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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (४१)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (४१)

मेरे प्रसादसे तुझको गानयोगकी प्राप्ति होगी और विष्णुके गानयोग तेरी जिह्वा स्तुतिके योग्य स्पष्ट होजायगी ॥ ८५ ॥ देवता विद्याधर गन्धर्व अप्सराओंका तू गान विद्याका आचार्य होगा और अनेक प्रकारके भक्ष्य भोज्य आकर प्राप्त होंगे ॥ ८६ ॥

ततः कतिपयाहोभिः सर्वं भद्रं भविष्यति ॥ हरिमित्रवचस्तच्च विष्णुदूतोपबृंहितम् ॥ ८७ ॥ सर्वं निरयसंज्ञंमेक्षणादेव व्यनाशयत् ॥ प्रकृत्या विष्णुभक्तानामीदृशो करुणा द्विज ॥ ८८ ॥

फिर कुछ दिनोंमें सम्पूर्ण मंगल हो जायगा, जब हरिमित्रने विष्णु दूतोंके समक्ष यह वचन कहे ॥८७॥ तो क्षणमात्रमें सब नरककी सामग्री नष्ट होगई, हे नारद ! विष्णुभक्तोंकी स्वभावसेही यह प्रकृति होती है ॥ ८८ ॥

कृतापराधलोकानामपि दुखं व्यपोहति ॥ अमृतस्यन्दि वचनमुक्त्वा स प्रययौ हरिम् ॥ ८९ ॥ सर्वं ते कथितं येन गानाचार्योहमृत्तमः ॥ प्राप्स्यामि हरिमेतेन हरिमित्रप्रसादतः ॥ ९० ॥

नारदैतदनुवर्णितं मयापूर्वजन्मचरितं महाद्भुतम् ॥ यः श्रृणोति हरिमेत्य चेतसा स प्रयाति भवनं गदाभृतः ॥ ९१ ॥

इत्यार्षे श्रीम. वाल्मी. आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकांडे हरिमित्रोपाख्यानं नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥

कि, अपराधी जनोंके भी दुःख दूर करते हैं इस प्रकार वह अमृतके भरे वचनोंको कहकर हरिके लोकको गया ॥ ८९ ॥वह सब आपसे कहा जिस कारण मैं गानाचार्यपदको प्राप्त हुआ हूं, हरिमित्रके प्रसादसे मैं नारायणको प्राप्त हूं गा ॥ ९० ॥ हे नारद ! यह आपसे पूर्वजन्मका महा अद्भुत चरित्र वर्णन किया, जो चित्त लगाकर इसे सुनते हैं वह नारायणके लोकको प्राप्त होते हैं ॥ ९१ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये भाषाटीकायां अद्भुतोत्तर काण्डे हरिमित्रोपाख्यानं नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥

(४२) अद्भुतरामायण [सप्तम-

सप्तम सर्ग

नारदजीको गानविद्याका प्राप्त होना

गानबंधुः पुनः प्राह नारदं मुनिसत्तमम् ।। एते किन्नरसंघा वै विद्याध्राप्सरसां गणाः ।। १ ।। गानाचार्यमुलूकं मां गानशिक्षार्थमागताः ।। तपसा नैव शक्त्या वा गान विद्या तपोधन ।। २ ।।

फिर गानबन्धु नारदजीसे कहने लगा; यह किन्नर विद्याधर अप्सराओंके समूह ।। १ ।। गानाचार्य मेरे पास शिक्षाके निमित्त आते हैं हे तपोधन ! गानविद्या तपसे नहीं आती है ।। २ ।।

तस्माच्छ्रमणे युक्तश्च मत्तस्त्वं गानमाप्नुहि ।। एवमुक्तो मुनिस्तस्मै प्रणिपत्य जगौ यथा ।। ३ ।। तच्छृणुष्व मुनिश्रेष्ठ वासुदेवं नमस्य च ।। उलूकेनैवमुक्तस्तु नारदो मुनिसत्तमः ।। ४ ।।

इससे श्रम कर् तुम हमसे गान विद्या सीखो, तब मुनिराज प्रणाम कर जैसे गान करने लगे ।। ३ ।। हे मुनिश्रेष्ठ ! वह सुनो ! वासुदेवको नमस्कार कर नारदजी उलूकके वचन मान ।। ४ ।।

शिक्षाक्रमेण संयुक्तस्तत्र गानमशिक्षत ।। गानबंधुस्तमाहेदं त्यक्तलज्जो भवाधुना ।। ५ ।। स्त्रीसंगमे तथा गीतेक्षुतेऽन्वाख्यानसंगमे । व्यवहारे च धान्यानामर्थानां च तथैव च ।। ६ ।।

शिक्षाक्रमसे संयुक्त गान सीखने लगे तब गानबन्धुने कहा नारदजी ! अब लाज त्याग देनी चाहिये ।। ५ ।। स्त्रीसंगम, गीत, छीक अन्वाख्यान, धान्यका व्यवहार, धनके व्यवहारमें ।। ६ ।।

आयेव्यये तथा नित्यं त्यक्तलज्जस्तु वै भवेत् ।। न कुण्ठितेन गूढेन नित्यं प्रावरणादिभिः ।। ७ ।। हस्तविक्षेपभावेन व्यादितास्येन चैव हि ।। निर्यातजिह्वायोगेन न गेयं च कथंचन ।। ८ ।।

आय और व्ययमें कभी लज्जा नहीं करनी चाहिये, कुण्ठित गूढ अत्यन्त ढके स्थानमें ।। ७ ।। तथा हाथ फैलाकर सकोडकर बहुत मुख फैलाकर जिह्वा मीचकर कभी गाना न चाहिये ।। ८ ।।

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (४३)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (४३)

स्वांगं निरीक्षमाणेण परमप्रेक्षता तथा ।। न गायेदूर्ध्वबाहुश्च नोर्ध्वदृष्टिः कथंचन ।। ९ ।। हासो भयं क्षुधा कंपः शोकोऽन्यस्य स्मृतिस्तृषा ।। नैतानि सप्तरूपाणि गानयोगे महामते ।। १० ।। केवल अपने अंगको देखते ऊपरको भुजा उठाकर वा केवल ऊपरको दृष्टि देकर ।। ९-।। हँसते हुए डरमें भूखमें कँपा शोक दूसरेकी यादमें प्यासेमें इन प्रसंगोंमें गान करना उचित नहीं है ।। १० ।।

नैकहस्तेन शस्येत तालसंघट्टनं मुने ।। क्षुधार्तेन भयार्तेन तृषार्तेन तथैव च ।। ११ ।। गानयोगो न कर्तव्यो नांधकारे कथंचन ।। एव- मादीनि योग्यानि कर्तव्यानि महामुने ।। १२ ।। एक हाथसे ताल देकर गान करना उचित नहीं है, भूखे प्यासे घवराये हुएको ।। ११ ।। किसी प्रकारसे गान योग्य कर्त्तव्य नहीं है; इसी प्रकार अंध- कारमें भी न गावे, हे महामुने ! इस प्रकारसे योग्य अयोग्य कर्त्तव्य विचारे १२।।

एवमुक्तः स भगवात्रारदो विधिरक्षणे ।। अशिक्षत तथा गीतं दिव्यवर्षसहस्रकम् ।। १३ ।। ततः समस्तसंपन्नो गीतप्रस्तावका- दिषु ।। विपंच्यादिषु संपन्नः सर्वस्वरवि भागवित् ।। १४ ।। जब इस प्रकारसे कहा तब दिव्य सहस्त्र वर्षतक नारदजी गीत सीखते रहे ।। १३ ।। तब गीतकी प्रस्तावना आदिके पारगामी हुए वीणाके सब स्वरोंके ज्ञान हुए ।। १४ ।।

अयुतानि च षट्त्रिंशत्सहस्राणि शतानि च ।। स्वराणां भेदयोगेन ज्ञातवान्मुनिसत्तमः ।। १५ ।। ततो गंधर्वसंघाश्च किन्नराणां तथा गणाः ।। मुनिना सह संयुक्ताः प्रीतियुक्तास्तु तेऽभवन् ।। १६ ।। छियालीस सहस्त्र ४६००० स्वरभेदोंको नारदजीने भली प्रकारसे जान लिया ।। १५ ।। तथा गंधर्व और किन्नरोंके समूह मुनिके संगमें परम प्रीतिका प्राप्त हुए ।। १६ ।।

