भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 173 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 102

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (९५)

मट्टीके ढेलेके समान मानता है और वीरोंको तो कुछ गिनताही नहीं है जब उसने सब लोकोंको त्रास देना आरंभ किया ॥ ६४ ॥

तदा पितामहोऽभ्येत्य पुलस्त्यो विश्रवास्तथा ॥ न्यवारयन्यत्न- स्ततं तातवत्सेति भाषकः ॥ ६५ ॥ एवं स रावणो देवि सहस्र वदनो महान् ॥ पुष्करद्वीपमासाद्य वर्तते जनकात्मजे ॥ ६६ ॥

तब पितामह पुलस्त्य और विश्रवाने आकर तात, वत्स आदि सम्बोधन देकर यत्नसे उसे निवारण किया ॥ ६५ ॥ हे देवी ! इस प्रकारका वह सहस्र वदन रावण पुष्करद्वीपमें निवास करता है ॥ ६६ ॥

तस्यानुजो दशास्योऽयं लंकायां जानकि स्थितः ॥ ६७ ॥ चित्राणीत्यादीनि मे शंसयित्वा विप्रो मासांश्चतुरो यापयित्वा ॥ राजानं मां चाशिषा योजयित्वा जगामैकः प्रोषितस्तीर्थयात्राम् ॥ ६८।

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वा. आ. अद्भुतोत्तरकाण्डे सीताभाषणं नाम सप्तदशः सर्गः ॥ १७ ॥

हे जानकि ! उसका छोटा भाई लंकापुरीमें निवास करता है ॥ ६७ ॥ इस प्रकार और भी विचित्र कथा कह चार महीने निवास कर राजा और मुझको आशीर्वाद देकर वह ब्राह्मण तीर्थयात्राको चला गया ॥ ६८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रा. वा. आदि. अद्भु. ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां सीताभाषणं नाम सप्तदशः सर्गः ॥ १७ ॥


अष्टादश सर्ग

रावणकी सेनाका निकलना

एवं स रावणो विप्राः सहस्रवदनो महान् ॥ प्रोक्तस्तेन द्विजेनाहं श्रुत्वाश्चर्यं च विस्मिता ॥ १ ॥ अद्यापि तन्मय हृदि जागरूकं हि वर्तते ॥ पत्या मे बाहुवीर्येण दशास्यो रावणो हतः ॥ २ ॥

हे ब्राह्मणो ! इस प्रकार उस ब्राह्मणने मुझसे सहस्र मुखवाले रावणकी कथा कही थी, जिसे सुनकर मुझे बडा विस्मय हुआ ॥ १ ॥ अबतक वह मेरे हृदयमें जागते हुएके समान वर्तता है मेरे स्वामीने भुजबलसे दशशिरवाले रावणको मारा है ॥ २ ॥