौगिकमेतयोः । कनिष्ठो दशकंठोऽयं शितिकंठप्रसादतः ॥ ४२ ॥
एक सहस्रमुखका, दूसरा, दशमुखका था, जन्मकालमें आकाशमें देवताओंने कह दिया था कि रावण दो हैं ॥ ४१ ॥ लोकमें दो रावण हुए हैं इस कारण उनका एकही नाम था उनमें छोटा यह शिवजीके प्रसादसे ॥ ४२ ॥
लंकामधिवसत्येष धनदेन विनिर्मिताम् । ब्रह्मणो वरदानेन त्रिलोकीमवमन्यते ॥ ४३ ॥ श्रेष्ठः सहस्रवदनो रावणो लोकरावणः । स्वाभाविकबलेनासौ पुष्करद्वीपमाश्रितः ॥ ४४ ॥
कुबेरकी निर्मित की हुई लंकापुरीमें निवास करता है और ब्रह्माके वरदानसे त्रिलोकीका तिरस्कार करता है ॥ ४३ ॥ इसमें जो लोकका रुवानेवाला था उसने स्वाभाविक बलसे पुष्करद्वीपका आश्रय किया है ॥ ४४ ॥
सूर्य्याचन्द्रमसौ गृह्य क्रीडेत्कंदुकलीलया ॥ कुलाचलान्समुद्गृह्य कंदुकं क्रीडते हि सः ॥ ४५ ॥ मानसोत्तरशैलस्य चतुर्दिक्षु पुराणि हि ॥ आच्छिद्य संगृहीतानि दिगीशानां महात्मनाम् ॥ ४६ ॥