गानबंधुं मुनिः प्राह प्राप्य गानमनुत्तमम् ।। त्वां समासाद्य संपन्नं त्वं हि गीतविशारदः ।। १७ ।। ध्वांकशत्रो महाप्राज्ञ किमवाप्यं करोमि ते ।। गानबंधुस्ततः प्राह नारदं मुनि पुंगवम् ।। १८ ।। तब गानबंधुसे नारदजीने कहा, अब मैं तुमको प्राप्त हो उत्तम गानयोगको प्राप्त हुआ तुम सम्पन्न और गीतविशारद हो ।। १७ ।। हे उलूकराज ! अब मैं तुम्हारा क्या प्रिय करूं ? तब गानबन्धुने नारदजीसे कहा ।। १८ ।।

(४४) · अद्भुतरामायण [सप्तम-

ब्रह्मणो दिवसे ब्रह्मन्मनवः स्युश्चतुर्दश ॥ ततस्त्रैलोक्यसंप्लाबो भविष्यति महामुने ॥ १९ ॥ तावन्मे स्याद्यशोभागस्तावन्मे परमं शुभम् ॥ मनसाध्यापितं मे स्याद्दाक्षिण्यान्मुनिसत्तमः ॥ २० ॥

हे भगवन् ! ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मनु बीत जाते हैं उस समय त्रिलोकी नष्ट हो जायगी ॥ १९ ॥ तवतकं मेरा उत्तम यश बना रहे, हे मुनिश्रेष्ठ ! मनसे ही मुझको चतुरताकी प्राप्ति हो जाय ॥ २० ॥

उलूकं प्राह देवर्षिः सर्वं तेऽस्तु मनोगतम् ॥ अतीते कल्पसंयोगे गरुडस्त्वं भविष्यसि ॥ २१ ॥ गुणगानादच्युतस्य सायुज्यं तस्य लप्स्यसे ॥ स्वस्ति तेऽस्तु महाप्राज्ञ गमिष्यामि प्रसीद मे ॥ २२ ॥

देवर्षिने उलूकसे कहा, जो तुम्हारी इच्छा है, वह सब होजायगा, एक कल्प बीत जानेपर तू गरुड होगा ॥ २१ ॥ और नारायणके गुण गान करनेके कारण उनकी सायुज्यताको प्राप्त होगा हे महाप्राज्ञ ! आपका मंगल हो मैं जाता हूं तुम प्रसन्न रहो ॥ २२ ॥

एवमुक्त्वा ययौ विप्रो जेतुं तुंबुरुमुत्तमम् ॥ तुंबुरोश्च गृहाभ्याशे ददर्श विकृताकृतीन् ॥ २३ ॥ कृत्तबाहूरुपादांश्च कृतनासा- क्षिवक्षसः ॥ कृतोत्तमांगांगुलींश्च छिन्नभिन्नकलेवरान् ॥ २४ ॥

यह कह नारदजी तुम्बुरुके जीतनेको गये, तब तुम्बेरुके घरके निकट विकृत आकारवाले ॥ २३ ॥ हाथ जंघा पैर कटे नासिका वक्षस्थल कटे, छिन्न शिर, कोई अंगुलीसे छिन्न कोई भिन्न कलेवर ॥ २४ ॥

पुंसः स्त्रियश्च विकृतानददर्शायुतशो बहून् ॥ नारदेन च ते प्रोक्ताः के यूयं कृतविग्रहाः ॥ २५ ॥ नारदं प्रोचुरपि ते त्वया कृतांगा वयम् ॥ वयं रागाश्च रागिण्योगानेन भिन्नसंधिना ॥ २६ ॥

ऐसी सहस्रों स्त्रियोंको नारदजीने देखकर उनसे पूछा तुम्हारे अंग किसने नष्ट करदिये ॥ २५ ॥ यह सुन उन्होंने नारदजीसे कहा, आपनेही हमारी यह दशा की है, हम राग रागिनी हैं जिस समय आप भिन्न सन्धानसे ॥ २६ ॥

भवता गीयते यर्हि तर्ह्यवस्थेदृशी हि नः ॥ पुनस्तुंबुरुगानेन च्छिन्नभिन्नप्ररोहणम् ॥ २७ ॥ तुंबुरुर्जीवयत्येष त्वं मारयसि नारद ॥ तदाश्चर्यं महद्दृष्ट्वा श्रुत्वा च विस्मयान्वितः ॥ २८ ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (४५)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (४५)

गान करते हो तबही हमारी यह दशा होजाती है फिर जब तुम्बुरु गान करते हैं तब यह हमारे छिन्न भिन्न शरीर ॥ २७ ॥ तुम्बुरु गन्धर्वद्वारा जीवित होते हैं और हे नारद ! तुम मारते हो, यह देखकर नारदजी बड़े आश्चर्यको प्राप्त हुए ॥ २८ ॥

धिग्धिगुक्त्वा जगामाथ नारदोऽपि जनार्दनम् ।। श्वेतद्वीपे स भगवान्नारदं प्राह माधवः ।। २९ ।। गानबंधौ च यद्गानं न चैतेनासि पारगः ।। तुंबुरोः सदृशो नासि गानेगानेन नारद ।। ३० ।।

और अपने आपको धिक्कार देकर श्रीकृष्णके पास गये, तब श्वेतद्वीपमें भगवान्ने नारदजीसे कहा ॥ २९ ॥ कि गानवन्धुसे गाना सीखकर गान-विद्याके पारगामी नहीं हुए हो हे नारद ! गानविद्यामें अभी तुम तुम्बुरुके समान नहीं हुए हो ॥ ३० ॥

मनोर्वैवस्वतस्याहमष्टाविंशतिमे युगे ।। द्वापरांते भविष्यामि यदुवंशकुलोद्भवः ।। ३१ ।। देवक्यां वसुदेवस्य कृष्णनाम्ना महामुने ।। तदानीं मां समागम्य स्मारयेतद्यथातथम् ।। ३२ ।।

जब वैवस्वत मनुके अट्ठाईसवें युगमें द्वापरके अन्तमें यदुकुलमें मैं अवतार लूंगा ॥ ३१ ॥ देवकीवसुदेवसे जन्म लेनेसे कृष्ण मेरा नाम होगा उस समय तुम आकर हमें इस वातका स्मरण कराना ॥ ३२ ॥

तत्र त्वां गानसम्पन्नं करिष्यामि महाव्रत ।। तुंबुरोश्च समं चैव तथातिशयसंयुक्तम् ।। ३३ ।। तावत्कालं यथायोगं देवगंधर्वयोनिषु ।। शिक्ष त्वं हि यथान्यायमित्युक्त्वांतरधीयत ।। ३४ ।।

हे सुव्रत ! उस समय में तुमको गानसम्पन्न कर दूंगा और तुम्बुरुसे भी अधिक करदूंगा ॥ ३३ ॥ तबतक तुम यथायोग्य देवगन्धर्वकी योनिमें इसकी यथायोग्य शिक्षा करो, यह कह भगवान् अन्तर्धान होगये ॥ ३४ ॥

ततो मुनिः प्रणम्यैनं वीणावादन तत्परः ।। देवर्षिर्देवसंकाशः सर्वाभरणभूषितः ।। ३५ ।। तपसां निधिरत्यर्थं वासुदेवपरायणः ।। स्कंधे विपंचीमाधाय सर्वलोकांश्चचार सः ।। ३६ ।।

तब मुनि भगवान्को प्रणाम कर वीणा बजानेमें तत्पर हुए देवताओंके समान सम्पूर्ण आभरणोंसे भूषित ॥ ३५ ॥ तपोनिधि अत्यन्त वासुदेवपरायण कंधेके ऊपर वीणा धरे सब लोकोंमें विचरते थे ॥ ३६ ॥

(४६) अद्भुतरामायण [सप्तम-]

