अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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अतिथिरूप वहां एक ब्राह्मण आया ॥ २७ ॥ वह ब्राह्मण आकर मेरे पितासे कहने लगा मैं चौमासेके चारं महीने तुम्हारे मंदिरमें रहूंगा ॥ २८ ॥
यदि सेवापरो नित्यं भवस्यमरसन्निभः ॥ जनको मत्पिता देवद्विजभक्तिपरायणः ॥ २९ ॥ ब्राह्मणं वासयामास नानाभक्ष्यं समादिशत् । अहं च तस्य सेवायै नियुक्ता धर्मभीरुणा ॥ ३० ॥
हे राजन् ! जो नित्य मेरी सेवामें तत्पर रहोगे तो, देवताहो जावोगे हमारे पिता जनकजी द्विज और देवताकी भक्तिमें परायण हैं ॥ २९ ॥ उस ब्राह्मणको नाना प्रकारके भक्ष्य भोज्यकी सामग्री प्रदान की गई; और धर्मभीरु हमारे महाराजने मुझे उसकी सेवा करनेको नियुक्त किया ॥ ३० ॥
यदा यथाज्ञापयति द्विजः स परमार्थवित् । तं तथा ह्यकरवं तत्र रात्रिन्दिवमतन्द्रिता ॥ ३१ ॥ नानातीर्थाभिगमनं कृतं तेन महात्मना। तत्रत्याश्च यथाश्चित्राः श्रावयामास मां द्विजः ॥ ३२ ॥
परमार्थका जाननेवाला वह ब्राह्मण जो जो आज्ञा देता, वह मैं रातदिन निरालस्य होकर सम्पादन करती थी ॥ ३१ ॥ उस महात्माने अनेक तीर्थोंमें अभिगमन किया था, वहां उस ब्राह्मणने मुझे अनेक प्रकारकी कथा श्रवण कराई ॥ ३२ ॥
सेवया मम धैर्येण चानुकूल्येन तर्पितः । कदाचिद्ब्राह्मणश्रेष्ठः प्रियभाषी यदात्थ माम् ॥ ३३ ॥ तद्वोऽहमभिधास्यामि शृणुत द्विजपुंगवाः । एकदा प्रातरुत्थाय कृतमैत्रः कृताह्निकः ॥ ३४ ॥
मेरी सेवा, धैर्य और अनुकूलतासे तृप्त होकर एक समय वह प्रियभाषी श्रेष्ठ ब्राह्मण मुझसे कहने लगा ॥ ३३ ॥ हे ब्राह्मणो ! वह मैं तुमसे वर्णन करती हूं एक समय ब्राह्मण प्रातःकाल उठकर सूर्यार्घादि कर्म कर ॥ ३४ ॥
सीते इति समाभाष्य प्रवक्तुमुप चक्रमे । शृणु सीते मया दृष्टमाश्चर्यं कमलानने ॥ ३५ ॥ दधिमंडोदकाब्धेश्चय परः स्वादूदकोब्धिकः । पुष्करद्वीपमावृत्य वर्तते वलया कृतिः ॥ ३६ ॥
हे सीते ! ऐसा संबोधन देकर कहनेकी इच्छा करने लगा, हे कमलानने जानकी, जो आश्चर्य मैंने देखा है वह सुन ॥ ३५ ॥ दही मांड और जलके सागरसे परे स्वादु जलका समुद्र है, वह पुष्करद्वीपको घेरकर वलयाकार स्थित हुआ है ॥ ३६ ॥