वारुणं याम्यमाग्नेयमैन्द्रं कौबेरमेव च ॥ वायव्यं च तथैशानं संशंश प्राप्य धर्मवित् ॥ ३७ ॥ गायमानो हरिं सम्यग्वीणा वादविचक्षणः ॥ गंधर्वाप्सरसां संघैः पूज्यमानस्ततस्ततः ॥ ३८ ॥ ब्रह्मलोकं समासाद्य कस्मिंश्चित्कालपर्यये ॥ हाहा हूहूश्च गंधर्वो गीतवाद्यविशारदौ ॥ ३९ ॥ ब्रह्मणो गायकौ दिव्यौ नित्यं गंधर्वसत्तमौ ॥ तत्र ताभ्यां समासाद्य गायमानो हरिं विभुम् ॥ ४० ॥

वरुण यम अग्नि इन्द्र कुबेर वायु तथा शान दिशामें यह धर्मात्मा संदेहको प्राप्त हो ॥ ३७ ॥ वीणा बजाकर नारायणके गुणानुवाद गाते यक्ष और गंधर्व अप्सराओंसे पूजित होने लगे ॥ ३८ ॥ ब्रह्मलोकको प्राप्त हो कुछ दिन उपरान्त वहां जो गीतवाद्यमें विशारद हाहा हूहूनामक गन्धर्व थे ॥ ३९ ॥ अर्थात् गंधर्व नित्य ब्रह्माजीके गान करनेवाले हैं उनके साथ मिलकर नारायणके निमित्त गान करते हुए ॥ ४० ॥

ब्रह्मणा च महातेजाः पूजितो मुनिसत्तमः ॥ तं प्रणम्य महात्मानं सर्वलोकपितामहम् ॥ ४१ ॥ चचार च यथाकामं सर्वलोकेषु नारदः ॥ पुनः कालेन महता गृहं प्राप्य च तुम्बुरोः ॥ ४२ ॥

और महातेजस्वी ब्रह्माजीसे पूजित होकर उन सर्वलोकके पितामह ब्रह्माजीको प्रणाम कर ॥ ४१ ॥ सब लोकमें यथेच्छ विचरण करने लगे बहुत कालके उपरान्त तुम्बुरुके घरमें प्राप्त हो ॥ ४२ ॥

वीणामादाय तत्रस्थस्तत्रस्थैरप्यलक्षितः ॥ सुरकन्याश्च तत्रस्थाः षड्जाद्याः सहधैवताः ॥ ४३ ॥ व्रीडितो भगवान्दृष्ट्वा निर्गतश्च स सत्वरम् ॥ शिक्षयामास बहुशस्तत्र तत्र महामुनिः ॥ ४४ ॥

अन्योंसे अलक्षित हो वीणा लेकर चले वहां वह षड्ज धैवत आदि देवकन्या स्थित थीं ॥ ४३ ॥ उनको देखकर लज्जित हो नारदजी वहांसे चले गये और जहां तहां मुनिने बहुत शिक्षा दी ॥ ४४ ॥

कालेऽतीते ततो विष्णुरवतीर्णो जगन्मयः ॥ देवक्यां वसुदेवस्य यादवोऽसौ महाद्युतिः ॥ ४५ ॥ सप्तस्वराङ्गना द्रष्टुं गानविद्याविशारदः ॥ ययौ रैवतके कृष्ण प्रणिपत्य महामुनिः¹ ॥ ४६ ॥


¹ नारदः

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (४७)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (४७)

बहुत, समय बीतनेपर जगत्प्रभु विष्णुका अवतार हुआ, देवकीमें वसुदेवके घर जगत्पति अवतार लेते हुए ॥ ४५ ॥ सात स्वर और उनकी अंगनाओंके देखनेको यह गानविद्यामें विशारद रैवतक पर्वतपर श्रीकृष्णको प्रणाम करने गये ॥ ४६ ॥

व्यज्ञापयदशेषं तच्छ्वेतद्वीपे त्वया पुरा ॥ नारायणेन कथितं गानयोगार्थमुत्तमम् ॥ ४७ ॥ तच्छ्रुत्वा प्रहसन्कृष्णः प्राह जांबवतीं मुदा ॥ एनं मुनिवरं भद्रे शिक्षयस्व यथाविधि ॥ ४८ ॥

और उस श्वेतद्वीपकी वार्ताको श्रवण कराया कि, नारायणरूपसे आपने गानयोगकी वार्ता कही थी ॥ ४७ ॥ यह सुन श्रीकृष्णने हँसकर जांबवतीसे कहा हे भद्रे ! यथायोग्य इन मुनिश्रेष्ठको शिक्षा दो ॥ ४८ ॥

वीणागानसमायोगे तथेत्याह च सा पतिम् । प्रहसंती यथायोगं शिक्षयामास तं मुनिम् ॥ ४९ ॥ ततः संवत्सरे पूर्णे नारदं प्राह केशवः । सत्याः समीपमागच्छ शिक्षस्व तथा पुनः ॥ ५० ॥

वीणागानका योग सिखाओ, जांबवतीने स्वीकार कर हँसते हँसते यथायोग्य नारदजीको शिक्षा देनी प्रारंभ की ॥ ४९ ॥ फिर संवत्सर पूर्ण होजानेपर केशवने नारदजीसे कहा अब सत्याके समीप जाकर सीखो ॥ ५० ॥

तथेत्युक्त्वा सत्यभामां प्रणिपत्य ययौ मुनिः । तया स शिक्षितो विद्वान्पूर्णे संवत्सरे ततः ॥ ५१ ॥ वासुदेवनियुक्तोऽसौ रुक्मिण्याः सदनं गतः । अंगनाभिस्तत्रत्याभिर्दासीभिर्मुनिसत्तमः ॥ ५२ ॥

बहुत अच्छा यह कह मुनि सत्याको प्रणाम करनेको गये उसने एक वर्षतक नारदजीको शिक्षा दी ॥ ५१ ॥ फिर श्रीकृष्णकी आज्ञासे नारदजी रुक्मिणीके भवनमें गये वहां बहुतसी श्रेष्ठ दासी विद्यमान थीं ॥ ५२ ॥

उक्तोऽसौ गायमानोऽपि न स्वरं वेत्सि वै मुने । ततः श्रमेण महता यावत्संवत्सरद्वयम् ॥ ५३ ॥ शिक्षितोऽसौ तदा देव्या रुक्मण्याधिजगौ मुनिः । न तु स्वरांगनाः प्राप तंत्रीयोगे महामुनिः ॥ ५४ ॥

जब वह गाना सिखाने लगीं तो नारद जीको उनके स्वरका ज्ञानभी तो नहीं होता था तब बडे परिश्रमसे दो वर्षतक सिखाती रही ॥ ५३ ॥ और रुक्मिणीके सिखाये नारदजी गाने लगे परन्तु देवाङ्गनाओंके तन्त्रीयोगको प्राप्त न हुए ॥ ५४ ॥

(४८) अद्भुतरामायण [सप्तम-

आहूय कृष्णो भगवान्स्वयमेव महामुनिम् । अशिक्षदमैयात्मा गानयोगमनुत्तमम् ॥ ५५ ॥ कृष्णदत्तेन गानेन तस्यायाताः स्वरांगनाः । ब्रह्मानन्दः समभवन्नारदस्य च चेतसि ॥ ५६ ॥

तब श्रीकृष्ण भगवान् स्वयं ही महामुनिको बुलाकर वह अविनाशी गान-योग सिखाने लगे ॥ ५५ ॥ तब कृष्णके गाना सिखानेपर सुरांगना आकर प्राप्त हुई और नारदजीके चितमें ब्रह्मानंदकी प्राप्ति हुई ॥ ५६ ॥

ततो द्वेषादयो दोषाः सर्वे अस्तं गता द्विज । ईर्ष्या च तुंबुरौ यासीन्नारदस्य च सा गता ॥ ५७ ॥ ततो ननर्त देवर्षिः प्रणिपत्य जनार्दनम् । उवाच च हृषीकेशः सर्वज्ञस्त्वं महामुने ॥ ५८ ॥

तब नारदजीके द्वेषादि दोष सब अस्त होगये और तुम्बुरुके प्रति जो ईर्षा थी वह भी जाती रही ॥ ५७ ॥ तब नारायणको प्रणाम कर देवर्षि नृत्य करने लगे और श्रीकृष्णने कहा नारद ! अब तुम सर्वज्ञ हुए ॥ ५८ ॥

प्राचीनगानयोगेन गायस्व मम सन्निधौ । एतत्ते प्रार्थितं प्राप्तं मम लोके तथैव च ॥ ५९ ॥ नित्यं तुम्बुरुणा सार्द्धं गायस्व च यथातथम् । एवमुक्तो मुनिस्तत्र यथायोगं चचार सः ॥ ६० ॥

मेरे निकट प्राचीन गानयोगसे गाओ यह मैंने आपसे अपने लोककी प्राप्ति कही है ॥ ५९ ॥ नित्य आप तुंबुरुके साथ गान करिये यह सुनकर मुनि त्रिलोकीमें सञ्चरण करने लगा ॥ ६० ॥

तथा संपूजयत्कृष्णं रुद्रं भुवन नायकम् । तदा जगौ हरेस्तत्र नियोगाच्छंकरालये ॥ ६१ ॥ रुक्मिण्या सत्यया सार्द्धं जांबवत्या महामुनिः । कृष्णेन च द्विजश्रेष्ठ श्रुतिजातिविशारदः ॥ ६२ ॥

और रुद्रभवनके नायकका पूजनकर इस नारायणकी आज्ञासे वह शंकरके स्थानमें गानको गये ॥ ६१ ॥ रुक्मिणी, सत्या, जांबवती और श्रीकृष्णजीके साथमें महामुनि गान करने लगे ॥ ६२ ॥

एवं ते मुनिशार्दूल प्रोक्तो गीतक्रमो मया । ब्राह्मणो वासुदेवाख्यं गायमानोऽनिशं द्विज ॥ ६३ ॥ हरेः सायुज्यमाप्नोति सर्वयज्ञफलं लभेत् । अन्यथा नरकं गच्छेदगायमानोऽन्यदेव हि ॥ ६४ ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (४९)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (४९)

यह आपसे गीतका वर्णन किया ब्राह्मण वासुदेव नामको रातदिन गान करता हुआ ॥ ६३ ॥ हरिका गान करनेसे सायुज्य और सब यज्ञोंका फल प्राप्त होता है दूसरेकी कीर्ति गान करनेसे नरक होता है ॥ ६४ ॥

कर्मणा मनसा वाचा वासुदेवपरायणः । गायञ्छृण्वंस्तमाप्नोति तस्माच्छ्रेष्ठः प्रियंवदः ॥ ६५ ॥ कथितमिदमपूर्वं जानकीजन्मपूर्वं श्रुति-सुखमतिगुह्यं स्नेहतस्तेऽतिवाह्यम् । कलुष कुलविपक्षं भव्य-दानैकदक्षं नृभिर विरतवंद्यं सर्वदेवाभिनंद्यम् ॥ ६६ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकांडे नारदगान प्राप्तिवर्णनं सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥

मन वचन कर्मसे वासुदेवपरायण हो गाना श्रवण करनेसे उस पदकी प्राप्ति होती है, इस कारण वह प्रियंवद और श्रेष्ठ है ॥ ६५ ॥ आपसे यह अपूर्व जानकीजन्मका कारण कहा यह कर्णसुखद अतिगुह्य है आपके स्नेहसे वर्णन किया है, पापका नाश करनेवाला कल्याण देनेमें एकही चतुर वैरागियोंको सुखदायक और सब देवताओंको आनन्द देनेवाला है ॥ ६६ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामा.णे वा. आ. अद्भुतोत्तरकाण्डे पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र कृत भाषाटीकायां नारदगानप्राप्तिवर्णनं नाम सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥

अष्टम सर्ग

सीताजीका जन्मवर्णन

यथा सा शोणितोद्भूता राक्षसीगर्भ संभवा । यथा भूमितलोत्पन्ना जानकी च यथा हि सा ॥ १ ॥ सीता तच्छृणु विप्रेन्द्र वर्णयामि तवा-नघ । दशास्यो रावणो नाम तपस्तप्तुं मनो दधे ॥ २ ॥

और जिस प्रकार लक्ष्मी रुधिरसे राक्षसीके गर्भद्वारा उत्पन्न होकर फिर भूमितलमें प्राप्त हुई सो कथा सुनो ॥ १ ॥ हे विप्रेन्द्र ! वह कथा मैं आपसे वर्णन करता हूं सुनो—जिस समय दशमुख रावणने तप करनेकी इच्छा की । २ ।

त्रैलोक्यस्याधिपत्याय अजरामरणाय च ॥ बहुवर्षं तपस्तप्त्वा ज्वलनार्कसमोज्ज्वलत् ॥ ३॥ तत्तेजसा जगत्सर्वं दह्यमानं यदाभवत् । तमुवाच तदा ब्रह्मा समागत्य सुरैर्वृतः ॥ ४ ॥

(५०) अद्भुतरामायण [ अष्टम-

कि, मैं त्रिलोकीका अधिपति अजर और अमर हो जाऊं, तब बहुत वर्षोंतक तप करके प्रकाशमान अग्निके समान प्रज्वलित हो उठा ॥ ३ ॥ जब उसके तेजसे सब जगत् दग्ध होने लगा तब देवताओंके सहित ब्रह्माजी आकर उससे कहने लगे ॥ ४ ॥

पौलस्त्य विरमाद्य त्वं तपसो मम वाक्यतः । तपसोग्रेण महता लोका भस्मीकृता इव ॥ ५ ॥ वरं ददामि ते वत्स यत्ते मनसि वर्तते । तपोधन लभस्वाद्य वरदान्मत्त ईप्सितम् ॥ ६ ॥

हे रावण ! अब तुम तपसे विरामको प्राप्त हो तुम्हारे तपसे संपूर्ण लोक भस्म हुएके समान हैं ॥ ५ ॥ हे वत्स ! जो तुम्हारे मनमें इच्छा है वह वर तुमको दूंगा तुम मुझसे इच्छित वरको प्राप्त होगे ॥ ६ ॥

न्यवारयत चक्षूंषि सूर्य्यबिंबावलोकनात् । प्रणिप्रत्यजगन्नाथं वरं वव्रे व रावणः ॥ ७ ॥ देहि सर्वामरत्वं मे वरदोऽसि यदि प्रभुः । तदाकर्ण्य वचो ब्रह्मा पुनः प्राह स रावणम् ॥ ८ ॥

अब तुम सूर्य्यके बिंबके अवलोकनसे नेत्रोंको निवारण करो, तब ब्रह्माजीको प्रणाम कर रावण वर मांगने लगा ॥ ७ ॥ हे प्रभु ! यदि वरदान देते हो तो मुझे सबसे अमर कर दीजिये, यह बचन सुनकर ब्रह्माजी फिर रावणसे बोले ८ ।

नहि सर्वामरत्वं ते वरमन्यं वृणीष्व मे । ततः स रावणः प्राह कूट वादी हि राक्षसः ॥ ९ ॥ न सुरा नासुरा यक्षाः पिशाचोरगराक्षसाः । विद्याधराः किन्नरा वा तथैवाप्सरसां गणाः ॥ १० ॥

कि, कोई सबसे अमर नहीं होसकता, तुम दूसरा वर मांगो, तब यह कूटवादी राक्षस बोला ॥ ९ ॥ सुर असुर यक्ष पिशाच राक्षस उरग विद्याधर किन्नर अप्सराओंके गण ॥ १० ॥

न हन्युर्मां कथं चित्ते देहि मे वरमुत्तमम् । अन्यच्च ते वृणे ब्रह्मंस्तच्छृणुष्व पितामह ॥ ११ ॥ आत्मनो दुहिता मोहादत्यर्थं प्रार्थिता भवेत् । तदा मृत्युर्मम भवेद्यदि कन्या न कांक्षति ॥ १२ ॥

मुझे किसी प्रकार मार न सकें यही उत्तम वर दीजिये; हे ब्रह्माजी ! और जो वर माँगते हैं वह भी आप श्रवण कीजिये ॥ ११ ॥ जब मैं अज्ञानसेही अपनी कन्याकेही स्वीकारकी इच्छा करूँ तब मेरी मृत्यु हो ॥ १२ ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (५१)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (५१)

तथेत्युक्त्वा जगामाशु ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ नरांश्चाजीगणद्रक्षो मत्वा तांस्तृणवद्द्विज ॥ १३ ॥ ब्रह्मदत्तवरो राजा रावणोवरदर्पितः ॥ त्रैलोक्यजयसर्वस्वं प्राप्तवान्बाहुवीर्यतः ॥ १४ ॥

बहुत अच्छा यह कहकर ब्रह्माजी ब्रह्मलोकको चले गये मनुष्योंको तृणके समान मानकर ब्रह्माजीसे मनुष्योंका अवैध्यत्व नहीं मांगा ॥ १३ ॥ ब्रह्माजीके वरदानसे मत्त हुआ रावण बडे पराक्रमसे त्रिलोकीके जय सर्वस्वको प्राप्त हुआ ॥ १४ ॥

एकदा रावणो राजा दंडकारण्यमागतः ॥ तदर्षीन्नग्निकल्पांश्च दृष्ट्वा मनस्यचिंतयत् ॥ १५ ॥ एतान जित्वा हि कथं त्रिलोकीजयभागहम् ॥ एषां वधेन च श्रेयो न पश्यामि महात्मनाम् ॥ १६ ॥

एक समय राजा रावण दण्डकारण्यमें प्राप्त हुआ वहांके अग्निके समान कान्तिमान् ऋषियोंको देखकर विचार करने लगा ॥ १५ ॥ बिना इनके जीते कैसे मैं त्रिलोकीका जीतनेवाला हो सकता हूं और इन महात्माओंके मारनेसे भी मैं मंगल नहीं देखता हूं ॥ १६ ॥

दुरात्मा स विचिंत्यैतत्प्राह तान्मुनिपुंगवान् ॥ अहं सर्वस्य जगतः शास्ताः च जयभागहम् ॥ १७ ॥ भवतां जयमाकांक्षे जयं दत्त द्विजर्षभाः ॥ इत्युक्त्वा स शराग्रेण क्षताच्छोणितमंगतः ॥ १८ ॥

यह विचार कर वह दुरात्मा उन मुनियोंसे कहने लगा में सब जगत्का शास्ता और जयभागी हूं ॥ १७ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! आपके जय करनेकी इच्छा करता हूं; हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! मुझे जय दो यह कह बाणके अग्रभागको चुभाय उनके शरीरसे रुधिर ॥ १८ ॥

बलादाकृष्य तेषां वै कलशेऽस्थापयत्प्रभुः ॥ तत्र गृत्समदो नाम शतपुत्रपिता द्विजः ॥ १९ ॥ दुहित्रर्थे भार्यया स प्रार्थितो भगवान् मुनिः । लक्ष्मीर्मे दुहिता भूयादित्यसौ कलशे विभुः ॥ २० ॥

बलपूर्वक निकालकर एक कलशमें स्थापन करता हुआ, उनमें एक गृत्समद ब्राह्मण सौ पुत्रका पिता था ॥ १९ ॥ उसने भार्यासहित भगवानसे एक कन्याकी प्रार्थना की थी कि, लक्ष्मी मेरी कन्या होजाय इस प्रकार वह कलशेमें ॥ २० ॥

(५२) अद्भुतरामायण अष्टम-

दुग्धं चाहरहस्तत्र कुशाग्रेण समंत्रतः ॥ स्थापयत्येष नियत- स्तदहर्निर्ययौ वनम् ॥ २१ ॥ तद्दिने दैवयोगेन कलशे तत्र रावणः ॥ मुनीनां शोणितं स्थाप्य गृहीत्वा स्वगृहं ययौ ॥ २२ ॥ कुशाग्रभागसे दुग्धकी स्थिति करता हुआ और कलशमें दूध रखकर वह बनको चला गया ॥ २१ ॥ दैवयोगसे रावणने उस दिन उसी कलशमें ब्राह्मणों- का रुधिर भरा और घरको लेगया ॥ २२ ॥

भार्या मंदोदरीं प्राह कलशं रक्ष सुंदरि ॥ विषादप्यधिकं विद्धि शोणितं कलशे स्थितम् ॥ २३ ॥ न देयं नापि वा भक्ष्यं मुनीनां शोणितं त्विदम् ॥ त्रैलोक्यजयलाभेन रावणो लोकरावणः ॥ २४ ॥ और अपनी भार्या मंदोदरीसे कहा हे सुन्दरी ! इस कलशको अच्छी प्रकारसे रक्षा कर; जो रुधिर इस कलशमें स्थित है उसको विषसे भी तीक्ष्ण जान ॥ २३ ॥ यह मुनियोंका रुधिर न किसीको देना चाहिये न भक्षण करना चाहिये, लोकोंका रुवानेवाला रावण त्रिलोकीके जयलाभसे ॥ २४ ॥

देवदानवयक्षाणां गंधर्वाणां च कन्यकाः ॥ आहृत्य रमयामास मंदरे सह्यपर्वते ॥ २५ ॥ हिमवन्मेरुविंध्याद्रौ रमणीयवने तथा ॥ मंदोदरी तथा दृष्ट्वा पतिं सा हि मनस्विनी ॥ २६ ॥ देव दानव यक्ष और गन्धर्वोंकी कन्या लाकर मन्दर पर्वतपर और सह्यपर्वत- पर रमता था ॥ २५ ॥ हिमालयमें रमणीय विंध्याचलमें विहार करने लगा, तब इस प्रकार मंदोदरी अपने पतिको देखकर ॥ २६ ॥

आत्मानं गर्हयामास भर्तुः स्नेहमपश्यती । धिग्जीवितं हि नारीणां यौवनं कुलमेव च ॥ २७ ॥ वंचिताः पतिना याः स्युस्तस्मान्मे मरणं वरम् ॥ पुरा रावणसंदिष्टं शोणितं श्वेडतोऽधिकम् ॥ २८ ॥ भर्ताका स्नेह औरोंमें देखकर अपनी निन्दा करने लगी कि, स्त्रियोंके जीवन और कुलको धिक्कार है ॥ २७ ॥ पतिसे वंचित होकर मेरा मरनाही अच्छा है पहले जो रावने कहा कि, यह रुधिर तीक्ष्ण है ॥ २८ ॥

पपौ मरणमाकांक्ष्य पतिना वंचिता सती । लक्ष्मीशरणदुग्धेन मिश्रिताच्छोणितादभूत् ॥ २९ ॥ सद्यो रावणकांताया गर्भो ज्वलन- सन्निभः । ततो विस्मयमापन्ना सा हि मंदोदरी शुभाः ॥ ३० ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (५३)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (५३)

मंदोदरीने पतिकी वंचनासे उसको पान कर लिया वह लक्ष्मीके आश्रयवाले दूधसे मिला हुआ रुधिर था ॥ २९ ॥ उसके पान करतेही मन्दोदरीको अग्निके समान प्रकाशमान गर्भ स्थित होगया, वह देख मन्दोदरी बडी विस्मित हुई ॥ ३० ॥

पीतं विषाधिकं रक्तंगर्भस्तेनाभवन्मम । इति संचिंतयामास भर्ता विप्रोषितो मम ॥ ३१ ॥ कामिनीभिः क्रीडतं स कामो भर्ता हि रावणः । संवत्सरमिमं भत्रा सह मे वसतिर्नहि ॥ ३२ ॥

विषसेभी अधिक तीक्ष्ण रक्तपान करनेसे किस प्रकार मेरे गर्भ स्थित होगया और स्वामी मेरे निकट नहीं है, इस प्रकार बडी चिन्ता हुई ॥ ३१ ॥ मेरे स्वामी तो कामिनियोंके साथ क्रीडा करते हैं, एकवर्षसे भर्ताके साथ समागम हुआ नहीं है ॥ ३२ ॥

किं वक्तव्यं मया साध्व्या गर्भिण्या भर्तृसंसदि । चितया दग्धगात्रीव तीर्थसेवनछद्मना ॥ ३३ ॥ विमानवरमारुह्य कुरुक्षेत्रं जगाम सा । तत्र गर्भं विनिष्कृष्य निचखान भुवस्तले ॥ ३४ ॥

तब भर्ताके सामने मैं गर्भवती क्या कहूँगी, यह चिंता कर वह तीर्थसेवाके बहानेसे ॥ ३३ ॥ विमानपर चढ़ कुरुक्षेत्रको गई, वहां गर्भपात कर पृथ्वीमें गाडदिया ॥ ३४ ॥

स्नात्वा सरस्वतीतोये पुनरागात्स्वमालयम् । न चोदितं तत्कस्मैचिद्रहः कार्यं सुगोपितम् ॥ ३५ ॥ कालेन कियता ब्रह्मञ्जनकषिर्महामनाः । कुरुक्षेत्रं समासाद्य जांगले *यज्ञमावहन् ॥ ३६ ॥

सरस्वतीजलमें स्नान कर फिर अपने घर चली आई, यह कार्य किसीसे भी नहीं कहा ॥ ३५ ॥ हे ब्रह्मन् कुछ समय उपरान्त महात्मा जनकजीने कुरुक्षेत्रमें आकर कुरुजांगलमें यज्ञ किया ॥ ३६ ॥

स्वर्णलांगलमादाय यज्ञभूमिं चखान सः । स्वर्णलांगलसीतांतः कन्यका प्रोत्थिताभवत् ॥ ३७ ॥ पुष्पवृष्टिश्च महती पपात कन्यकोपरि । तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यं राजा विस्मयमा गतः ॥ ३८ ॥

और सोनेका हल लेकर यज्ञभूमि खोदी, उस पृथ्वीके खोदते समय एक कन्या प्रगट हुई ॥ ३७ ॥ उस समय कन्याके ऊपर फूलोंकी वर्षा हुई, यह आश्चर्य देख राजाको बडा विस्मय हुआ ॥ ३८ ॥


* कुर्वन्

(५४) अद्भुतरामायण [अष्टम-

कर्तव्ये मूढतामाप ततः खेऽभूत्सरस्वती । राजन्गृहाण कन्यां त्वं पालयैनां महाप्रभाम् ॥ ३९ ॥ ज्वलनार्कसमां दिव्यां महत्कार्यं तवालये । भविष्यति महाभागा च क्षेमं जगतोऽनया ॥ ४० ॥

और कर्तव्यहीन होगये, तब आकाशसे सरस्वती (वाणी) हुई, हे राजन् ! तुम इसको ग्रहण कर कन्याके समान पालन करो ॥ ३९ ॥ इस अग्निके समान कान्तिमतीका तुम्हारे स्थानमें बडा कार्य होगा हे महाभाग ! इसके द्वारा जगत्‌का महामंगल होगा ॥ ४० ॥

यज्ञ संपाद्यतां राजन्नायं विघ्नस्तवानघ । नामास्याः किल सीतेति सीताया उत्थिता यतः ॥ ४१ ॥ कल्पयैना दुहितरमित्युक्त्वावाक् तिरोहिता । तच्छ्रुत्वा प्रीतिमान्राजा यज्ञं कृत्वा महाधनम् ॥४२॥

हे राजन् ! अपना यज्ञसंपादन करो यह विघ्न नहीं होगा, सीतासे उठनेसे इनका नाम सीता होगा ॥ ४१ ॥ इसे अपनी कन्या मानो, यह कह वाणि तिरोहित हुई; यह सुन प्रसन्न हो राजाने महाधनयुक्त यज्ञ सम्पादन किया ॥ ४२ ॥

जगाम सीतामादाय महर्षिभ्यश्च तां ददौ ॥ एतत्ते कथितं विप्र सीताजन्मैककारणम् । श्रुत्वैतत्सर्वपापेभ्यो मुक्तो भवति मानवः ४३
जनकदुहितृजन्म श्रावयित्वा तु श्रुत्वा न पुनरिह जन्म प्राप्नुयात्पुण्यवांश्च । दशरथसुतकांता तस्य गेहं कदाचिद्विसृजति नहि सर्वैः पातकैर्मुच्यते च ॥ ४४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे श्रीसीतो-
त्पत्तिर्नामाष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥

और सीताको लेकर महर्षियोंको दिया, यह आपसे जानकीके जन्मका कारण कहा, इसके सुननेसे मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता है ॥ ४३ ॥ जानकीके जन्मकी कथा सुननेसे फिर इस संसारमें जन्म नहीं होता है, प्राणी पुण्यवान् होता है, लक्ष्मी उसके घरसे नहीं जाती, तथा वह सब पापोंसे छूट जाता है ।४४।

इत्यार्षे श्रीमद्रा. वा. आ. भाषाटीकायां सीतोत्पत्तिर्नामाष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (५५)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (५५)

नवम सर्ग

परशुरामको रामका विश्वरूप दिखाना

रामः सीतापरिणयं कृत्वा दशरथादिभिः ।। भ्रातृभिश्चापि सहितो भार्यया सह सीतया ।। १ ।। अयोध्यां गन्तुमारेभे नानावाद्य-पुरः सरम् । आर्चीकनंदनो रामो भार्गवो रेणुकासुतः ।। २ ।।

रामचन्द्र दशरथजीके सन्मुख जानकीका पाणिग्रहण करके भ्राताओंके सहित तथा जानकीके सहित ।। १ ।। विविध प्रकारके बाजे आदिके सहित अयोध्या जानेकी इच्छा करने लगे, मार्गमें आर्चीकनंदन परशुराम ।। २ ।।

तस्य दशरथेः श्रुत्वा रामस्याक्लिष्टकर्मणः । विवाहकौतुकं वीरः पथा तेन समागतम् ।। ३ ।। धनुरादाय तद्दिव्यं क्षत्रियाणां निबर्हणम् । जिज्ञास्यमानो रामस्य वीर्यं दाशरथेस्तथा ।। ४ ।।

उन रामचन्द्र महापराक्रमीका अद्भुत विवाहकौतुक श्रवण कर मार्गमें उनसे मिले ।। ३ ।। वह क्षत्रियनाशक दिव्य धनुष लेकर रामचन्द्रके बल जाननेकी इच्छासे आये ।। ४ ।।

सतमभ्यागतं दृष्ट्वा उद्यतास्त्रमवस्थितम् । प्रहसन्निव विप्रेन्द्रं रामो वचनमब्रवीत् ।। ५ ।। स्वागतं ते मुनिश्रेष्ठ किं कार्यं करवाणि ते । प्रोवाच भार्गवो वाक्यं स्वागतेन किमस्ति मे ।। ६ ।।

उन शास्त्र उठाये परशुरामजीको खडे देख कर हँसते हुए रामचन्द्र उन विप्रेन्द्रसे बोले ।। ५ ।। हे मुनिश्रेष्ठ ! आप भले आये कहिये मैं आपका क्या प्रिय करूं, तब भार्गव कहने लगे, हमें स्वागतसे क्या प्रयोजन है ।। ६ ।।

क्षत्रकालं हि राजेंद्र धनुरेतन्ममास्ति हि।।समारोपय यत्नेन यदि शक्तोसि राघव ।। ७ ।। इत्युक्तस्त्वाह भगवंस्त्वं नाधिक्षेप्तुमर्हसि । नेहि नह्यधमो धर्मः क्षत्रियाणां द्विजातिषु ।। ८ ।।

हे राजेन्द्र ! यह मेरे हाथमें क्षत्रियोंको कालस्वरूप धनुष हैं, यदि समर्थ हों तो आप इसे चढाइये ।। ७ ।। यह सुनकर परशुरामसे रामचन्द्र बोले


१ द्विजातिषु ब्राह्मणेषु विषये बाहुवीर्येण कथनरूपोऽधर्मो धर्मः क्षत्रियाणां नहि नहि, इक्ष्वाकूणां तु विशेषेण नहीत्वन्वयः ।

(५६) अद्भुतरामायण नवम-

भगवन् ! आप हमपर आक्षेप न करिये क्षत्रियोंको ब्राह्मणोंके साथ अपना बल प्रकाश करना उचित नहीं है ॥ ८ ॥

इक्ष्वाकूणां विशेषेण बाहुवीर्येण कत्थनम् । तमेवं वादिनं तत्र रामो वचनमब्रवीत् ॥ ९ ॥ अलं वागुपदेशेन धनुरारयच्छ राघव ॥ ततो जग्राह रोषेण क्षत्रियर्षभसूदनम् ॥ १० ॥

और विशेषकर इक्ष्वाकुवंशी ब्राह्मणोंके सन्मुख अपने बाहुवीर्यका कथन नहीं करते हैं ॥ ९ ॥ यह सुनकर परशुराम बोले हे राम ! वाणीका उपदेश मत करो, धनुष चढाओ; तब क्रोध कर रामचन्द्रने धनुष ग्रहण किया ॥ १० ॥

रामो दाशरथिर्दिव्यं हस्ताद्रामस्य कार्मुकम् ॥ धनुरारोपयामास सलिलमिव राघवः ॥ ११ ॥ ज्याशब्दमकरोत्तत्र स्मयमानः स वीर्यवान् ॥ तस्य शब्देन भूतानि वित्रेशुरशनेरिव ॥ १२ ॥

जब वह धनुष रामचन्द्रके हाथमें आया तब लीलासेही रामचन्द्रने उसे चढा लिया ॥ ११ ॥ और हँसते हुए ज्याशब्द किया; उसके शब्दसे सब प्राणी वज्रके शब्दके समान घबरा गये ॥ १२ ॥

अथाब्रवीद्वचो रामं रामोदाशरथिस्तदा । इदमारोपितं ब्रह्मन्किमन्यत्करवाणि ते ॥ १३ ॥ तस्य रामो ददौ दिव्यं जामदग्न्यो महाबलः । शरमाकर्णदेशांतमयमाकृष्य तामिति ॥ १४ ॥

तब रघुनंदन परशुरामसे बोले हे ब्रह्मन् ! धनुष तो चढा लिया, कहिये अब और क्या करूं ॥ १३ ॥ तब परशुरामने एक बडा तीक्ष्ण बाण देकर कहा कर्णपर्यन्त खींचकर इसे चढाओ ॥ १४ ॥

एतच्छ्रुत्वाऽब्रवीद्रामः प्रदीप्त इव मन्युना ॥ श्रूयते क्षम्यते चैव दर्पपूर्णोऽसि भार्गव ॥ १५ ॥ त्वया ह्यधिगतं तेजः क्षत्रियेभ्यो विशेषतः ॥ पितामहप्रसादेन तेन मां क्षिपसि ध्रुवम् ॥ १६ ॥

यह सुनकर रामचन्द्र क्रोधसे दीप्तिमान् हुए बोले, सुना जाता है क्षमा किया जाता है परन्तु तुम तथापि अभिमानसे पूर्ण हो ॥ १५ ॥ आप पितामहके प्रसादसे क्षत्रियोंसे अधिक स्पर्धा करके उनके बलपर आक्षेप करते हो ॥ १६ ॥

पश्य मां स्वेन रूपेण चक्षुस्ते वितराम्यहम् ॥ इत्युक्त्वा प्रददौ तस्मै रामो दिव्यां दृशं तदा ॥ १७ ॥ ततो रामशरीरे वै. रामोऽपश्यत्स भार्गवः ॥ आदित्यान्वसूवुद्रान्साध्यांश्च समरुद्गणान् ॥ १८ ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (५७)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (५७)

तुम मेरा दर्शन करो मैं तुमको नेत्रप्रदान करता हूँ, यह कह रामने उनके निमित्त दिव्य नेत्र दिये ॥ १७ ॥ तब परशुराम रामचन्द्रके शरीरमें आदित्य, वसु, रुद्र, साध्य, मरुत्समूह ॥ १८ ॥

पितॄन्हुताशनांश्चैव नक्षत्राणि ग्रहांस्तथा ॥ गन्धर्वान्राक्षसान्य- क्षान्नदीस्तीर्थानि यानि वै ॥ १९ ॥ ऋषीन्वैनिखिलान्यांश्च ब्रह्म- भूतान्सनातनान् ॥ देवर्षींश्चैव कात्स्न्र्येन समुद्रान्पर्वतांस्तथा ॥ २० ॥

पितृ, अग्नि, नक्षत्र, ग्रह, गन्धर्व, राक्षस, यक्ष, नदी, तीर्थ ॥ १९ ॥ ऋषि और ब्रह्मभूत, सनातन लोक, सब देवर्षि, समुद्र पर्वत ॥ २० ॥

वेदांश्च सोपनिषदान्वषट्कारान्सहाध्वरैः ॥ ऋचो यजूंषि सामानि धनुर्वेदांश्च सर्वशः ॥ २१ ॥ विद्युतो मेघवृन्द्वानि वर्षाणि च महा- व्रत ॥ ततः स भगवान्विष्णुस्तं वै बाणं मुमोच ह ॥ २२ ॥

वेद, उपनिषद्, वषट्कार यज्ञ, ऋक्, यजु, साम, सम्पूर्ण धनुर्वेद देखने लगे ॥ २१ ॥ तब विद्युत् मेघवृंद वर्ष चलायमान होगये उस समय विष्णुने उस बाणको छोडा ॥ २२ ॥

शुष्काशानिसमाकीर्णं महोल्काभिश्च सुव्रतः ॥ पांसुवर्षेण महता मेघसंघैश्च केवलम् ॥ २३ ॥ भूमिकंपैः सनिर्घातैर्नादैश्च विपुलैरपि ॥ भार्गवं विह्वलं कृत्वा तेजश्चाक्षिप्य केवलम् ॥ २४ ॥

उस समय सब जगत् उल्का और अशनिसे व्याप्त हो गया और बडी भारी धूरिकी वर्षा और मेघसमूहसे व्याप्त हो गया ॥ २३ ॥ भूमिकम्पादि महाशब्द बडे निर्घातसे परशुरामको विह्वल करके उनका केवल तेजही आकर्षण करके ॥ २४ ॥

अगच्छज्ज्वलितो रामं शरो बाहुप्रचोदितः ॥ स तु विह्वलतां गत्वा प्रतिलभ्य च चेतनाम् ॥ २५ ॥ रामः प्रत्यागतप्राणः प्राणम- द्विष्णुतेजसम् । विष्णुना सोऽभ्यनुज्ञातो महेंद्रमगमत्पुनः ॥ २६ ॥

रामकी भुजासे छूटा हुआ वह बाण चलायमान हो गया, तब विह्वलतासे परशुरामजीको जब चेतना प्राप्त हुई ॥ २५ ॥ राम फिर प्राण आये हुएको समान विष्णुको प्रणाम करते हुए और विष्णुकी आज्ञासे वे फिर महेन्द्र पर्वतको चले गये ॥ २६ ॥

(५८) अद्भुतरामायण [ नवम-

भीतश्च तत्र न्यवसद्विनीतश्च महा तपाः । ततः संवत्सरेऽतीते हृतौजसमवस्थितम् ॥ २७ ॥ निर्मदं दुःखितं दृष्ट्वा पितरो राम- मब्रुवन् । न वै सम्यगिदं पुत्र विष्णुमासाद्य वै कृतम् ॥ २८ ॥

वहाँ भीत और नम्रतापूर्वक निवास करते हुए फिर सम्वत्सरके बीत जानेपर पराक्रमरहित स्थित रहे ॥ २७ ॥ उस समय उनके पितर निर्मद और दुःखी देखकर परशुरामजीसे बोले हे पुत्र ! विष्णुको प्राप्त होकर यह तुमने अच्छा नहीं किया है ॥ २८ ॥

स हि पूज्यश्च मान्यश्च त्रिषु लोकेषु सर्वदा । गच्छ पुत्र नदीं पुण्यां वधूसरकृतालयाम् ॥ २९ ॥ तत्रोपस्पृश्य तीर्थेषु पुनर्बपुुरवा- प्स्यसि । दीप्तोदं नाम तत्तीर्थं यत्र ते प्रपितामहः ॥ ३० ॥

वह सदा त्रिलोकीमें पूज्य और मान्य हैं; अब तुम वधूसर आलयवाली पवित्र नदीमें जाओ ॥ २९ ॥ वहाँ तीर्थोंमें स्नान कर फिर अपने तेजको प्राप्त होगे, वह दीप्तोह नाम तीर्थ है, जहाँ तुम्हारे प्रपितामह ॥ ३० ॥

भृगुर्देवयुगे राम तप्तवानुत्तमं तपः । तत्तथा कृतवान्रामो भार्गवो वचनात्पितुः ॥ ३१ ॥ प्राप्तवांश्च पुनस्तेजो भारद्वाज महा- मुने । एतद्यः शृणुयाद्भत्स रामचरित्रमुत्तमम् ॥ ३२ ॥

भृगुजीने देवयुगमें तप किया था; यह वचन सुन परशुरामनने वैसाहि किया ॥ ३१ ॥ हे महामुने भारद्वाज ! इस प्रकार परशुरामको फिर तेजकी प्राप्ति हुई हे वत्स ! जो कोई पवित्र रामचन्द्रके चरित्रको सुनता है ॥ ३२ ॥

सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति । ततो रामो जानकी- स्पृष्टपाणिः सूतैर्भक्त्या मागधैः स्तूयमानः । पुष्पसारैरास्तृतो देव- संघैः स उत्तरान्कोसलानाजगाम ॥ ३३ ॥

इत्यार्षे श्री. वाल्मीकीये आ. जामदग्न्याय विश्वरूपदर्शनं नाम नवमः सर्गः ॥ ९ ॥

वह सब पापसे छूटकर विष्णुके लोकको जाता है, तब रामचन्द्र जानकीका हाथ स्पर्श कर सूतमागधजनोंसे स्तुतिको हो देवताओंसे फूलोंकी वर्षासे आच्छादित हो उत्तर कोशल देशमें आये ॥ ३३ ॥

इति श्रीरा. अद्भु. भाषाटीकायां जामदग्न्यविश्वरूपदर्शनं नाम नवमःसर्गः ॥ ९ ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (५९)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (५९)

दशम सर्ग

रामचन्द्रका महावीरको चतुर्भुजरूप दिखाना

अथ सीतालक्ष्मणाभ्यां सह केनापि हेतुना । जगाम विपिनं रामो दंडकारण्यमाश्रितः ॥ १ ॥ तत्र गोदावरीतीरे पर्णशालां विधाय सः । उवाच कंचित्कालं वै मृगयामभिकारयन् ॥ २ ॥

फिर सीता लक्ष्मणके साथ किसी कारणसे रामचन्द्र दण्डकारण्यमें आये । ॥ १ ॥ वहां गोदावरीके किनारे पर्णशाला रचकर मृगया करते कुछ दिन वहाँ रहे ॥ २ ॥

कदाचिद्रावणो मोहाल्लंकायां तां न्यवासयत् । तामदृष्ट्वा ततो रामो लक्ष्मणश्च महाबलः ॥ ३ ॥ आटतुश्चाटवीं सर्वां सीतादर्शन-लालसौ । रामस्य रुदतस्तस्य बाष्पवारिसमुद्भवा ॥ ४ ॥

एक समय मोहसे जानकीको हरण कर रावण ले गया, उनको राम लक्ष्मण देखकर ॥ ३ ॥ सीताके दर्शनकी इच्छासे सम्पूर्ण वन ढूंढते हुए ॥ ४ ॥

नदी वैतरणी चाभूच्चक्षुषोरश्रुवुद्भवा । वितरत्यश्रु वै यस्मादतो वैतरणीस्मृता ॥ ५ ॥ पितॄणां तरणं यस्मान्मानूणां स्नानतर्पणात् । तेनापि कारणेनासौ नदी वैतरणी स्मृता ॥ ६ ॥

उनके नेत्रोंके जलसे एक वैतरणी नदी बह गई थी; आंसू विपरीत होनेसे वह वैतरणी कहाई ॥५॥ जिसमें स्नान दान करनेसे मनुष्योंके पितर तरते और तृप्त हो जाते हैं इसी कारणसे वैतरणी कहाती है ॥ ६ ॥

नेत्रयोर्दूषिकायाश्चय ताभिः शैलास्ततोऽभवन् । सुग्रीवेण वानरेण सख्यं कर्तुं महामनाः ॥ ७ ॥ ऋष्यमूकंमगाद्रामो लक्ष्मणेनानुजेन च । पञ्चभिर्मंत्रिभिः सार्द्धं सुग्रीवो नाम वानरः ॥ ८ ॥

और नेत्रोंके मलसे वहांसे पर्वत हो गये हैं फिर वे सुग्रीवके साथ मित्रता करनेकी इच्छासे ॥ ७ ॥ रामचन्द्र लक्ष्मणके सहित ऋष्यमूक पर्वतको गये; वहां पांच मंत्रियोंके साथ सुग्रीव नामक वानर ॥ ८ ॥

यत्रास्ते वालिभयतः सोऽपश्यद्रामलक्ष्मणौ । चापबाणधरौ वीरौ ग्रसंताविव चाम्बरम् ॥ ९ ॥ तौ दृष्ट्वा सुमहत्त्रस्तो वालिपक्षा-वमन्यत । प्रास्थापयद्धनूमंतं भिक्षुरूपेण वानरम् ॥ १० ॥

(६०) अद्भुतरामायण [ दशम -

आत्मानं दर्शयामास हनूमान्रामलक्ष्मणौ । को भवानिति चोक्तेऽथ चतुर्बाहुं किरीटिनम् ॥ ११ ॥ शंखचक्रगदापाणिं वनमाला- विभूषितम् । श्रीवत्सबक्षसं देवं पीतवाससमच्युतम् ॥ १२ ॥

वालीके भयसे रहता था, उसने रामलक्ष्मणको देखा, वह वीर चाप धारण किये आकाशसे ग्रसते हुएके समान थे ॥ ९ ॥ उनको देखकर सुग्रीव बडे त्रासको प्राप्त हुआ, कारण कि, उनको वालीके पक्षका जाना, तब भिक्षुरूपसे महावीरको उनके निकट भेजा ॥ १० ॥ हनुमान्ने रामलक्ष्मणको अपना स्वरूप दिखाया, आप कौन हो इस प्रकार चतुर्बाहु किरीटधारी ॥ ११ ॥ शंख, चक्र, गदापाणि वन मालासे विभूषित श्रीवत्स वक्षस्थलमें धारण किये, पीतवस्त्रधारी अच्युत ॥ १२ ॥

लक्ष्मीसरस्वतीभ्यां च संश्रितोभयपार्श्वकम् । ब्रह्मपुत्रैः सनन्दाद्यैः स्तूयमानं समन्ततः ॥ १३ ॥ देवर्षिपितृगंधर्वैः सिद्धविद्याधरोरगैः । सेव्यमानं महात्मानं पुंडरीकविलोचनम् ॥ १४ ॥

लक्ष्मी सरस्वतीसे सेवित ब्रह्माके पुत्र सनन्दादिसे सब ओर सेव्यमान ॥ १३ ॥ देवता पितर गन्धर्व सिद्धविद्याधर उरग महात्माओंसे सेवित कमललोचन ॥ १४ ॥

सहस्र सूर्यसंकाशं शतचन्द्रशुभाननम् । फणासहस्रमतुलं धारयन्तं च लक्ष्मणम् ॥ १५ ॥ अनन्तं रामशिरसि आतपत्रं फणागणैः । दधानं सर्वलोकेशनागसंघैश्च संस्तुतम् ॥ १६ ॥

सहस्रसूर्यके समान प्रकाशमान, सौ चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखवाले सहस्र फण धारण किये लक्ष्मणको ॥ १५ ॥ जो अनन्त हैं और रघुनाथजीके शिरपर अपने फणोंका छत्र धारण किये हैं वे सर्वलोकेश नागसमूहोंसे स्तुति किये हुए हैं ॥ १६ ॥

आत्मानं दर्शयामास रामचन्द्रो हनूमते । तद्रूपं हनूमन्वीक्ष्य किमेतदिति विस्मितः ॥ १७ ॥ क्षणं निमील्य नयने पुनः सोऽपश्यद- द्भुतम् । स्तुत्वा नत्वा च बहुधा सोऽब्रवीद्राघवं वचः ॥ १८ ॥

इस प्रकार रामचन्द्रने महावीरजीके प्रति अपनी आत्माको दिखाया महावीरजी उस रूपको देख यह क्या है इस प्रकार विस्मित हो गये ॥ १७ ॥ क्षणमात्रको नेत्र मीचकर फिर वह अद्भुत रूप देखते हुए और अनेक प्रकारकी स्तुति और प्रणाम कर रामचन्द्रसे कहने लगे ॥ १८ ॥